Gulabkothari's Blog

सितम्बर 3, 2012

रे मनवा मेरे!

रे मनवा,कहां चला रे,बाहर-बाहर,जगत के जाल में,कुछ फंसनेकुछ फांसने,जाता है रो…
रे मनवा,
कहां चला रे,
बाहर-बाहर,
जगत के जाल में,
कुछ फंसने
कुछ फांसने,
जाता है रोज
आता नहीं लौटकर।
क्या तेरा व्यापार
जगत में,
क्या तेरा व्यवहार,
भरता नहीं पेट रे
लोभ से, तृष्णा से,
राग और द्वेष से,
किसी की चमड़ी प्यारी,
किसी की दमड़ी,
कौन लगे खोटा
कौन लगे प्यारा,
माया का जाल
है ये जग सारा।
कोई ले जाता तुझे
भरकर अहंकार में,
तोड़ता मर्यादा
मन की हुंकार में।
बांधता है खुद को
मर्जी के नाम पर,
कैसी स्वतंत्रता यह
कैसा अज्ञान है।
रे मनवा,
क्यों झूमता
इस धुन पर,
क्यों थिरक रहे पांव,
क्यों गया रे वहां
नहीं तेरा गांव।
पता नहीं तू
भागता पीछे-पीछे
इन्द्रियों के विषयों के,
अथवा पकड़ती तुझे
माया ही
इन्द्रियों के जरिए।
तू है पागल
मेरे मनवा
बंधा पड़ा माया से,
माया भोगे तुझको
हर पल
रूप बदलकर
छाया से।
लोग कहे
माया है पत्नी,
तब क्या है
शेष जगत की रचना,
क्या है गंध,
स्वाद, रस, भाषा,
क्या दिखता है
आंखों से,
क्यों बन जाते
सारे बन्धन,
मन को बींधकर,
बांधकर
नचाते रहते हैं
जीवन भर,
और जान कहां पाया
तू
गुजार दी योनियां
चौरासी लाख,
बस एक भूत
सवार तेरे सिर पर
“एकोहं बहुस्याम”1
देखी तेरी शक्ति
देख ली माया तेरी,
आंख-मिचौनी
तुम-दोनों की
बदले कितने रूप
हर योनि में
तूने भोगे
माया रूप अनन्त,
“बहुस्याम्” की
क्या परिभाषा
जान न पाया संत
“अलख-निरंजन”
की तर्ज पर
कब उठ जाती
मन में तरंग
“बहुस्याम” की,
पूरी उम्र
ढूंढता धरती
नई बुवाई करने को,
छk वेश में
माया ढंकती
तेरी इन करतूतों को,
माया का स्वामी
तू ही है
माया तेरी दास,
करती सब
तेरे इंगित पर
फिर भी तू उदास,
क्यों फंसा है
लेन-देन में
बनकर तू व्यापारी
तू तो स्वामी
है इस जग का
नर हो चाहे नारी,
कुछ दिन देख
बैठकर भीतर
माया के सब रूप,
साक्षी भाव में
समझ सकेगा
जीवन अंधा कूप।
इस अज्ञान अंधकार में
पलते हैं दो पूत
ममकार2 का मोह
साथ में फुफकारे
अभिनिवेश3 का
अहंकार।
मोह की सीमा
नहीं कोई
तन की, मन की,
धन की,
रस की, स्वाद की,
श्रवण, स्पर्श की
यश की
संतानों की,
अभिमानी के
नेत्र सुखों की
गिनती है अनजानी।
पुनरावृत्ति प्रमाण
मोह का
जीवन की कमजोरी,
माया आती
पलट-पलट कर
रचने को व्यापार।
सोच कभी तो
क्यूं तू आया
धरकर मानव देह,
कार्य हो चुका,
काल गया तब
क्यों उलझे
नित नेह?
आ, लौट चलें
अपने घर को,
क्षमा मांगकर सबसे!
माया के रूपों से
खोल सके
सब बन्धन मन के,
मुड़-जाएं भीतर
इन्द्रियां मन की ओर,
आत्मा के संग
जुड़ सके
मन की डोर,
आत्मभाव भी
लीन हो सके
सागर से ईश्वर में,
आ, लौट चलें!

रे मनवा
आया था तू
एक संकल्प लेकर
इस देह में
“एकोहं बहुस्याम”।
पुरूष रूप तेरा
घिरा था
माया के घेरों में,
बंधा था केन्द्र में
बेबस, निरीह सा,
छटपटाहट सी
बनी है आज भी
मुक्ताकाश की,
लौट जाने की
जहां से आया था
इस ओर।
जी चुका है खूब तू
इस देह में,
हो गया है मोह
तुझको देह से
देह-सुख से,
डर चला है
मृत्यु के आगोश से।
भूल चुका क्या
आना-जाना
एक क्रम है
सृष्टि का,
क्या देखे नहीं
तूने खुद ने भी
क्रम 84 लाख
आने-जाने के,
कौन सी देह
धरी नहीं तूने,
कौन औषध और
वनस्पति नहीं खाई
इस सृष्टि की?
देव था, असुर था
रह चुका पशु-पक्षी भी
तब आया लेकर
मानव देह,
ताकि छूट सके
इस चक्र से,
कर्म-फल के
जनम-मरण से।
मोह और ममता
बांधे बैठे हैं
खुद का भी
संतान भी
स्वजन-परिजन भी
जड़-चेतन दोनों
धरे चित्त को
अपनी चकाचौंध से,
कर रहे भ्रमित
तुझे हर क्षण
मुखौटे माया के।
क्या कोई सम्बंध
देखा है कहीं
प्रकृति भाव में,
न कोई नर,
न मादा है वहां,
है तो बस प्राण,
पुरूष है अकेला
माया शक्ति संग
आया है रचने
विश्व-बहुस्याम्
जी चुका तू
हर योनि को,
कर चुका भोग
हर कर्म का
पूर्ण हुई इच्छाएं,
तब क्यों भ्रमित,
ललचाता दरिद्र सा,
भागता देख माया को
क्यों अभी भूखा है
यह त्रिगुणी मन?
एक और बाकी है
परीक्षा तेरी,
करते ही संकल्प
लौट आने का
देखना गरजेंगी
माया की छाया सभी,
जाने देंगी क्योंकर
छूटकर चंगुल से
तुझे,
आएगी रिझाने को
तुझे कई रंग में,
पकड़ने को किसी
इन्द्रिय सुख के
भ्रम में।
बहुत हो चुका
भ्रमित रे मनवा
लख चौरासी भागा
सारा जग है
भूल-भुलैया
एक माया का धागा
उसके भीतर तू
बैठा अकेला
करता प्रतीक्षा
निकलने बाहर।
कर ले साहस
मान हकीकत
मरना तो होगा ही,
तोड़ के बन्धन
मुड़ जा भीतर
कछुवे जैसा हो ले।
साक्षी भाव है
लौट आना,
छोड़कर जीवन के
क्रमण4 को,
आक्रमण को,
अतिक्रमण को,
खोल देना मुटि्ठयां
समय से पहले ही
क्या ले जाएगी
मृत्यु तब, जब
होंगे हाथ खाली?
हो जा भय से मुक्त
ठहर जा अभी,
वर्तमान में,
समय में,
आ लौट चलें!
रे मनवा मेरे!

1. मैं एक हूं, बहुत हो जाऊं
2. ममत्व
3. अज्ञान जो मृत्यु के भय का कारण हो
4. चाल

गुलाब कोठारी

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