Gulabkothari's Blog

जुलाई 1, 2012

गुरू

मन की दो गतियां होती हैं। ऊध्र्वगामी तथा अधोमुखी। विद्यामयी और अविद्यामयी। मन के हर भाव के साथ दोनों गतियां जुड़ी रहती हैं। हर क्षण व्यक्ति को इनके बारे में एक निर्णय करना पड़ता है। अविद्या जन्म से साथ ही होती है। विद्या अर्जित करनी होती है। यही गुरू का क्षेत्र है। धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऎश्वर्य। इसीलिए कहा जाता है कि जो हम जानते हैं, वह गुरू भी जानता है। जो गुरू जानता है, वह सब हम नहीं जानते। गुरू हमको जानता है, हम गुरू को नहीं जान पाते। आचार्य देवो भव:। गुरू देवता अथवा प्राण स्वरूप, सूक्ष्म तžव है, जो कि हमारी बुद्धि को प्रज्ञा बनाकर रखता है। प्रज्ञा के कारण ही हम सूक्ष्म को समझ सकते हैं। गुरू को हम माता-पिता की तरह शरीर में प्रवाहित पाते हैं।

गुरू की तलाश की जाती है। उपलब्ध विकल्पों का अनेक धरातल पर परीक्षण करके गुरू को चुना जाता है। श्रद्धा और समर्पण अनायास पैदा नहीं हो पाते। गुरू भी परीक्षण करता है। यह परीक्षण तात्विक होता है। गुरू यह जानने का भी प्रयास करता है कि इस जीवात्मा ने पिछले जन्म तक कितना ज्ञान अर्जित कर लिया है। उसके आगे का मार्ग प्रशस्त करना है। इसी में शिष्य की भी पात्रता का परीक्षण हो जाता है। एक तो जिज्ञासा, एकाग्रता, श्रद्धा भाव का परीक्षण तथा दूसरा, ग्रहण कर सकने की क्षमता का परीक्षण। उसके बाद ही गुरू संकल्प करके शिष्य को स्वीकारता है। यह सर्वाधिक कठिन संकल्प है। उत्तराधिकार सौंपने के लिए, उम्र भर की अर्जित ज्ञान की पूंजी सौंपने के लिए, ऋषिऋण मोचन के लिए, गुरू भी स्वयं को तैयार करता है। वह पहले स्वयं को शिष्य के ह्वदय में स्थापित करता है। उसका विश्वास अर्जित करता है। उसका एक मात्र लक्ष्य होता है शिष्य को अपनी कृति बना देना। उस अनगढ़ पत्थर को मूर्तिरूप दे देना, जिसमें उसका ही स्वरूप नजर आए।

गुरूत्तर कार्य करने के कारण गुरू कहलाता है। कार्य सहज हो भी कैसे? शिष्य की पात्रता के अनुसार ज्ञान को रूपान्तरित करना, ताकि ज्ञान ग्राह्य हो सके। जैसे एक शिशु को उसकी माता खाना खिलाती है। फिर ग्रहण क्षमता बढ़ाते जाना होता है। बीज मंत्र के जाप से एकाग्रता उत्पन्न करता है। मन को विकल्पों से दूर करके संकल्पवान बनाए रखता है। पात्रता के अनुरूप ज्ञान को रूपान्तरित करता रहता है। शिष्य के संपूर्ण जीवन पर दृष्टिपात करके, उसकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखता है। बीच-बीच में तात्विक परीक्षण भी चलता रहता है। प्रश्नों के उत्तर शब्द रूप के बजाए दृष्टिबोध पर आधारित होते हैं। एक बार मुझे लगभग 4500 पृष्ठों का साहित्य पढ़ने को कहा गया। पढ़ लेने पर पूछा कि इसमें सबसे श्रेष्ठ वाक्य तुमको कौनसा लगा और क्यों। क्या यह साधारण टेस्ट है? यहां यह उल्लेख भी उचित होगा कि गुरू का भी अपना कत्ताü भाव नहीं होता। वह भी अपने गुरू से लेकर ही शिष्य को देता है। शिष्य यदि आठ घण्टे मेहनत करता है, तो गुरू चार घण्टे अतिरिक्त मेहनत करता है। विष्ाय को शिष्य की समझ के स्तर पर उतारता है। उसमें माधुर्य तथा लालित्य का समावेश करके उसे रोचकता प्रदान करता है। शिष्य के लिए सब कुछ नया होता है। उसके एक जैसे प्रश्नों का बार-बार उत्तर देना पड़ता है। धैर्य एवं मिठास के साथ। शिष्य नित्य नए ज्ञान से प्रेरित होता रहे, गुरू के आचरण तथा व्यवहार से निरन्तर प्रेरित होता रहे, यह जरूरी है।

