Gulabkothari's Blog

जुलाई 3, 2012

गुरू चमत्कारी हो!

गुरू की परिभाषा आज चमत्कार से जुड़ गई और भक्त आने लगे द्वार। अपनी-अपनी समस्याओं का समाधान कराने। ज्ञान प्राप्ति के लिए शिष्य आते ही नहीं। गुरू भी बंधना नहीं चाहते। सभी शिष्य भक्त बन गए। गुरू भगवान हो गए। तब भगवान की कैसी गुरू पूर्णिमा? गुरू संन्यासी होकर भी समृद्ध हो गए। पैदल विहार अब उनकी शैली से बाहर हो गया। बिना संन्यास भी लोग सन्त बन बैठे। आज आम आदमी इतना त्रस्त है कि वह इस ओर ध्यान ही नहीं देता। वह तो अपनी समस्या का समाधान ढूंढ़ता है। कुछ दिखावा भी ज्यादा ही बढ़ गया है।

इस देश में संन्यास का एक स्वरूप था। संन्यासी की अपने सम्प्रदाय की मर्यादा में समाज के प्रति जिम्मेदारी थी। भूमिका थी। आज का संन्यास आश्रम व्यवस्था का अंग नहीं होकर स्वतंत्र कार्य बनता जा रहा है। अत: समाज की मर्यादाओं के स्थान पर उनके ही नियम लागू होने लगे हैं।

इस देश में “बहता पानी, रमता जोगी” की अवधारणा रही है। ठहरते ही दोनों सड़ने लगते हैं। लोगों के साथ उनके सम्बन्ध बनने लग जाते हैं। राग-द्वेष का भाव बढ़ता जाता है। बड़े-बड़े मठाधीश तो भोगी होने लग गए। फिर संन्यासी क्यों?

संन्यासी किसी-न-किसी सम्प्रदाय का प्रतिनिधि होता है। समाज विशेष की शिक्षा, नियम, मर्यादा और आचार्य के संदेशों का वाहक एवं प्रचारक होता है। उसके पास भी अपने गुरू द्वारा प्रदत्त कोई बीज मंत्र होता है। यह मंत्र ही गुरू बनकर उसकी बुद्धि में कार्य करता है। उसकी प्रज्ञा को जाग्रत रखता है। सम्प्रदाय का विकास इसी बीज के फल रूप में होता है।

हर संन्यासी इस विस्तार के लिए संकल्पित होता है। उसे गांव-गांव पैदल जाना है। एक-एक व्यक्ति से सम्पर्क करके बीजारोपण करना होता था, ताकि हर व्यक्ति वृक्ष की तरह बड़ा हो सके। समाज को फल और छाया दे सके। चूंकि सड़कें और साधन थे ही नहीं, तब आम आदमी के साथ संन्यासी भी पैदल आराम से चल लेता था। आज सड़कें हो गई।

साधनों की बारिश हो गई। समाज की बदलती जीवन शैली नए संन्यासी के लिए ईष्र्या का हेतु बन गई। रास्ते निकाल-निकाल कर अनेक आधुनिक साधनों का प्रयोग शुरू करने लगा है। पुरानी मर्यादाएं शिथिल जान पड़ रही हैं।

दूसरी ओर उन्हीं साधन-सुविधाओं ने समाज को पूरी तरह आश्रम व्यवस्था से तोड़ दिया है। अब वानप्रस्थ और संन्यास जीवन शैली से बाहर निकल गए। गृहस्थाश्रम ही 75 वर्षो का हो गया। टीवी तथा इंटरनेट ने ब्रह्मचर्याश्रम को भी लगभग दस साल तक कम कर दिया। पूरा जीवन भोग को “स्वाहा” कर दिया। न समाज के लिए समय बचा, न ही आत्म-चिन्तन के लिए।

कालेधन ने तो समाज एवं धर्म दोनों में भोग का साम्राज्य खड़ा कर दिया। संन्यास में भी साधना के एक स्तर पर परीक्षा रूप में भोग एवं शरीर सुख की इच्छा उत्कट हो जाती है। भोग का वातावरण उसे घेरने के लिए सक्षम होता है। ऎसा व्यक्ति प्रवाह में तेजी से बह जाता है।

फिर पशुत्व से उठ पाना संभव नहीं होता। यही धन जब अन्न रूप से पेट में जाता है, तब इसके प्रभावों से तो संन्यासी भी कैसे बचेगा। जो संन्यासी अपने बीज मंत्र से गांव-गांव जाकर हर व्यक्ति में बीजारोपण करता था, हर व्यक्ति को फलदायी वृक्ष बनाना चाहता था, छायादार विश्राम स्थल बनाना चाहता था, उसका कार्य दुर्लभ हो गया। मन विषयों से घिरने लगा।

