Gulabkothari's Blog

जून 24, 2012

धर्म; संतों का नहीं, दलालों का!

एक कहावत है कि धर्म की जड़ सदा हरी। आज तो कहीं भी ऎसा दिखाई नहीं पड़ रहा, क्योकि धर्म ही लुप्त हो गया। देश के संविधान में भी धर्म का स्थान नहीं रहा। धर्म-निरपेक्ष हो गया। भले ही हर धर्म के नाम पर सरकारी छुटि्टयों का अम्बार लगा हो। जैसे सत्ता के लिए जातियों को मान्यता दे दी, वैसे ही धर्म के नाम पर सम्प्रदायों को ही महिमा मण्डित कर दिया। कहां खो गया लोकतंत्र एवं सम्प्रदायों का उत्तरदायित्व बोध? आज हर सम्प्रदाय में हजारों से लाखों तक साधु-संन्यासी हैं। समाज के सिर पर बैठे मस्ती छान रहे हैं।

लोग चरणों में लोट रहे हैं। प्रवचन टीवी चैनलों से विश्वव्यापी हो रहे हैं। सारे आश्रम, भवन, सम्पदाएं, ट्रस्ट, पुस्तकें, प्रचार-प्रसार जनता के सिर। ऊपर से चातुर्मास! कभी चार महीने, कभी अधिक मास, कभी गुरू की मर्जी पर छ: मास। खर्चा करोड़ो में। यानी कि दो नम्बरियों की जय-जयकार! मेरे गांव में चातुर्मास और खर्चा करने वाले सन्त अपने साथ लाएं, तो गांव का सम्मान या अपमान? जिनके आगे सिर झुकाते हैं, उनको दलाल हाईजैक कर लें, भ्रष्ट एवं बदनाम लोग संतों के इर्द-गिर्द छाए रहें, तो धर्म का सम्मान या अपमान?

क्या सन्तों से यथार्थ छुपा होता है? क्या संत समाज के अवदान को ऋण रूप मानता है? अपना-अपना टोला लेकर आते हैं, चातुर्मास के बाद आशीर्वाद में हाथ उठाकर चले जाते हैं। इसी बीच गांव वालों ने क्या खोया, क्या पाया, इसकी कोई चर्चा नहीं। क्योंकि जब चातुर्मास की घोषणा की थी, तब किसी भी कार्य को हाथ में लेने का संकल्प नहीं किया जाता, तब जाते समय आकलन किसका हो!

इसी का परिणाम है कि देश में लाखों संत होने के बाद चारों ओर धर्म का ह्रास हो रहा है, तब संतों की सार्थकता क्या है? धर्म की भूमिका क्या है? क्या धर्म का स्थान हर सम्प्रदाय में अधर्म ने ले लिया है? क्या जो कुछ संत करें, उसी को धर्म मान लिया जाए? क्या चातुर्मास के बोझ का गांव वाले हिसाब नहीं मांगे। केवल यही गिनते रहें कि आज कहां से कितनी बसें आई! सन्तों के जो चर्चे मीडिया में हैं, उनसे गौरवान्वित होते रहें? क्या संत राजनीति में भाग लें, मर्यादाओं से समझौते करें, सुख-सुविधाओं का भोग करें, राजनीति में शासन तक पहुंचकर राज करें, चुनाव लड़ें, तब भी उनको संत मानना चाहिए? आज हर गुरू अपने सम्प्रदाय को संख्या बल से बढ़ाना चाहता है।

यह कार्य धर्म के जरिए नहीं हो सकता। ग्लैमर चाहिए। हर एक को बांधने का प्रयास किया जाता है। यही कट्टरता का मार्ग है। धर्म का कार्य तो मुक्ति है। छोटे संतों को तो परिभाषा भी मालूम नहीं। धर्म की बारीकियों से उनका वास्ता ही नहीं पड़ता। उदाहरण के लिए—सभी धर्म अहिंसा सिखाते हैं। छोटे संत हिंसा को विस्तार से समझा देते हैं। फिर कहेंगे कि अहिंसक होना है, तो हिंसा से बचो। अहिंसा का अर्थ उनको भी नहीं आता। समाज में गलत स्वरूप प्रतिष्ठित होता है। क्या इनको प्रशिक्षित नहीं किया जाना चाहिए? छोटे संतों की संख्या भी बड़ी होती है। ये सचमुच लकीर के फकीर होते हैं। इनको अपने सम्प्रदाय के अलावा किसी अन्य सम्प्रदायों के बारे में कुछ पता नहीं होता।

