Gulabkothari's Blog

जुलाई 15, 2012

गृहस्थी-1

ईश्वर की सृष्टि का अपना समीकरण है। वहां किसी प्रकार का समझौता संभव नहीं है। वहां कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। कुछ अच्छा-बुरा नहीं होता। मनुष्य की बुद्धि में इसलिए नहीं आता कि वह उधर सोचता ही नहीं है। उसकी अपनी दुनिया में वह स्वयं कर्ता बनकर खोया रहता है। अच्छे-बुरे या सही-गलत के उसके अपने नियम हैं। अपनी इच्छा से कर्म करता है। इच्छानुसार फल की कामना करता है। इसी फल के साथ उसकी आशा-निराशा जुड़ी रहती है। इसके बाहर कुछ भी नहीं।

 

 

ईश्वर स्वयं कर्म नहीं करता। माया ही क्रिया का पर्यायवाची है। कर्म माया करे और फल ईश्वर को भोगना पड़े ? माया के सारे कर्म  ब्रह्म के बाहर कैसे हो सकते हैं। माया ब्रह्म के बाहर नहीं है। अकेली नहीं रह सकती। माया ही भूत-भविष्य-वर्तमान की जननी है। सारे रिश्ते प्रारब्ध से तय करती है। परिवार का आधार प्रारब्ध है। ब्रह्म अथवा जीवात्मा का प्रारब्ध। कर्म क्षेत्र अथवा विश्व माया के विभिन्न रूपों का विस्तार है। कर्म का आधार भी इच्छा (मन), क्रिया (प्राण) ही है। आत्मा मात्र साक्षी रहता है। घर में भी, परिजनों के बीच में भी।

 

इतना स्पष्ट अवश्य है कि परिवार के हर सदस्य का संबंध पूर्वजन्म और पिछले कर्मो के आधार पर टिका होता है। जीवन का बड़ा लक्ष्य इस ऋणानुबंध से मुक्त होना है। नए ऋणानुबंध पैदा नहीं हों, ऎसे कर्म वर्तमान में किए जाएं। तभी भविष्य में नए जन्म से मुक्ति मिल सकेगी। इसलिए परिवार को ही मोक्ष का पहला हेतु मानना पड़ेगा। घर से भागने वाला, अपने ऋणों को न चुकाने वाला, उत्तरदायित्व से बचकर भागने वाला सदा कर्जदार ही रहेगा।

 

व्यक्ति का इस संसार में प्रवेश मां-बाप को निमित्त बनाकर होता है। वे भी प्रारब्ध और भूतकाल से प्रभावित होते हैं। वर्तमान के कर्म मां-बाप के साथ बहन-भाई तथा पति-पत्नी जैसे एक ही पीढ़ी के साथ अघिक होते हैं। इनका साथ अघिक काल तक रहता है। भविष्य की अवधारणा बच्चों के साथ अघिक जुड़ी होती है। जीवन के सर्वाघिक कर्म इसी क्षेत्र के होते हैं। भावनात्मक रूप से अत्यन्त गंभीर और गहरे होते हैं।

 

सत-रज-तम के आवरण यहीं रहकर समझे जाते हैं। इन्हीं का नाम संस्कार है। मन पर पड़ने वाली छाप का नाम ही तो संस्कार है। इसी से व्यक्ति के स्वरूप का निर्माण होता है। इसी स्वरूप से घर ही स्वर्ग और नर्क बन जाता है। प्रश्न यह है कि हम घर के इस स्वरूप के बारे में कितने चिंतित रहते हैं। इस स्कूल में प्रत्येक व्यक्ति एक किताब का काम करता है। हर घटना एक अनुभव है, जो आगे की घटना के समय उपयोगी होता है। इसी घर में देव-तिर्यच-पशु-मनुष्य रहते हैं। कुछ लोग शरीरजीवी, बुद्धिजीवी, कुछ मनोजीवी/ मनस्वी होते हैं। कहीं-कहीं कुछ आत्मजीवी भी मिल जाते हैं।

 

घर में ही धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की सिद्धि का आधार तैयार होता है। मोक्ष को बाहर जाकर प्राप्त करने में वर्षो लग जाते हैं। घर से मोक्ष का द्वार सबसे नजदीक होता है। दिखाई तो इसलिए नहीं देता कि व्यक्ति आज की जीवन शैली में गृहस्थाश्रम से बाहर ही नहीं जीना चाहता। वानप्रस्थ और संन्यास दोनों ही भोग संस्कृति की भेंट चढ़ गए। विद्या(धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य) के अभाव में अविद्या (अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष (आसक्ति), अभिनिवेश) ने अपना जाल फैलाकर सबको पशुभाव में ही (आहार-निद्रा-भय-मैथुन) जकड़ लिया।

 

समय के साथ मर्यादा और लज्जा भी विदा होने लगे। अंहकार और ममकार परिवार में हावी हो गए हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या जैसे असुर भी प्रारब्ध से साथ ही आए होते हैं। तब हर सदस्य अलग-अलग मुखौटे लगाकर एक दूसरे से व्यवहार करते हैं। यही माया का स्वरूप है। व्यक्ति हर सदस्य से अलग तरह का व्यवहार करता है। पिछले कर्म-फल भोगने के कारण। न तो किसी  को अपना सही स्वरूप पता होता है, न दूसरे का सही स्वरूप, मुखौटे के कारण, जान पाते हैं। केवल अच्छे संस्कार ही व्यक्ति को सही ज्ञान तक पहुंचा सकते हैं।

