Gulabkothari's Blog

सितम्बर 16, 2012

रे मनवा मेरे!

रे मनवा,

 

जानता है तू

क्यों आया है

इस नर देह में,

काटने को कर्म-फल

पिछले जन्मों के।

जनम भी कितने

चौरासी लाख!

कैसे काटेगा,

एक-एक प्राणी

असंज्ञ1, अन्त:संज्ञ2

और ससंज्ञ3 संग,

भ्रमण कर-करके

भू-मण्डल पर,

जल और नभ में,

और इस बीच

सृजित करोगे

नित नए कर्म भी

भोगते रहने को

भविष्य में भी।

करती है सारे खेल

माया, महामाया

प्रकृति या दुर्गा,

फंसाती है यह

हर जीव को

त्रिगुण के जाल में

बांधकर रखती है

हर हाल में।

देव, पितर, ऋषि

गंधर्व सभी

की यही है जननी,

पालक-पोषक

नियंत्रक भी

परा वाक् रूप में।

तू भी तो है

निर्विकार-निराकार

निष्कल ब्रह्म

भीतर में कृष्ण है

अव्यय पुरूष है

श्वोवसीयस4 है

सही नाम तेरा,

याद कर,

तोड़ इस भ्रम को,

पकड़ उस माया को,

जिस सौम्या ने,

छिपा लिया है

तेरी ज्ञानाग्नि को।

याद कर मनवा

जब जाग्रत थी

यह ज्ञानाग्नि

पूर्व काल में

तब माया आई थी

तेरे पास कहने

‘रहूंगी सखा भाव

सदा साथ तेरे

गौण बनकर।’

तुम आ गए थे

चक्कर में

उस ठगिनी के

और बंध गए

उस खूंटे से,

सदा के लिए

चारों रास्तों पर

बंध गई विद्या

‘धर्म, ज्ञान, वैराग्य

गया ऎश्वर्य’ भी

और रह गई पूंजी

‘अविद्या, अस्मिता,

राग-द्वेष, अभिनिवेश’

हाथ में,

इनसे ही होकर

प्राण प्रेरित

करते हैं कर्म

नित नए,

ज्ञान को दबाकर,

अल्प करके,

माया ही बनती

इच्छा तेरे भीतर

समझे, मनवा?

तू तो अग्नि है

ऋक्-यजु-साम,

तेरा यजु करता

क्रिया है अथर्व पर

और बनाता है

वाक्-पदार्थ।

माया है अथर्व

कारण है

स्थूल निर्माण का।

स्थूल विश्व का,

अव्यय से अक्षर

फिर तुझे बनाया

क्षर

समझे षोडशी?

सत्य है यह

माया का घेरा

सत-रज-तम,

किन्तु टूट सकता है

यही मिथ्या भाव है,

यही किरण है

आशा की

तुम्हारे लिए,

मृत्यु भाव जीव

का चेतना रूप

अमृत देखो,

मुड़कर उस ओर

पीठ करके

सृष्टि की ओर

लौट आओ रे मन,

हे-चितेनिधेय5!

तुम पर चिति है

माया भाव है

पदार्थ संग्रह है

रूप बनता है,

नाम मिलता है

आकार बना है

माया अंश से।

चेतना रहती

अव्यक्त सदा

‘अभिधीयते6!

कारण सदा सूक्ष्म

कार्य सदा स्थूल।

किन्तु परिणाम

परिवर्तनीय,

यानी विवर्त7 रूप

पदार्थ से ऊर्जा,

ऊर्जा से पदार्थ।

चेतना आती है

सूर्य हेतु है,

ज्योति, आयु, गौ का,

ज्ञान, उम्र, विद्युत का,

सविता रूप विद्युत

चेतना बनती है

हमारी।

जगाओ,

इस चेतना को

मनवा मेरे,

शुरू करो यात्रा

भीतर की ओर

अन्नमय कोश से

गुजरते हुए

विज्ञानमय कोश तक,

जाग्रत करो

चेतना को

प्रज्ञा को,

जला डालो

सारे पूर्व कर्म

ज्ञानाग्नि में,

और लौट आओ

भीतर

स्वयं के।

 

रे मनवा,

शुरू करना होगा

चेतना जागरण से,

विद्या-बुद्धि को

प्रेरित करके-

‘धीयो योन: प्रचोदयात्’

की प्रार्थना से।

बुद्धि बनती है

चेतना से

ज्योति तत्व से

पूर्णत: शुद्ध;

किन्तु

बुद्धि के साथ

रहते हैं तीनों गुण

सत-रज-तम,

ढंकते हुए

चेतना को।

प्रार्थना कर

मेरे मानस कि

वही शुद्ध ज्योति

सूर्य प्रदत्त ही

प्रवेश कर जाए

तेरी बुद्धि में।

समझ ले मन

माया के रूप को

घड़ती है देह को

चिति के द्वारा

और बैठ जाती है

इस पर स्वयं ही

चेतना बनकर

चितेनिधेय रूप,

रोककर मार्ग

भीतर जाने का

चेतना जगाने का,

तभी तो रहता है

सुप्त जीवन

पूरे सौ साल,

आधा नींद में

आधा मोह निद्रा में।

कौन बड़ा आवरण

नींद से बढ़कर

जीवन में?