समाज के बीच का अन्तराल घटने लगा। कई-कई जगह तो अब समाप्त प्राय: हो गया है। सेविकाओं के रूप में महिलाओं का बोलबाला राजनेताओं के समकक्ष पहुंचने लगा है। समाज इनको संत रूप में क्यों स्वीकार किए है, शायद इसमें समाज की भी कोई कमजोरी होगी। जब बीज को ही कीड़ा लगने लग गया, तब कैसे शिष्यों के शरीर में प्रवाहित होता जान पड़ेगा? आज की सच्चाई यह है कि गुरू केवल अपने सम्प्रदाय के साथियों के बीच ही मंत्र द्वारा सम्बन्ध बना सकता है। बाहर न गुरू ही रहा, न ही शिष्य।

जीवन की एक सच्चाई यह भी है कि हम वर्तमान स्थितियों से दुखी होते हैं तथा सुनहरे कल की खोज में व्यस्त रहते हैं। चमत्कारी गुरू उसी खोज में हमारे साथ जुड़ जाते हैं। इनके व्यवहार में भी मोक्ष की चिन्ता नहीं होती। कल की चिन्ता भी नहीं होती। ईश्वर ने तो सुख-दुख दोनों साथ दिए हैं। बिना दुख पाए सुख का स्वाद समझ में नहीं आता।

सुख भी यदि रोजाना मिलने लगे, तो आदमी उससे भी दुखी हो जाता है। सुख-दुख का बड़ा हिस्सा हमारे पिछले कर्मो का होता है, किन्तु हम उसको स्वीकार ही नहीं करते। स्वीकार करें तो हो सकता है कि तुरन्त अच्छे कार्यो में व्यस्त हो जाएं। दुख से लड़ने या पार पाने के लिए संतों के आश्रमों का चक्कर लगाते हैं। हमारा वर्तमान बिना किसी नए कर्म के बीत जाता है। प्रारब्ध को तो संन्यासी भी नहीं बदल सकता। किन्तु हमारी मन:स्थिति ही ऎसी हो जाती है कि इसमें भी एक प्रकार की स्पर्धा हमको जकड़ लेती है।

वर्षो तक समस्या का निवारण नहीं भी हो तो हम चिन्तन नहीं करते। इतने वर्ष तो फिर भी दुख से बाहर नहीं आए। इतनी तैयारी शुरू में ही होती तो हम नई मुसीबत में नहीं फंसे होते। दुखी भी उतने के उतने, इतने चक्कर काटने का तथा चढ़ावे का खर्च अलग। डबल मार पड़ गई। करेला और नीम चढ़ा।
विकासवादी दृष्टिकोण भी कम जिम्मेदार नहीं है। पश्चिम की पंूजीवादी संस्कृति हमारा आज का आदर्श है।

कभी वहां की “डिब्बा” संस्कृति के लिए कहा जाता था कि यह तो “यूज एण्ड थ्रो” संस्कृति है। अब तो यह बात इंसानों पर भी वहां लागू होने लगी है। इसके साथ ही उनका सारा जोर जीवन को दुख से मुक्त करने पर लगा है। एसी, टीवी, फ्रीज, जिम की मशीनें, रसोई उपकरण आदि सभी कुछ शरीर को श्रम मुक्त करने के प्रयोजन को सिद्ध करते हैं। इसका परिणाम यह भी हुआ कि ये सारे उपकरण जीवन शैली का अंग बनकर रह गए। इनसे होने वाली सुख की अनुभूति समाप्त ही हो गई। इसी प्रकार जीवन साथी से बिछुड़ना कष्टदायी अब नहीं लगता। स्त्री-पुरूष भी उपभोक्ता सामग्री बन गए। जुड़ना-बिछुड़ना महत्वपूर्ण रहा ही नहीं।

इसका सूक्ष्म में भाव यह है कि यदि जीवन से कोई दुख बाहर निकाल दिया जाए, तो उसके साथ जुड़ा हुआ सुख भी बाहर निकल जाता है। हम इसी संस्कृति की नकल करके गौरवान्वित होते रहते हैं। दुखों से मुक्त होने की लालसा में संन्यासियों के चरण धोते रहते हैं। न दुख छूटा, न सुख मिला। चूंकि हम गुरू कहते तो हैं, मानते नहीं, अत: झूठ बोलने से भी नहीं हिचकते। यही वह कारण है जो आश्रमों में अनाचार को बढ़ावा देता है। व्यक्ति संन्यासी के आगे भी झूठ बोल लेता है। अर्द्धशिक्षित एवं अर्द्धविक्षिप्त अवस्था का प्रभाव संन्यासी पर भी पड़ता है।