गुरू शिष्य के लिए कार्य नहीं करता। न ही शिष्य के कर्म बन्ध काटता है। गुरू शिष्य के साथ भी नहीं चलता। केवल मार्ग दिखाता है। गुरू ही शिष्य को अद्वितीय होने का रहस्य समझाता है। बाहरी और भीतरी जीवन को संतुलित रखना सिखाता है। इसका परिणाम यह होता है कि शिष्य का ध्यान स्वयं से हटकर गुरू पर टिक जाता है। गुरू भगवान भले ही न हो, उसका प्रतिनिधि तो बन ही जाता है। शरीर का गुरू ओझल हो गया। उसके जरिए भीतर विज्ञानमय कोष का द्वार खुलता है। अन्तश्चेतना का जागरण हो जाता है। अब गुरू के शब्दों का आदान-प्रदान जरूरी नहीं रहता। भावों के स्पन्दन ही अभिव्यक्ति का सेतु बनते हैं। शिष्य भाव विभोर होकर गुरू के समक्ष बैठा रहता है। गुरू को भीतर उतारता जाता है।
गुरू मंत्र-दीक्षा देता है। गुरू-प्रदत्त बीज मंत्र ही आगे चलकर वट वृक्ष बनता है। जब भी शिष्य मंत्र का जाप करता है, उसे अपने ही कानों से सुनने का प्रयास करता है, तब-तब उसके मन में निरन्तर चलने वाला विचारों का तांता रूक जाता है। या यूं कहो नए विचार उस काल में प्रवेश नहीं कर सकते। ज्यों-ज्यों मंत्र गहरा उतरता जाता है, शब्द वैखरी से मध्यमा और पश्यन्ति में प्रवेश करता है। मंत्र की शुरूआत मूलाधार से होती है। यहां से उठकर प्राण स्वाधिष्ठान, मणिपूर होकर अनाहत में पहुंचता है। यही अपने गुरू से शिष्य का साक्षात्कार होता।

गुरू माता-पिता से कई अर्थो में बड़ा होता है। मां-बाप अर्थ-काम की चिन्ता करते हैं। गुरू धर्म और मोक्ष की। मां-बाप शरीर के साथ जुड़े होते हैं। गुरू त्रिकाल दृष्टि से देखते हैं। पिछले जन्म के संस्कारों को आधार बनाकर वर्तमान जीवन का रूपान्तरण करते हैं, ताकि शिष्य का कोई भावी जन्म हो ही नहीं। इसके लिए शिष्य को अपनी साधना का अंशदान भी करता है। शिष्य कहीं भी रहे, गुरू की दृष्टि में रहता है। क्योंकि वह शिष्य के ह्वदय में ही प्रतिष्ठित हो जाता है। फिर गुरू को बाहर ढूंढ़ने की जरूरत नहीं रहती।