 

परिवार में बहुत कुछ थोपा भी जाता है। अघिकारों का दुरूपयोग भी होता है। प्रकृति द्वारा दिए गए संबंधों को व्यक्ति कर्ता रूप में अपनी सम्पत्ति मान बैठता है। एक लड़के या लड़की को एक परिवार में शुरू से लेकर आखिरी सांस तक यदि देखा जाए, तो धर्म और अधर्म के सभी पहलुओं में से व्यक्ति गुजरता हुआ दिखाई दे जाएगा। किसी भी गृहस्थी को देख लें, एक ही परिवर्तन दिखाई देता है और उसी के साथ स्वर्ग तथा नरक की परिभाषा जुड़ जाती है। यही तो है माया का फेरा। कन्या का नारी रूप होकर किसी दूसरे परिवार में प्रवेश करना।

 

सदा-सदा के लिए। यही आत्मा को आवरित भी करती है और यह ही आवरण हटाने का हेतु बनती है। पुरूष के जीवन में ऎसा अवसर आम तौर पर नहीं आता। पुरूष पूरी उम्र अपने ही घर में रहता है। एक ही तरह की जीवन शैली और वातावरण में रहता है। मां, दादी, बहन जैसे संबंधो के रूप में उसका माया से परिचय होता है। यह सभी संबंध भावनात्मक हो सकते हैं, किन्तु आत्मीय धरातल को नहीं छू पाते।

 

जैसे ही विवाह के साथ एक नई स्त्री उसके घर में प्रवेश करती है, एक भूचाल आ जाता है। भावनात्मक रिश्ते ढीले जान पड़ते हैं। घर के हर सदस्य को एक कदम पीछे खींचना पड़ता है, जिसकी प्रतिक्रिया का नाम गृहस्थी है। प्रतिक्रिया भी माया भावों में ही अघिक होती है। पुरूषों की प्रतिक्रिया नई दुल्हन के प्रति सदा मीठी ही होती है। उसमें परिवार का विस्तार दिखाई देता है।

 

इसी परिवार में इस स्त्री के कितने स्वरूप बनते-बिगड़ते दिखाई पड़ते हैं। पुरूष तो लगता है पत्नी के ठेलने पर ही चलता है। वरना तो वह बदलने को शायद तैयार ही नहीं हो। स्त्री के भी दो स्वरूप सामने होते हैं। एक पत्नी का समर्पित भाव, जो पति को ऊध्र्वगामी बनाता है। बच्चों को संस्कार देता है। पति की सहयोगी बनकर सास-ससुर तथा बच्चों का पोषण करती है। माया-महामाया-योगमाया बनकर कर्म करती है। अपने ब्रह्म के नाम पर। दूसरे स्वरूप में वह स्वयं अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाकर जीना चाहती है।

 

शुद्ध बुद्धि के सहारे। जिसके अहंकार को हर बार सहज ही ठेस लगती रहती है। शब्दों को पकड़कर तर्क में उलझ जाती है। नियति को, कारण को नहीं पकड़ पाती। परिवार के बीच अकेली जीती है, किन्तु हार नहीं मानती। यहां पति के भी दो रूप बन जाते हैं। एक: वह स्वयं भी पत्नी जैसा व्यवहार करने लगे। कलह का संगीत बजता रहे। दोनों साथ भी रहें, झगड़ते भी रहें।

 

दो: पति इस स्वभाव को प्रारब्ध मानकर प्रायश्चित में लग जाए। उसकी प्रज्ञा के जागरण का मार्ग खुल जाता है। ईश्वर से नित्य प्रार्थना करता है कि बंधन से मुक्ति दिलाए। आगे फिर ऎसे कर्म नहीं करूं। कई ऎसे उदाहरण शास्त्रों में भरे पड़े है, जहां ऎसी पत्नियां ही व्यक्ति के मोक्ष का कारण बनती हैं। ऎसी पत्नी के डर से घर छोड़कर भागने वाले को मोक्ष नहीं मिल सकता। हो सकता है कि वह कहीं और जगह जाकर अटक जाए। श्रद्धा, प्रेम, वात्सल्य तो बंध के कारण ही बनते हैं। उसमें तो धर्म आधारित आचरण का ही पोषण होता है। घर अपने आप में स्वर्ग समान बना रहता है।

 

गुलाब कोठारी

 

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5 टिप्पणियाँ »

  1. best information to understand spiritulatyin true sense

    टिप्पणी द्वारा ashok nagori — जुलाई 26, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. Gulabji really inspired by your thoughts. keep sharing with us. Wishing you a happy healthy life.
    Regards
    Bhawna

    टिप्पणी द्वारा Bhawna — जुलाई 22, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. Grasthi se samvandhit yah lekh kai gudh tathyon ka parichay karaata hai. sadhuvaad.

    टिप्पणी द्वारा shailendra saxena — जुलाई 15, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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