वह चिकित्सा करने वाला डॉक्टर बन जाता है। न किसी को उसके ज्ञान की जरूरत, न किसी मरीज से मिलने का समय। पूरे आश्रम में गुरू शिष्य स्वरूप की चर्चा सुनाई नहीं देती। चारों ओर भक्त और भगवान (गुरू) ही चर्चा में रहते हैं। फिल्मी संगीत की तरह ही भक्ति गीत-संगीत चलता रहता है। यह भी हर सम्प्रदाय के आश्रमों में एक-सा होता है। टीवी प्रसारण ने नाचने वालों की संख्या भी बहुत बढ़ा दी और संतों का अहंकार भी। प्रश्न यही है कि बिना वानप्रस्थ के संन्यास आश्रम कितने दिन टिक पाएगा। ज्ञान तो लुप्त हो जाएगा, चमत्कार रह जाएगा।

आज गुरू पूर्णिमा पर अनेक कार्यक्रम होंगे। कई भ्रष्ट लोग काले धन के सहारे संतों से माला पहनेंगे। उनको और उनके धूर्त दलालों को समारोह में ही धिक्कारना चाहिए। धर्म के नाम पर खुला अधर्म। ऎसे संतों को भी संन्यास का उपहास नहीं होने देना है। काले धन से ही जय-जयकार करनी है, तो चोला बदलना ठीक रहेगा। नहीं तो अच्छा समाज नहीं बना पाएंगे। धर्म बदनाम हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

16 टिप्पणियाँ »

  1. Vary good and eye opener article of MR. GULAB KOTHARI. Worth readable.

    टिप्पणी द्वारा prabhatkumarroy — अगस्त 2, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. यथार्थ चित्रण. सटीक. लगभग 40 वर्ष पूर्व, स्वामि सहजानंद शास्त्रीजी ने चर्चा करते हुए समझाया था, गुरु ढूँढना नहीं पड़ता, गुरु किया नहीं जाता, वो तों पात्र को आ कर मिल लेता है. शिष्य कहीं नहीं हैं. गुरु तो बहुतेरे हैं. शिष्य होना कठिन है. गुरु सेवा के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा, गुरु आज्ञा पालन करना, सबसे बड़ी गुरु सेवा है. आपके अंतिम दो पदों में व्यक्त विचार. अत्यंत विचारणीय हैं. गुरु पूर्णिमा का एक बहुत सुन्दर व्यावहारिक सन्देश http://www.justbehappy.org/ पर दर्शनीय, मननीय है.

    टिप्पणी द्वारा सुरेन्द्र वर्मा — जुलाई 19, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. प्रणाम ! आपके सुलझे और सकारात्मक विचारों , गहरी दृष्टि, व्यापक ज्ञान और सटीक और निर्भीक अभिव्यक्ति का कायल हूँ! “पत्रिका” में आपके लेख , कवितायेँ नियमित पढता रहता हूँ ! शुभकामनाएं !

    टिप्पणी द्वारा Nirmal Kothari / निर्मल कोठारी — जुलाई 8, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  4. shreekothariji…maine abhi aapka aalekh padha hai. main lagataar dekh raha hoon ki aapme koi ”saptrishi”bedha hai. es aadhyatmik rishi ko ab bahar aana chahiye…mera suggesion hai ki rajasthan patrika ko ab ek ”aadhyatmik” patrika ka bhi prakashan aarambh karna chahiye.. desh aur aam admi ko sache dharm ka prakas dene ka waqt aa raha hai. apne mahan vedrishipita ko aapki yahi sachi ”prathana” hogi.
    ravidutt mohta ,progrrame excutive ,all india radio suratgargh

    टिप्पणी द्वारा ravidutt mohta — जुलाई 7, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  5. शानदार लेख, यही है वास्तविक स्थिति, गुरू हो तो आपके जैसा . जो सही गाईड कर सके,
    Like this, With Regards,
    pnsharma.com

    टिप्पणी द्वारा Purusottam Narain Sharma — जुलाई 4, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  6. GURU KI BAATO PAR AMAL KARKAR HUM UNHE SHRADHA SUMAN PRASTUT KAR SAKTE HAI..GREAT THOUGHTS SIR