ईश्वर की तरह गुरू भी भीतर होने का अर्थ भी यही है कि गुरू गोविन्द दोनों खड़े, का के लागू पाय— गुरू के भीतर प्रवाहित होने का अपना अर्थ है। ईश्वर के साथ एकाकार होकर गुरू आपके जीवन का प्रकाश बन जाता है। जब गुरू और शिष्य एकाकार हो जाते हैं, तब व्यक्ति स्वयं प्रकाश पुंज बन जाता है। अप्पदीपों भव:। साधना को जीवन शैली बनाने से ही व्यक्ति आसक्ति मुक्त हो पाता है। कर्म से फल को अलग रख सकता है, ताकि यह अकर्म रूप ब्रह्म हो सके। गुरू ही संकल्प को दृढ़ करने में सहायक होता है। यह संकल्प ही स्थायी रूप से गुरू का उपहार बन जाता है। इसके बिना सत्य की खोज संभव नहीं हो पाती। मन की चंचलता के कारण विकल्प मन को प्रवाह में ले जाते हैं। तब संकल्प ही व्यक्ति को रोकता है। ऊध्र्वमुखी होने में सहायक होता है। समयातीत स्थिति में प्रतिष्ठित करता है। बिना दृढ़ संकल्प के मन में भाव पैदा ही नहीं होते। वातावरण पैदा ही नहीं होता। तब गुरू का प्रकाश मार्ग दिखाता है। समय के साथ गुरू भी पीछे छूटता जान पड़ता है। व्यक्ति स्वयं के प्रकाश के भरोसे अंधेरे में यात्रा करने चल पड़ता है। व्यक्ति का लक्ष्य संकल्प ही दीया बनता जाता है। यहां संकल्प और धर्म पर्यायवाची हो जाते हैं। यही भीतर का प्रकाश बन जाते हैं। रोशनी आवरणों के बाहर यथार्थ को देखने की क्षमता प्राप्त कर लेती है। गुणातीत और रूपातीत दृष्टि का ही दूसरा नाम गुरू कहलाने लगता है।

हो सकता है कि सबको गुरू नहीं भी मिले। तब एकलव्य बनने का साहस चाहिए। इष्ट का कोई स्वरूप बनाकर प्राणों से संकल्प की प्रतिष्ठा की जाए। इष्ट को कत्ताü मानकर एवं स्वयं को निमित्त रखने का प्रण करना ही तो गीता का कर्मयोग है। इष्ट का चुनाव व्यक्ति स्वयं करता है और संकल्प के अनुरूप उसके साथ प्रेम करने लगता है। इसी का अभ्यास प्रेम करने का, विवाह संस्कार का लक्ष्य है। प्रेम होता नहीं है, किया जाता है। दाम्पत्य का प्रेम इष्ट के प्रेम में सहायक होकर गुरू के प्रभाव की बहुत सीमा तक पूर्ति कर देता है। हर व्यक्ति के लिए मोक्ष द्वार उपलब्ध करा देता है। जीवन साथी ही गुरू बन जाता है। पति भी गुरू और पत्नी भी गुरू।
गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

6 टिप्पणियाँ »

  1. GURU KI MAHIMA ATYANT NIRALI. GURU CHAMA KARI HAI.

    MAINE RAM LAL JI SIYAG KO GURU BANAYA. GURU KE MANTRA JAAP SE MUJHE FAYADA HUA.
    MANTRA JAAP SE MERI BODY SHAKTI AA GAI HAI. YOGIC ACTIVITY APNE AAP HOTI HAI…
    MUJHE CHAKRA ACTIVE HONE KA AABAS HUA HAI

    RAM LAL JI SIYAG JI KO KOTO KOTI PRANAM..
    AAP BHI INHE GURU BANAYA…

    टिप्पणी द्वारा RAJENDRA SINGH BHATI — अगस्त 22, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. Guru ki mahima jo Kothari Saab ne kee hai to uchit par aisee maheema tulya Guru aaj deekhte nahin.
    Parh kar dil mein tees hee uthtee hai kee naa to Guru hain aur na hee janta ko unki kadar karne kee pragya.

    टिप्पणी द्वारा sushil — जुलाई 2, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. dhnya guruji aapki wani aachi lagi aapke vichar padhke man ko santi milti hai nayi dish milti hai. AApki soch alag hai. dhanyawad/N.M.SURANA

    टिप्पणी द्वारा N.M.SURANA — जुलाई 2, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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