जो रट लिया, उसी को परोसते जाएंगे। जो रटा उसे स्वयं भी नहीं समझ पाते। तब प्रवचनों को कोई समझ पाएगा, संभव नहीं है। आत्मसात और रूपान्तरण शास्त्रों तक सीमित रह जाएंगे। तब धर्म का ह्रास कैसे रूकेगा? और इसकी जिमेदारी किसकी? आज संतों और राजनेताओं में अन्तर घटता जा रहा है। दोनों ही लेने वाले हो गए।

देना भूल गए। जो दे रहे हैं, वह जनता के लिए उपयोगी हुआ या नहीं, इसकी चिन्ता उनको नहीं रही। नए युग में, नई जरूरतों के अनुरूप जो भूमिका बदलनी चाहिए थी, वह नहीं बदली। शास्त्रों पर शोध नहीं होता। उनमें छिपे विज्ञान भाव को प्रकट करने के प्रयास सम्प्रदायों में नहीं होते। अन्य मतों के तुलनात्मक अध्ययन आज भी नहीं हो रहे। धर्म को बस रटाया जाता है। संवेदनाएं पलायन करने लगी हैं। संतों को भी देख लें कि उनका चित्त कहां टिका रहता है।

क्या यह संभव नहीं कि सभी सम्प्रदायों के सन्त चातुर्मास प्रवेश पर संकल्प करें कि उनके प्रवास का कौन-सा लाभ नगरवासियों को प्राप्त होगा? बच्चों को संस्कारित किया जाएगा, महिला शिक्षण के कार्य हाथ में लिए जाएंगे, नवाचार की कक्षाएं लगेंगी अथवा ध्यान जैसे प्रयोगों द्वारा समाज के रूपान्तरण के प्रयोग किए जाएंगे।

प्रवचनों की भीड़ का रूपान्तरण से कोई लेन-देन नहीं होता। न प्रवचन करने वाले संत को पता होता कि प्रवचन का कितना अंश ग्राह्य है। उसे तो अपनी क्षमता टीवी पर दिखानी होती है। श्रोताओं में तो बहुत से अनपढ़ भी होते हैं। अत: शास्त्रों के सूत्र और श्लोकयुक्त व्याख्यान होते हैं।

श्रोताओं को इनका ज्ञान भी नहीं होता। न कोई प्रश्नोत्तर की अनुमति होती है शंकाओं को दूर करने की। अत: एक पक्षीय जाल बनकर रह जाता है। आपने भरकर दिया, उसके पास (श्रोता के) कटोरी है। शेष बह गया—संत को पता ही नहीं चला। इन बातों से अनेक प्रश्न हमारे सामने आते रहते हैं। संत स्वयं को अनुशासित क्यों नहीं रख पाते? मार्गदर्शक के स्थान पर शासक कैसे बन जाते हैं? सत्ता का अहंकार उनके प्रचार-प्रसार की सामग्री, उत्सवों का वैभव सब जय-जयकारों में परिलक्षित होता है। तलुए चाटने वाले चापलूसों की कमी किसी काल में नहीं हुई। आज तो ज्यादा है। ये लोग संतों को भगवान बनाकर महिमा मण्डित करते रहते हैं।

संतों का सौदा करके उनको तथा धर्म को अपमानित करते हैं। कई बाबा, बापू और साधु-साघ्वियों के उदाहरण रिकार्ड पर हैं। चरण छूना है तो पहले लिफाफा पकड़वाओ, कष्ट दूर करवाना है तो दक्षिणा? संत और व्यापारी में अन्तर क्या रह गया। व्यापारी कम-से-कम चरण धुलवाकर-प्रक्षालन पीने की तो नहीं कहता संत कैसा भी निकृष्ट कार्य कर ले, कोई भी समाज इनको सजा क्यों नहीं देता? बदनाम होकर भी चुप क्यों रहता है? क्या अब संतों की सार्थकता का प्रश्न उठाना समीचीन नहीं होगा? यह भी अनिवार्य हो कि हर संत, हर दूसरे सम्प्रदाय के सन्त के साथ संवाद करने की स्थिति में भी हो। हर प्रवचन में श्रोताओं को प्रश्न पूछने का अधिकार भी हो।

गुलाब कोठारी

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