    टिप्पणी द्वारा SAJJANRAJMEHTA — जुलाई 4, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  7. कालेधन ने तो समाज एवं धर्म दोनों में भोग का साम्राज्य खड़ा कर दिया।SAHI KAHA HAI PER KIYA YE SAHI HAI PURI TARAH?हिंदुस्तान के अंदर कार्यरत इलेक्ट्रोनिक मिडिया व् न्यूज़ पेपर वालो के पास जितना काला धन है | वह किसी के पास नहीं ? भ्रस्टाचार से सम्बन्धित कोई भी समाचार इलेक्ट्रोनिक मिडिया व् न्यूज़ पेपर वालो को दिया जाता है तो पहला सवाल यह होता है की इसमे आप का किया सवार्थ है ? में इलेक्ट्रोनिक मिडिया व् न्यूज़ पेपर वालो से पूछता हूँ की आप भ्रष्ट अधिकारी ,कर्मचारी,मंत्री ,मुख्यमंत्री , व्यापारी,उद्योगपती ,के विरुद्ध रिश्वत , भ्रस्टाचार से सम्बंधित समाचार आप लोग किस सवार्थ के तहत प्रकाशित करते हे व् इलेक्ट्रोनिक मिडिया में दिखाते है ?इसमे आप लोगो का सवार्थ छिपा होता है ?पैसा नहीं मिलने पर से रिश्वत, भ्रस्टाचार सम्बन्धित समाचार लगातार प्रकाशित किया जाता है व् न्यूज़ चनेल्स में दिखाया जाता है ,जब एन मिडिया वालो की मांगे पूरी हो जाती है तो ये लोग रिश्वत, भ्रस्टाचार सम्बन्धित समाचार छापना व् न्यूज़ चनेल्स में दिखाना बंध कर देते है | ऐसे प्रिंट मिडिया व् इलेक्ट्रोनिक मिडिया के पत्रकारों को भडवा शब्द के उपाधियो से नवाजा जाना चाहिए ? आज की मिडिया सिर्फ पेसो के लिए काम करते है | न की देश सेवा व् भ्रस्ताचार मिटने के लिए |
    अटल बिहारी वाजपई ने अपने भाषण में ठीक ही कहा था की बाजार में हर चीज बिकाऊ है यधि आप में खरीदने की छमता हो ?ये प्रिंट मिडिया व् इलेक्ट्रोनिक मिडिया को जो लोग खरीद लेते है उनके भ्रष्ट समाचारों को ये लोग नहीं छापते है | कोई भी अपराध छोटा या बड़ा नहीं होता ,अपराध तो अपराध होता है ,छोटे अपराध ही बड़े अपरद को जनम देता है .| जब में भ्रस्टाचार से सम्बन्धित समाचार लेकर प्रिंट मिडिया व् इलेक्ट्रोनिक मिडिया ने इसे छोटा अपराध बता कर नही लिया | जब शरीर में छोटा घाव होता है तो उसका तुरंत उपचार करना चाहिए अनिय्था वह घाव नासूर बन जाता है | प्रिंट मिडिया व् इलेक्ट्रोनिक मिडिया छोटे अपराध का समाचार छाप कर उसे रोकने का प्रयास नहीं करते बल्कि बड़े अपराध बनने देता है ताकि जियादा धन वसूल किया जा सके ?
    ऐसे लोगों को पत्रकार कहना पत्रकारिता का अपमान होगा, परन्तु इनकी नीचता और निर्लाजता को देखते हुए इनके लिए ‘भड़वा’ शब्द अति उपयुक्त है

    टिप्पणी द्वारा kuldip singh akherajot khichan — जुलाई 3, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  8. guru chamatkari ho.yeh sampadkiye lekh bahut acha laga. guru or bhagwan mere dukho ka nivaran karege yeh aik dharna muje mere ashram me ya guru ke pas le jati hai jo muje mere gobind se milwata hai . yeh aik atpati see bat lagti hai. vastav mai aik manav apni kee hui vikartao ko bhul jane ke liye hee guru ke darbar jate mane jhut bola or kapat kia irsha or nafrat se bhara mera man guru ka sahara leta hai yeh sach hee hai bajaye iske kee mai apne aap ko sudh karu . mai kishi guru kee talash mai bhatkta hu.
    nirasha dukh or dard atah mera dhukhi bhav mer vicharo mai keval aik vichar ya soch hee hai jo samay ane pa apne ap he samapt ho jati hai. yeh sab sabd hee hai jo muje niras karte hai. or inn sabdo ko sirf aik insan namak janvar hee samjta hai koi or jannvar jeev nahi jiske pas koi lipi nahi hai .bhala sochiye aik janvar kis ko shukh or dhukh kehta uske pas to koi sabd lipi nahi hai . vo sukh dukh ko aik samjhata alag nahi.

    टिप्पणी द्वारा CHARAN JEET MANCHANDA AHMEDABAD. — जुलाई 3, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • लेख आपको अच्छा लगा, साधुवाद। लोग ऐसा भी करते हैं, लेकिन सभी लोग नहीं।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — अगस्त 18, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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