Gulabkothari's Blog

अगस्त 12, 2012

गृहस्थी-5

राम अयोध्या के बाहर मुक्त नहीं हुए। न ही कृष्ण द्वारका के बाहर से ही चले गए। यह इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति जिन बंधनों को लेकर पैदा होता है उस स्थिति से बाहर होना पहली अनिवार्यता है। पुरूष सदा ही साक्षी रूप और आधी सृष्टि उसे फंसाने, बांधने और पशु बनाने को सदा आतुर। स्वरूप कोई हो, इरादा तो माया भाव ही है।

 

 

अकेले पुरूष के जीवन में किसी प्रकार की सांसारिक गतिविघि नहीं होती। अकेली कन्या की जीवन शैली कार्यकलापों, परंपराओं, व्रत-तप-अर्चन से लेकर मां का गृहकार्यो में सहयोग, छोटे भाई-बहनों की देखभाल आदि कार्यो से भरी रहती है। मां भी उसी को प्रताडित करती है। बेटा तो मानो विशिष्ट सुविधा प्राप्त जीव होता है। बेटी को दूसरे घर जाकर रहना है। पूरी तरह प्रशिक्षित करके भेजना चाहिए। वरना, उसकी सास पूरी उम्र लड़की की मां को ही कोसती रहती है। नया घर बेटी के लिए नरक बन जाता है। बेटे को तो साथ ही रहना है।

 

देख लेंगे। हां, कन्या पूजन से लेकर कन्यादान तक की यात्रा शक्ति के विकास की यात्रा कही जा सकती है। स्नेह, ममता, वात्सल्य, धैर्य, सहनशीलता, सेवा आदि गुणों से लेकर मंत्र, अनुष्ठान, पूजा और स्त्रैण भाव से ओत-प्रोत हो जाती है। स्वयं के बजाए शेष घरवालों के लिए जीना सीखती है। हंसती है, गाती है, नाचती है, शिवजी को रिझाती है। वहीं से वर मांगती है, संतान मांगती है। पार्वती से सुहाग के लिए जीने की आशीष मांगती है। माया स्वयं के लिए नहीं ब्रह्म के लिए जीती है। प्रश्न उठ सकता है कि शिव कौन है। उससे मांगा हुआ कैसे प्राप्त होता है। हमारे पिता सूर्य का नाम शिव है। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र नाम के तीन अक्षर प्राण हमारा और इस सम्पूर्ण सृष्टि का ह्वदय बनते हैं। इन्हीं की अग्नि-सोम पर होने वाली क्रियाओं से सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण होता है। इन तीनों प्राणों के एक तžव में सूर्य उत्पन्न हुआ। तीन देवों के मिश्रण से त्रिनेत्र कहलाया।

 

चारों ओर फैले जल समुद्र की ही गंगा उपाघि है और सूर्य गंगाधर। आकाश रूपी ललाट पर चन्द्रमा से चन्द्रमौली कहलाते हैं। सूर्य से हमको ज्योति, आयु तथा गौ (विद्युत) प्राप्त होती है। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र मेरा ह्वदय है। उसमें जो भी कामना पूर्ण मनोयोग से दोहराई जाएगी, वह तो ईश्वर की ही कामना बन जाएगी। यहां ज्योति से ज्ञानमय चेतना का आशय है। इसका स्थान विज्ञानमय कोष है।

 

अन्नमय, प्राणमय, मनोमय कोषों को पार करने पर विज्ञानमय कोष के द्वार पर व्यक्ति पहुंचता है। जगत का सम्पूर्ण रेतस (वीर्य या बीज) सूर्य में ही उत्पन्न होने से वही सृष्टि का पिता है। रेतस की शक्ति से ही आयु का निर्घारण होता है। सूर्य रश्मियों के माध्यम से हमारी एक-एक दिन की आयु सूर्य को लौटती रहती है। सूर्य से प्राप्त विद्युत (गौ) ही इस जीवन को चलाती है। गोलोक सूर्य से ऊपर (चारों ओर) है और वहां से सविता ही विद्युत (गायत्री) बनकर आती हैं।

