Gulabkothari's Blog

अगस्त 5, 2012

गृहस्थी-3

माया और योगमाया का भाव यूं तो प्रत्येक प्राणी में होता है, किन्तु पुरूष के अनुपात में प्रकृति में अघिक होता है। माया भाव पुरूष के स्वरूप का लक्षण है, शक्ति रूप है। अत: स्त्री-पुरूषों में बराबर (नित्य) विद्यमान रहता है। जब स्त्री अपनी पूर्णता प्राप्त करने तथा पुरूषों कोे भी पूर्णता देने के उद्देश्य से पुरूष के पास जाती है, तब उसका एक अघिकारी रूप-महामाया का रूप-उसके व्यक्तित्व में प्रतिलक्षित होने लगता है। माया भाव ब्रह्म का विवर्त बनाता है, महामाया भाव मर्यादाओं की प्रतिष्ठा करता है। असुरों का संहार करता है।

 

 

देवताओं को राहत की अनुभूति प्राप्त होती है। योगमाया सबके भीतर प्रविष्ट होकर जिसको जो चाहिए, प्रदान करती है-कर्म फल रूप। परिवार एक ऎसी संस्था है, जिसका मुख्य आधार भावनात्मक धरातल है, किन्तु उसका प्रतिनिघित्व बौद्धिक धरातल करता है। स्त्री परिवार की धुरी होती है। जिस परिवार में पुरूष इस क्षेत्र में दखल करता है, वहां सदा द्वन्द्वात्मक स्थिति ही बनी रहेगी। घर की सभी çस्त्रयां मन के धरातल पर व्यवहार करती हैं। उनका ज्ञान व्यावहारिक भी होता है और बहुआयामी भी होता है। सृजन, पालन-पोषण करने कारण उनमें जीवन के प्रति एक निश्चित दृष्टि भी होती है।

 

इसके लिए किसी स्कूली शिक्षा की जरूरत नहीं पड़ती। जैसे मां बनने के लिए किसी मादा को प्रशिक्षण की जरूरत नहीं पड़ती। çस्त्रयों में स्वभावत: मातृत्व भाव टपकता रहता है। भले ही वे अपनी पिछली पीढ़ी से बात करती होंगी। पुरूष इस आवरण को आसानी से हटा नहीं पाता। यह अलग बात है कि अति शिक्षित नारियों में अब यह गुण लुप्त प्राय: हो रहा है। उनका स्त्रैण भाव ही पीछे छूट रहा है। जिस परिवार के केन्द्र में ऎसी नारियां होगी, वहां जीवन का प्रारूप बौद्धिक स्तर का अघिक होगा। स्नेह, ममता, वात्सल्य अल्प मात्रा में होंगे।

 

प्रकृति ने इनको दिए थे, शिक्षा ने छीन लिए। अपने पेट के आगे सोचना ही बंद हो गया। समाज का चिन्तन भी पेशे से जुड़ा होता है। शिक्षा के कारण व्यक्ति की मानसिकता अघिक संकुचित हो जाती है। शिक्षित व्यक्ति का एक मात्र उद्देश्य धन कमाना रह जाता है। हर कार्य धन को लक्षित करके ही करता है। जैसे मेडिकल साइन्स की गणनाएं अंकों में आकर ठहर गई हंै, वैसे सारे व्यवसायी अपने-अपने काम की योजनाएं भी धन की भाषा में ही करने लगे हैं। काम का स्तर और विस्तार अपनी परिभाषाएं खो चुके हैं। नए समाज का निर्माण धन के स्तभों पर ही खड़ा होगा। भौतिक सुख, उधार लेकर घी पीना तथा जहां तक बन पड़े धन खर्च करके स्वयं को मुक्त बनाए रखना जीवन के गौरव में शामिल हो गया।

 

नई समृद्ध गृहस्थी तो अमरीका के पद चिन्हों पर चल पड़ी है। नकल के सहारे, आंखें मूंदकर भागते जा रहे हैं। मंजिल का पता किसी को नहीं है। मार्ग का निर्णय कैसे संभव होगा? यात्रा शुरू होगी? किसी को यह भी मालूम नहीं कि अमरीका में गृहस्थी कैसे चल रही है। परिवारों का स्वरूप क्या है। सुख-दुख के अर्थ क्या हैं। हम यदि समय के साथ वैसे ही हो गए तो? इतने चिंतन करने के लिए किसके पास समय है। कुछ कष्ट हो तो दोष किसी और के सिर डाल देंगे। जीना तो स्वच्छन्द होकर ही है। इसी को बंधन मुक्त जीवन मानकर चलने लगे हैं।

 

बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ कि उसे पढ़ने लिए बाहर भेजने की तैयारी शुरू हो जाती है। वैसे भी ऎसे घरों के बच्चे मां-बाप के भरोसे कहां बड़े होते हैं। मेम साहब सुबह उठती हैं, तब तक नौकर-चाकर बच्चों को तैयार करके, टिफिन बनाकर, स्कूल छोड़ आते हैं। वे ही दिन भर उनको रखते हैं। पार्क ले जाते हैं। गाली-गलौच सिखाते हैं। कभी-कभी मां-बाप उनको महंगे खिलौने, आइसक्रीम, कपड़े दिलवाने ले जाते हैं। नियमित जीवन में  कभी दो घंटे रोज उनके लिए नहीं होते। अत: बाहर भेजने का निर्णय भी सहज हो जाता है। मां-बाप के अहंकार की तुष्टि हो  जाती है। हां बच्चे का दुर्भाग्य बस इतना होता है कि कष्ट के समय उसे मां-बाप नहीं मिलते। फोन पर बात करना, रोज खाने-सोने की पूछते रहना भी फैशन के जैसा हो गया है।

 

अच्छे स्कूल का बच्चा अच्छा तो होगा ही। फिर वहां पढ़ाई के अलावा और कुछ नहीं होता। अच्छी नौकरी भी सुनिश्चित हो जाती है। बच्चे के सदा के लिए दूर होने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। मां-बाप निर्भय होकर स्वच्छन्दता का सुख भोगते रहते हैं। वे इसी बात से गौरवान्वित रहते हैं कि उनका बच्चा कहीं विदेश में लाखों रूपए की नौकरी कर रहा है। मां-बाप दोनों की अपनी-अपनी दुनिया भी अलग-अलग। बूढ़े-बडेरे खर्च से पहले ही विदा हो चुके  होते हैं। हां, उनके स्थान पर कुत्ता-बिल्ली अवश्य घर में प्रवेश कर जाते हैं। मध्यम वर्ग की गृहस्थी मेें तो आज चादर छोटी पड़ने लग गई। कमाई सीमित और कामनाएं असीमित होती जा रही हैं। सपने तो ये लोग भी अमीरों जैसे देखने लगे हैं। माहौल का संचालन शून्य प्रतिशत ब्याज करने लगा है। प्रभावित होने लगे हैं टी.वी. से, इण्टरनेट से। अब तो किसान भी पड़ोसी के टे्रक्टर से ईष्र्या करता है। लोन लेता है, टे्रक्टर लाता है।

 

भले ही आगे चलक र किस्तें न चुका पाए। गृहस्थी और वह भी शिक्षित दम्पति की, ऋण पर ही टिकने लगी है। पति चाहता है मोटर साइकिल की जगह कार। पत्नी महंगे अंग्रेजी स्कूल में बच्चों की शिक्षा और उनके हैप्पी बर्थ-डे की पार्टियां। हर एक को इस चाहत का अघिकार है। चादर भी चाहिए पैर पसारने को। आने वाले कई महीनों का वेतन उधार के रूप में खर्च करने लगे हैं। अचानक कोई बड़ा खर्च आ पड़े, तो सामान बेचने तक की नौबत आ जाती है। किसानों की आत्म हत्याओं के पीछे कर्ज ही है।

 

भोग संस्कृति में मानव के जीवन मूल्यों में गिरावट आ गई है। बड़ों के प्रति श्रद्धा का अचानक लोप होने लगा। अध्यापक से कोई नाता नहीं रहा। व्यापारी लगते हैं। इस कारण घर का वातावरण प्रभावित होने लगा। बच्चे जिस प्रकार टीचर से बात करते है, वैसी ही रूखी भाषा से घर के सदस्यों से भी बात करने लगे। बड़ों के आदेश की पालना तीसरी पीढ़ी में समाप्त हो गई। कोई दादा-दादी अपने पोते-पोतियों से परम्पराओं की, मूल्यों की, संस्कृति की कोई बात मनवा नहीं पाते। दोनों पीढियों की दिशा भिन्न है। दादा-दादी का हारना निश्चित है।

 

अन्त में वे स्वयं ही बच्चों की बात मानने को राजी हो जाते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि नाक के नीचे इतना सारा परिवर्तन हो गया, पीढ़ी ही चिन्तन से पराई हो गई और परिवारों में किसी को न तो पता ही पड़ा, न कोई भूमिका ही रही। बच्चों का क्या कसूर? इसका एक बड़ा असर ये भी पड़ा कि हर कोई स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय लेने लगा। घर का मुखिया अपनी उपयोगिता खो बैठा। संसाधनों से भी उसकी पकड़ छूट गई। सारी नई जीवन शैली बुद्धिमता पर आकर टिकने लगी है। अध्यात्म का धरातल चर्चा से ही बाहर होने लगा है। हर घर में जीवन एकपक्षीय हो गया है। स्वजन, परिजन, समाज, संगठन कितने दिन और जी पाएंगे, कहा नहीं जा सकता। संवेदनशीलता के अभाव में, स्वच्छन्दता फिर से मानव को नारकीय जीवन जीने को मजबूर करने लगी है। घर के रिश्ते नकली, बिखराव को न्योता देने लगे हैं। खून के रिश्ते से धन और भी आकर्षक लगने लगा है।

 

गुलाब कोठारी

 

2 टिप्पणियाँ »

  1. heart touching LAAJABAB N.M.Surana

    टिप्पणी द्वारा N.M.SURANA — अगस्त 6, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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