Gulabkothari's Blog

सितम्बर 6, 2012

भय बिन होत न प्रीत!

पिछले अर्से में राजस्थान उच्च न्यायालय के कुछ निर्णय, जनहित की दृष्टि से, अतिसाहसपूर्ण एवं उत्तरदायित्व बोध से लबालब रहे। माननीय न्यायाधीशों के साथ-साथ प्रदेश की जनता को भी बधाई! रामगढ़ बांध, जलमहल, मोबाइल टावर्स जैसे मुद्दों पर ऎतिहासिक फैसले सुनने को मिले। आज एक और अतिमहत्वपूर्ण आदेश माननीय मुख्य न्यायाधीश की खण्डपीठ ने दिया कि जयपुर के अमानीशाह नाले के सभी अतिक्रमणों को चिन्हित करके हटाया जाए। तीन सप्ताह में रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए। यहां तक कि कोई कॉलोनी भी बस चुकी हो तो हटाई जाए। छोटे-बड़े व्यक्ति में भेद नहीं किया जाए। सभी प्रशासनिक अधिकारी इसमें सहयोग करें।

कौन नहीं जानता पिछली बारिश में जान-माल का कितना नुकसान हुआ। यदि सारे अतिक्रमण तोड़कर एक भी जान बचा सकें तो अच्छा होगा। यह खेद का विषय है कि सन् 1984 से इस नाले को लेकर सर्वे होते रहे, रिपोर्टे बनती रहीं, सरकारें बदलती रहीं, आबादी बसती गई, कारखानें तक लग गए, अधिकारी जेबें गर्म करते रहे। नगर निगम के चार जोन पड़ते हैं इस क्षेत्र में- सिविल लाइन्स, मानसरोवर, विद्याधर नगर और सांगानेर। जेडीए के भी जोन 2, 5, 6, 7, 8 और 9 इधर हैं। कितने विकास आयुक्त और मेयर आए और चले गए पिछले 25 वर्षो में, क्या कर गए? आज जो भी नुकसान हुआ है और होगा, वे सब जिम्मेदार हैं इसके लिए। हर एक को सजा होनी चाहिए। क्या ये जल्लाद से कम हैं?

ये उन अधिकार सम्पन्न पदों पर हैं जहां इन्हें अपने बनाए हुए कानूनों की तो चिन्ता रहती है, किन्तु सरकार और न्यायालयों की अवमानना करने से इनके अहंकार की तुष्टि होती है। तभी तो आज नाले में मानसरोवर हैरिटेज इन, ग्रासफील्ड क्लब, नीरजा मोदी स्कूल का भाग, कोरानी का पेट्रोल पम्प, विक्रम नर्सरी और कई विवाह स्थल बन गए हैं। कारखानों से विभिन्न निरीक्षक उगाही कर रहे हैं। ये सभी अपराधी हैं। प्रदूषण मण्डल के नोटिसों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अराजकता का वातावरण बना हुआ है। सरकार आंखें मूंदे बैठी है। कोई मर गया, तो लाख-दो-लाख का मुआवजा देकर चुप करा देंगे। जीवन का यह मोल, वे लगाते हैं, जिनके महीने का वेतन इतना होता है।

सन् 2008 में सीमांकन का नक्शा बन चुका था, 2009 में भूमि का विवरण तैयार था। नवम्बर 16, 2009 में उच्च न्यायालय ने नाले की चौड़ाई 150 फीट से 210 फीट तय कर दी थी। फाइलों के पेट बराबर भरे जा रहे हैं।

न्यायालय का आज का फैसला एक नया इतिहास बनाएगा, ऎसा माना जा सकता है। जब सन् 1981 में इसी नाले पर मजार बांध बनाया, तब से तो बहाव बहुत घट गया। उसके बिना तो सारे अतिक्रमण और सभी बाशिन्दे बह गए होते। उम्मीद है इस फैसले के क्रियान्वयन के बाद किसी की भी जान नहीं जाएगी। सभी प्रशासनिक अधिकारी, नेता इसमें पूर्ण सहयोग करेंगे।

इस फैसले से दो बिन्दु और निकलकर आ रहे हैं। एक तो सरकार इस फैसले को राज्य के अन्य नदी-नालों पर भी लागू कर दे, तो नागरिकों को अलग-अलग कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। कानून भी एक-सा प्रभावी होता दिखाई देगा। दूसरा, रामगढ़ बांध का मुद्दा भी इसी का वृहत स्वरूप है। क्यों नहीं वहां के अतिक्रमण हटाने के लिए भी प्रशासन को समय सीमा दे दी जाए।

यह कानून की धçज्जयां उड़ाना ही है कि उच्च न्यायालय के फैसले तथा सरकार की पुरजोर मंशा के बावजूद भी रामगढ़ खाली है। सरकार को चाहिए कि न्यायालय के आदेश की अनुपालना में भराव क्षेत्र के सभी एनीकटों के दरवाजे लगाकर खुला छोड़ दे। जब तक बांध नहीं भरे, कोई गेट बंद नहीं हो। जो करे, वहां के सरपंच के विरूद्ध मुकदमा चले। प्रदेश के सभी बांधों, झीलों के अतिक्रमण यदि आने वाले एक साल में भी हट जाते हैं तो प्रदेश का भविष्य फिर उज्वल हो सकेगा।
गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. vary good article by Mr. Kothari

    टिप्पणी द्वारा prabhatkumarroy — सितम्बर 6, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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