 

भारतीय नारियां पति रूप शिव को ही ह्वदय में प्रतिष्ठित करके जीती है। स्वयं पति की शक्ति रूप निमित्त रहती है, जबकि कर्ता वह स्वयं है। सारे विश्व में गतिविघियों का आधार भी स्त्री बनती है। घर में जब तक स्त्री (पत्नी रूप) नहीं आ जाती, सब कुछ यांत्रिक चलता है। घर के केन्द्र में तो फिर भी स्त्री ही होती है। जिस घर में नारी नहीं, वही विश्व का सबसे बड़ा उजाड़ है। कई औरतें इस उद्देश्य से भी घर में आती हंै।

 

दाम्पत्य भाव जीवन का सबसे बड़ा क्लास रूम है। सबसे बड़ा परीक्षा केन्द्र है। ईश्वर कुछ भी देने से पूर्व पात्रता की परीक्षा लेता ही रहता है। घर बसाने और चलाने के लिए कैसे-कैसे पापड़ नहीं बेलने पड़ते। पति-पत्नी दोनों प्रात: जल्दी उठकर काम में लग जाते हैं। सोने वालों में भी वे अन्तिम प्राणी होते हैं। किसी पुरूष सदस्य को रोटी के लिए काम करते देखें तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे। कष्ट का भी अनुमान नहीं और फल का भी। मेरे दादाजी अनाज की गाडियों के अनाज को तराजू से (बाजूओं से पांच-पांच किलो करके) तोलते थे। शरीर तो वैसे ही पिंजरापोल था। कृशकाय, साधनों का पूर्ण अभाव, स्वाभिमान का अपना ही रूप। एक-एक दिन में 4-5 गाडियों का अनाज तौल कर उस मजदूरी से घर चलाते थे। दादी जी स्वयं चरखा चलाकर सहायक बनी रहती थी। एक व्यापारी परिवार को छोड़कर यूं जीविकोपार्जन करना तो सबके लिए कष्टकारी था। शिक्षकों को कभी इस तरह कष्ट पाते नहीं देखा। बहुत सम्मान था घर-घर में उनका। स्त्रैण भाव था उनमें।

 

माया और कामना पर्याय है। उसके गृह प्रवेश के साथ ही मन में कामनाओं का ज्वार उठता है। आज तो मन भी बदल गया और कामना भी। विवाह के बाद लगभग 15 दिनों तक घर में उत्सव का वातावरण बना रहता था । सारे लोगों से परिचय, हास-परिहास के माध्यम से दुल्हन के कौतुहल भरे मन को शान्त किया जाता है। पति-पत्नी के बीच सहजता बनाने के प्रयास होते हैं।

 

एक अनूठी मिठास भरी होती हर ध्वनि में, हर आंख में। माया ने जैसे सबके मनों में मादकता भर दी हो। यह और बात है कि आज दूल्हा-दुल्हन दोनों को ही इस वातावरण की जरूरत नहीं लगती। विवाह की रात के एक-दो दिन बाद ही हनीमून को चले जाते हैं। यह है नया माया का अवतार। हर गृहस्थी का स्वरूप ही बदल गया। ब्रह्म खो गया। चारों ओर माया ही माया। क्यों छीनती है माया जीव को स्वजनों से?

 

गृहस्थ जीवन को शारीरिक दृष्टि से मौज-मस्ती और भौतिक सुखों की चकाचौंध भी कहा जा सकता है। व्यक्ति का कर्ताभाव परिवार को नरक बना देगा। इसी को आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वर का प्रसाद मानकर सिर-आंखों पर रखकर जिया जा सकता है। इसी देह के माध्यम से व्यक्ति 84 लाख योनियों के बन्धन-आवरण काटता है। क्षर-अक्षर पुरूष की साधना करके अपने अव्यय पुरूष रूप कृष्ण से साक्षात्कार कर सकता है।

 