ढंक देता संसार को,

जीवन के प्रयासों को,

ग्रहण करने को

प्रकृति सोम

रात्रि अंधकार से,

करता है प्रकट

सूर्य को

यह अंधकार ही,

उतारता थकान

औषध की तरह

कर देता ऊर्जावान।

विश्व भ्रमण करके

स्वप्न में,

लौट आता है तू

रोज सुबह,

रहता भ्रमित है

दिन भर भी

इस माया जाल में।

पचाने को सोम

पाया था जो

रात्रि काल में,

तभी जागती है

भूख-क्षुधा,

दौड़ते हैं हम

कुछ खाने को,

करने को क्षतिपूर्ति

अन्नमय कोश की,

बाहरी परकोटा है

आत्मा का।

यही है चिति

पंच महाभूतों की,

प्रवेश द्वार

भीतर झांकने का,

पिंजरा नौ द्वारों का,

बनता है अन्न से,

माया की चिति से।

कहा है इसके लिए-

‘पहला सुख

्रनिरोगी काया’

‘अखिलं खलु

धर्म साधनम्।’

यही प्रतिबिम्ब है

मन-बुद्धि-आत्मा का,

साधना रूप

करता कर्म है,

इच्छापूर्ति के लिए

तुम्हारी, रे मनवा,

स्वयं जड़ है

दिखता चेतन है।

तुम्हारा रूप तो

बनता है अन्न से

‘जैसा खावे अन्न,

वैसा होवे मन।’

जानते हो न,

कि शरीर भी

कार्य करता है

ब्रह्माण्ड नियमों से,

पैदा होता है

संवत्सर से,

करत है यज्ञ

स्वयं भी

करने को सृष्टि,

युगल रूप में,

परत-दर-परत।

ब्रह्माण्ड बनता है

सात लोकों से,

शरीर बनता है

सप्त धातुओं से

रस, रक्त, मांस, वसा

अस्थि, मज्जा, वीर्य से।

नित नया अन्न,

नित नए विचार,

नित नए रस से

नित नया निर्माण,

साथ ही विसर्जन

अनावश्यक का भी,

जो नहीं करता तू

पगले! सीख ले

यह रहस्य सूत्र।

जानता है न

पूरा ब्रह्माण्ड है

शरीर के भीतर भी

कोशिकाओं का,

करोड़ों में है

संख्या जिनकी,

आठ करोड़ लगभग

आश्रित सभी

इस शरीर पर ही,

मन-वचन-काया से,

इनका स्वास्थ्य ही

स्वस्थ शरीर होता है।

जो कुछ खाते हैं

प्रतिदिन हम

वही निर्माण है

इस शरीर का।

हमारी रसना

सर्वाघिक चंचल

सर्वाघिक चट्टू भी,

प्रभावित होकर

विचारों से

भावनाओं से

मांगती है अन्न

माया के नियंत्रण में

भांति-भांति का,

सत-रज-तम का,

बन जाता है

स्वरूप वैसा ही

तेरा-मनवा।

वैसा ही शरीर

निर्मल अथवा

पशु समान,

इसमें लगेगा

या नहीं कभी

ध्यान

लौट आ रे मन,

यहीं से

छोड़ तमस अन्न

बहुत खा लिया

जनमों-जनमों में,

छोड़ दे आक्रमण

मांसाहार पर,

चुनौती दे प्रारब्ध को,

ताकि शान्त रहें

कोशिकाएं भी

बिना अन्न के भी।

लौट आ रे,

अप्राकृतिक भोज से,

तामसिक विचारों से,

मत कर दूषित

देह को,

इस रक्त को,

आराधक बन

शब्द ब्रह्म का

सहारा लेकर

मंत्र जाप का,

ताकि निर्मित हो

शुद्ध शुक्र,

स्वरूप तेरा।

आ लौट चलें

ज्ञान की ओर,

सीमित करके

कर्मो को

आवश्यकता तक,

प्राकृत कर्म रूप

उठना है ऊपर

होना है ऊध्र्वगामी,

इसी जन्म में,

समझ ले, मनवा

नहीं विकल्प कोई,

जाना है भीतर,

लानी ही स्थिरता,

छोड़कर चंचलता,

तो शुरू हो जा

सात्विक अन्न से,

मान, माया, लोभ से

आलस्य और निद्रा से,

मांग ले क्षमा

इन सबसे,

कर दे विदा

इनको जीवन से,

आकलन करके

एक-एक इच्छा का,

इच्छा के कारण का

प्रारब्ध का,

दोहराते हुए

उस संकल्प को

जो कर चुका तू

प्रतिष्ठित होने को

शांतानन्द में।

 

 

गुलाब कोठारी

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