Gulabkothari's Blog

सितम्बर 9, 2012

तप

यह सृष्टि युगल तत्व से बनती है। अग्नि सोम रूप होते हैं दोनों। इनका मिल जाना ही सृष्टि के लिए पर्याप्त है। अग्नि में सोम को आहुत होना पड़ेगा। इससे सोम जहां तपता हुआ जल जाता है, वहीं अग्नि भी तपता है। सृष्टि केवल श्रम से भी नहीं होती। तप से होती है। तप यज्ञ में भी होता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के यज्ञों से भिन्न- भिन्न पदार्थो की प्राप्ति ही सृष्टि का विस्तार है। यह स्थूल तप है, अत: इसका प्रभाव लोक व्यवहार में देखा जा सकता है। हम विभिन्न मंत्रों के योग से सांसारिक प्राप्तियां अर्जित करते हैं। कोई धन, कोई संतान, कोई पद आदि। कोई केवल सुख-शान्ति के लिए यज्ञ करता है।

 

 

बड़ा यज्ञ प्राणों का होता है। तपन भी प्राणों का ही बड़ा कहा गया है। सच तो यह है कि तपन तो हर हाल में प्राणों का ही होता है। विचारों का मंथन प्राणों का ही तपन है। चाहे विचार- विमर्श हो अथवा वाद-विवाद। शारीरिक श्रम से इसमें ऊर्जा भी अघिक खर्च होती है। यह तप और भी क्रियमाण दिखाई पड़ता है, जब इसमें भावनात्मक आवेश या आवेग जुड़ जाते हैं। एक प्रवाह-सा जान पड़ता है। ऎसे समय में नियंत्रण का छूट जाना भी संभव है। जागरूकता बनी रहे, बोध साथ नहीं छोड़े, भीतर प्रज्ञात्मा स्थिर बना रहे, तभी तप का सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे सकेगा।

 

यह सारा क्रम स्वयं व्यक्ति का भी हो सकता है, किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु अथवा स्थिति से जुड़ा हुआ भी हो सकता है। जैसे अग्नि में सोम की आहुति यज्ञ होता है, उसी तरह अग्नि की आहुति भी रौद्र सृष्टि का कारक बनती है। अन्तरिक्ष में ग्यारह रूद्र इसका प्रमाण हैं। अर्थात जब भावनाओं पर अहंकार हावी हो जाता है तब अज्ञान का साम्राज्य  रहता है, राग-द्वेष की चिपकन रहती है, तब रौद्र रूप सहजता से प्रकट हो जाता है। अहंकार स्वयं बहुत बड़ी चिपकन है। यह माया का आसुरी रूप है। असुर देवताओं से  अघिक बलवान होते हैं। अघिक देर तप सकते हैं। आज की भाषा में इनको माफिया कह सकते हैं, नक्सली कह सकते हैं, भ्रष्ट कह सकते हैं। तपते ये भी हैं और सद्पुरूषों से ज्यादा शक्ति सम्पन्न भी होते हैं।

 

शरीर-मन-बुद्धि का तप इनको तरल और विरल बनाने का कार्य करता है। घनत्व को कम करता है। हल्कापन ही व्यक्ति को समाज में ऊपर उठाता है।

सृष्टि में प्र्रजापति ने यज्ञ के स्वरूप के लिए अग्नि-वायु-आदित्य इन तीनों देवताओं से ऋ$क््-यजु-साम, तीनों वेदों को तथा सनातन ब्रह्म अर्थात अथर्व को दोह लिया। यह मनु स्मृति का वाक्य है। तीन अग्नि वेदों में अथर्व की आहुति से अग्निषोमात्मक यज्ञ पूर्ण होता है।

 

ऋ$क् यानि अग्नि, यजु अर्थात वायु, साम यानि आदित्य। यही ऋक्-यजु-साम त्रयीवेद कहलाते हैं। (अग्नि-वायु-आदित्य द्वारा दोहे हुए रस रूप) जब तक इस वेदत्रयी में अथर्व (सोम ब्रह्म) की आहुति का सम्बन्ध रहता है, तब तक यह वेदत्रयी विकसित होती रहती है। यह चारों वेद ही अग्निसोम का आधार है। यह सूर्य मण्डल ऋचाओं के लोक रूप में तप रहा है। यह महद् उक्थ (स्फुरण केन्द्र) है। प्रदीप्त ज्योति मण्डल महाव्रत (साम) है। साम लोक है। जो पिण्ड मण्डल में पुर भाव में गति रूप मेें प्रतिष्ठित है, वह यजु अग्नि है। यजु लोक है। अत: सूर्य के रूप में तीनों वेद तप रहे हैं।

 

यह श्रुति संदेश तपने की परिभाषा बता रहा है। जिसमें ऋक्-केन्द्र या मन भी तपे, साम अर्थात शरीर भी तपे तथा यजु अर्थात प्राण भी तपे। मन-प्राण-वाक् तीनों सम्मिलित रूप से तपे। कुछ दर्शन मन-वचन-काया भी मानते हैं। किन्तु यहां केवल शब्द वाक् से जुड़े प्राण इंगित हैं, अर्थवाक् (सृष्टि) के प्राणों का समावेश नहीं है। हर शरीर एक पुर है, इसमें गतिमान यजु: प्राणों का लोक है। मूल केन्द्र आत्मा है, जो त्रिगुण के कारण हमें मन रूप में भासित होता है। तप का भोक्ता यही आत्मा बंधन मुक्त होना चाहता है। संसार में इससे बड़ा तप दूसरा हो ही नहीं सकता।