नारायण हो सकता है। कितनी जटिल है मानव देह और उसके द्वारा 84 लाख योनियों के ऋृणानुबन्ध से जीव को मुक्त करना। परिवार का हर सदस्य भी अपने-अपने 84 लाख जन्मों के कर्म फलों का आदान-प्रदान करेगा। कौनसा सुपर कम्प्यूटर प्रकृति की इस गणना का रहस्य समझा सकता है? क्या इतनी शक्ति प्रत्येक आत्मा में होती है? क्या इस समझ के लिए आत्मा को कृष्ण का दर्जा दिया गया है? दूसरी ओर हम देखते हैं कि ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास, तीनों आश्रम भी गृहस्थ पर टिके हैं। भावी सृष्टि का सृजन, दशा और दिशा का भार भी गृहस्थाश्रम पर रहता है। और यह भी लगता है कि संसार का हर प्राणी अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार गृहस्थी चलाने में दक्ष भी है।

 

अन्य किसी प्राणी को पेट भरना सीखने के लिए शिक्षा की जरूरत नहीं पड़ती। जो कुछ मां के रूप में माया भाव ने सिखा दिया, बस काफी है। प्रत्येक जीव को मानव बनाती है मां। शरीर के तीनों तंत्र, शरीर-मन-बुद्धि, जब तक आत्मभाव/जीवभाव से एकाकार नहीं हो जाते, तब तक देह को मानव कहना उचित नहीं होगा। माया ही जीव को नर देह में मानव बनाती है तथा माया ही नर देह को त्याग कर जीव को नारायण बना देती है। स्वयं उसी में लीन हो जाती है।

 

सही अर्थो में तो इस लीनता का नाम ही गृहस्थ भाव है। पुरूष के स्पर्श से जैसे ही स्त्रीत्व का जागरण होता है, बस वही लीनता का काल है। यह काल दोबारा नहीं आता। नदी की यह लीनता ही उसे सागर बना देती है। दाम्पत्य का भारतीय स्वरूप यही है। यहां विवाह के बाद एक ही स्वरूप रह जाता है। एक होने पर ही पुरूष का स्त्रैण भाव बढ़ पाता है। क्योंकि सारा स्त्रैण उसके भीतर ही फैलता है। यही उसकी पूर्णता हो जाना है। स्त्रैण ही चेतना का जागरण करती है, आनन्द में स्थापित करते हुए पार करती है। लीनता के कारण स्वयं भी सागर बन जाती है। गृहस्थ ही सागर, नैया और पार जाने की प्रेरणा है।

 

गुलाब कोठारी

 

6 टिप्पणियाँ »

  1. like your all articles, this article is again fabulous…
    In many of the articles, sir you have written that through the women only a men can attain liberation or he can meet Avaya Purush, but in current scenario most of the men doesn’t want such type of wife, they want womens like the western countries just to have sense gratification. That is why it seems that women has lost its qualities (स्त्रैण भाव).
    Your articles are always to wake up the slept soul and to live a spiritual life, which is the haapiest culture.
    THANKS for writing such articles sir….

    टिप्पणी द्वारा nikhil jain — अगस्त 31, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. गृहस्थ जीवन का भौतिक जगत से लेकर अध्यात्मिक स्तर तक का वर्णन अद्भुत

    टिप्पणी द्वारा rajendra sharma 'vivek' — अगस्त 15, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. सदा की तरह आपका आलेख ज्ञानवर्धक और प्रेरणा दायक है ! “लड़की की शिक्षा कैसी होनी चाहिए ??” इस बारे में आपका मार्गदर्शन बहुत ही गहराई लिए होता है ! दांपत्य जीवन और पति-पत्नी के आज के जीवन में जो सिर्फ बौधिक तत्व और अहम् का टकराव उभर रहा है उसका निवारण परिवार और भावी समाज कि सुख शांति के लिए आवश्यक है ! उसके बारे में आप जैसे प्रबुद्ध और संवेदनशील “मायित” का मार्गदर्शन अमूल्य है ! प्रणाम !

    टिप्पणी द्वारा Nirmal Kothari — अगस्त 12, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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