Gulabkothari's Blog

सितम्बर 9, 2012

संसद या कोयला खान?

Filed under: Special Articles — gulabkothari @ 7:00
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राजनीति, राजनेता और राजकाज में हमारा देश कितना पारंगत हो गया, कितना स्वार्थी और बेशर्मी का पर्याय हो गया, स्वयं को बचाने के लिए किस प्रकार दूसरों के प्रति आक्रामक हो गया, कैसे दस खाने वाले को ग्यारह खाने वाला नहीं सुहाता और कैसे टीवी पर संसद में नंगा नाचकर गौरवान्वित होता है, इसका आत्मविभोर कर देने वाला दृश्य तेरह दिन तक देश ने देखा। औरतें, मर्दो से भी आगे और सब काले ही काले। हां, राज्यसभा सांसदों को शायद ईश्वर ने उच्च सदन-सी बुद्धि दी और “पदोन्नति में आरक्षण” का बिल पास नहीं हो पाया। वरना देश के ही दो-दो टुकड़े कर देने वाले जिन्ना और वी.पी. सिंह की फौज में ये सांसद भी खड़े दिखाई पड़ते। संसद देश की संस्कृति का वाहक है, संविधान का रक्षक है, कानून और देश के भविष्य का पोषक है।

वहां बैठे जनप्रतिनिधि आज खुलेआम देश की भावना को आहत करने पर तुले हैं। लगता है हमारी संस्कृति के विरूद्ध विद्रोह करने के मूड में हैं। कुछ सांसदों ने तो मानवीय मर्यादाओं को भी तिलांजलि दे दी। “लिव-इन-रिलेशनशिप”, महिला आरक्षण बिल, लड़के-लड़कियों की वयस्कता की उम्र का मुद्दा, शादी पूर्व सम्बंधों की वैधता जैसे बिलों पर चिन्तन किस मानसिकता की ओर इशारा कर रहा है।

ठीक है सत्ता का सुख है, लोभ होता ही है, किन्तु सत्ता के लिए देश हित ही पीछे छूट जाए, तब सत्ता की क्या सार्थकता? आज सत्ता का जो दुरूपयोग हो रहा है, सत्ता जिस प्रकार जनहित से मुंह मोड़कर काम कर रही है, भ्रष्टाचार के मुद्दों पर बेशर्मी की बयानबाजी और अपराधियों को बचाने का अभियान सभी दलों में जैसे चल पड़ा है, वह सभी के दिलों में “भारत मां के प्रति” दर्द का अभाव दिखाता है।

उनकी घोषणाएं, पद व गोपनीयता की शपथ फटे पोस्टरों में दब चुकी जान पड़ती हैं। इन लोगों ने ही मिलकर आरक्षण की कटार से देश की अखण्डता के टुकड़े किए हैं। इस पर गर्व भी करते हैं कि आरक्षित वर्ग शेष भारत से मुसलमानों की तर्ज पर टूट गया। इतने से भी संतोष नहीं तो बांग्लादेशी भर लिए देश में वोट बैंक के रूप में।

राज्यों को भाषा और क्षेत्र के नाम पर सिमट जाने का अधिकार देश को खण्ड-खण्ड करना ही तो है। देश अखण्ड रहेगा, तो राजनीति सहज नहीं रह पाएगी। अत: अब देश की खुलेआम नीलामी पर उतर आए। पदोन्नति में आरक्षण के नाम पर। आरक्षण तो पहले ही छलावा साबित हो चुका है। देश में विष वमन का मार्ग तो प्रशस्त हो चुका है। नेता शायद इसी को अमृत मान रहे हैं। अवधि को आगे से आगे बढ़ा रहे हैं। उच्चतम न्यायालय जलते हुए देश को देखकर मौन है।

क्यों दिया था आरक्षण का विकल्प देश के संविधान निर्माताओं ने। पिछड़े तबके को सम्बल प्रदान करने के लिए। आज तो स्वयं आरक्षण से लाभान्वित भी अपने ही समाज से कट चुके। नौकरियां मिल गई, परिवार समृद्ध हो गए, यहां तक भी ठीक है, किन्तु पदोन्नति में आरक्षण क्यों? क्या घटिया डॉक्टर, इंजीनियर या अधिकारी को अच्छा कार्य करने वाले से ऊपर बिठाना चाहिए? देश के विकास के लिए तो एक आत्मघाती कदम होगा। नई पीढ़ी में जहर घुल जाएगा।

कुण्ठा पैदा हो जाएगी। आज भी चुनाव आयोग की अनदेखी से सीटों का ही आरक्षण कर दिया गया है। यह लोकतंत्र की हत्या नहीं है क्या? आपने आरक्षण प्रतिशत में दिया है, सीटों में नहीं। यदि आदिवासी क्षेत्रों में गैर-आदिवासी चुनाव नहीं लड़ सकता, तो क्या वह उसके संवैधानिक अधिकारों का हनन नहीं है? क्यों नहीं चुनाव आयुक्त पूरी सूची पर ही प्रतिशत लागू कर देते? क्या यह लोकतंत्र में धोखाधड़ी नहीं है या जनता की आंखों में धूल झोंकना नहीं है? इसमें और पदोन्नति के आरक्षण में भावनागत अन्तर कहां है? पानी सिर से गुजरने को है।

हमारे जनप्रतिनिधि आरक्षण को वोट की मशीन मानते हैं, भावी पीढियों का तो गला घोंटने पर उतारू हैं। जनता कब तक सहन करेगी और कब नई पीढ़ी क्रान्ति का बिगुल बजाती है, यह शीघ्रातिशीघ्र हो, इसी में देश की भलाई है। नहीं तो अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, गैर-आरक्षित वर्ग एवं अल्पसंख्यक, ये चार बड़े धड़े देश के हो जाएंगे। इनमें आज भी बहन-बेटी का व्यवहार नहीं है। तो वैसे भी इनमें दूरियां तो हैं ही। अब राजनीति की मंशा है कि इस धड़ेबंदी से अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक होकर उभर आए। इसमें बांग्लादेशी आग में घी का काम करेंगे। देश इतना बंट जाएगा कि संसद स्वयं इसमें खो जाएगी। आरक्षण के कोयले में देश जलकर राख हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

4 टिप्पणियाँ »

  1. Shriman,
    Kya hum pathya pustakon me water pollution/earth pollution/noise pollution/thought pollution etc. ke saath POLITICAL POLLUTION ko bhi shamil kar den to aane wali pidhee un itihaskaron ke naam yad rakh sake jinki vajah se ise pollution me vargikrit kiya gaya
    saabhar

    टिप्पणी द्वारा BANKESH SANADHYA — सितम्बर 10, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. Dear Sir,
    The Debate or Rather FIGHT going on between the Congress & BJP over the Coal issue seems to be going from bad to worse,as both seem to be Hand in Glove in the Scam.But recently Mr.Kapil Sibbal has given a RARE & STRANGE logic…by saying that the CM of Orrisa has recommended the allocation to Jindals,.therefore the CM should Resign amd not the PM! What A logic!!!Where will this fight take us??

    Sir,The common man seems to be totally run out of Patience and Options…and there are serious doubts created in the mnind sof the youth as to which party to vote for,as all look and act the same way,once they come into power..

    Your ENLIGHTENING VIEWS on the Above subject of “OPTIONS BEFORE THE NATION” would be greatly appreciated.Looking forward to hear from you soon.

    Thanks & Regards

    Sandeep

    टिप्पणी द्वारा Sandeep Srivastav — सितम्बर 10, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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