 

यह एक   संघर्षमय तप है। व्यक्ति स्वयं ही संघर्ष करता है। किसी अन्य से जूझने की जरूरत नहीं पड़ती। स्वयं को हरा कर स्वयं ही मुक्त होना चाहता है। इसलिए ऎसा मनीषी, धीर पुरूष महावीर कहलाता है। शरीर के साथ व्यक्ति के लाखों   बंधन होते हैं। प्रकृति ने केवल एक बंधन दिया है, नर-नारी स्वरूप का। शेष प्रारब्ध के बंधन स्वयं जीव के निर्मित किए होते हैं। प्रकृति केवल कर्म-फल भोगने का निमित्त या संयोग बनती है। व्यक्ति के मन का एकोहं बहुस्याम् प्रजायेय इस शरीर को पूरी उम्र भ्रमित रखता है। माया इस कमजोरी को अच्छी तरह जानती है, क्योंकि वही तो इसका उपादान कारक है। व्यक्ति का पूरा जीवन इस एक अवधारणा के चारों ओर रचा गया माया का  प्रपंच है। ईश्वर ने इसके लिए भी शरीर की आयु सीमा तय कर दी। ऋषियों ने आश्रम व्यवस्था के द्वारा प्रकृति के नियम को समाज में लागू करने का प्रयास किया। आज की जीवन शैली उन सबको पीछे छोड़ गई।

 

न आश्रम की सीमा बची, न आयु का बंधन रहा। जीवन की स्वतंत्रता को स्वतंत्रता की चाह ने ही भंग कर दिया। व्यक्ति स्वच्छन्द हो गया। अब वह मानवीय मर्यादा में कम जीना चाहता है। एकोहं बहुस्याम् के भूत ने उसे अनाचार के कुएं में गिरा दिया। उसे फिर से उन्हीं योनियों में आकर्षण लगता है जहां यही एक सूत्र जीवन का आधार हो। यह तो जीवन से ही पलायन है। सुप्त चेतना के कारण व्यक्ति मृत प्राय: ही जीता है। जीवन शून्य!  ज्ञानाग्नि से इन कर्मो को जलाना भी तप कहलाता है। किन्तु ये कार्य ऎसे हैं जो बातें करने मात्र से हो नहीं सकते। तप तो तपने से ही पूरा होगा। हम शरीर को ही कष्ट देना नहीं चाहते, तब प्राणों का और मन का तपन तो चिंतन में ही कैसे आएगा?

 

शरीर के तप के लिए एक-एक इन्द्रिय के विषयों को देखते जाना है। क्या आवश्यक, क्या अनावश्यक, क्या सात्विक, क्या तामसिक भाव और स्वरूप है इनके विषयों का। कहां-कहां मन अटकता है, चिपका हुआ है अथवा पुनरावृत्ति चाहता है। हमें इन कमजोरियों से स्वयं को मुक्त करना है। क्या पसंद के भोजन पर नियंत्रण या निषेध सहज है? क्या मन मर्जी के विरूद्ध जी पाना सहज हो सकता है। मन जो सपने देखता है, उनको दबा देना सहज है। इसी प्रकार इष्ट वियोग और अनिष्ट का योग कष्ट कारक माना जाता है। क्या इष्ट अनिष्ट की अवधारणा को छोड़ा जा सकता है?  संभव है! यदि हम अपने मन को मित्र बनाकर उससे बातें करें, उसे संस्कारित करें, और उसे संकल्पवान बनाकर उसकी इच्छाओं को लक्षित करे सकें। उसे एकोहं बहुस्याम् का यथार्थ और उसी से निवृत्त होकर वापिस  एकोहं के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर सकें। तपने का जीवन में यही एकमात्र उद्देश्य है।

 

मन पर करोड़ों-करोड़ों खूटियां जड़ी हैं। चौरासी लाख योनियों की स्मृतियां, राग-द्वेष के बंधन इन पर बंधे हैं। कर्म-फलों के बंधनों की खूटियां भी हैं। तपने का अर्थ है, एक-एक करके इन खूटियों को निकालना। मन को मुक्त, निर्मल करने का प्रयास करना। हमारी कमजोरी है कि न तो हम इन खूटियों को निकाल पाते हैं, न ही नई खूटियां जोड़ने के स्वरूप को रोक ही पाते हैं। तब तपन का मार्ग कैसे खुलेगा?

 

सारी उपासना, जप, साधना, ध्यान, प्रतिक्रमण इसी तप के पर्याय हैं। उपवास मात्र करना, यज्ञ करना मात्र ही तप नहीं है। सोना कितना भी शुद्ध हो, उसको भी चमकने के लिए तपना पड़ता है। आत्मा किसी भी ऋषि-मुनि का हो, यदि मानव देह में आया है और नारायण बनना है, तो तप का विकल्प नहीं है। इसी से व्यक्तित्व हल्का होकर ऊपर उठता है।

 

गुलाब कोठारी

 

2 टिप्पणियाँ »

  1. Very usefulbut at times too abstract to comprehand

    टिप्पणी द्वारा s k Jain — सितम्बर 10, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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