Gulabkothari's Blog

सितम्बर 23, 2012

प्रशिक्षण

जिस प्रकार कार्य को करने का एक सही ढंग होता है, वैसे ही जीवन को समग्र रूप से जीने का भी एक विशेष ढंग होता है। प्रकृति के प्रभाव में खण्ड दृष्टि का होना अविद्या के कारण पाशविक प्रवाह आदि समग्रता की एकाग्रता को भंग करते हैं। इस एकाग्रता का लक्ष्य है वर्तमान में जीना। प्रत्येक सफलता के पीछे पहला रहस्य सूत्र भी यही है। सारे शिक्षण-प्रशिक्षण का यही लक्ष्य होना चाहिए।

 

 

किसी को भी शरीर के अलग-अलग अंगों का प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता। शरीर के संदर्भ में ही देना पड़ता है। विपणन वाले व्यक्ति को उत्पाद तथा उत्पादन प्रक्रिया की जानकारी भी होनी चाहिए। अत: किसी भी क्षेत्र में कार्य करने के लिए समग्रता का शिक्षण-प्रशिक्षण अनिवार्य है। समग्रता के दो अर्थ हैं- विषय की समग्रता तथा जीवन में विषय की समग्रता। अध्यात्म में अघिदेव तथा अघिभूत की समग्रता। शरीर-मन-बुद्धि-आत्मा पर विषय का प्रभाव। अध्यापक की भी विषय के प्रति समग्र दृष्टि का महत्व इतना ही है। गुरू-शिष्य के बीच संतुलन की समग्रता। ज्ञान का जीवन यापन के साथ-साथ जीवन के उत्थान में उपयोग उतना ही जरूरी है।

 

प्रशिक्षण का पहला कदम विश्वास ही है। प्रशिक्षक और प्रशिक्षु के बीच विश्वास जरूरी है। इसके लिए प्रशिक्षक की गुणवत्ता पर ही परिणाम टिके होते हैं। विषय के बारे में उसकी समझ कितनी है, भाषा पर उसकी पकड़ कितनी है, प्रशिक्षण के प्रति गंभीरता कितनी है, जीवन केे दृष्टिकोण व्यापक हंै अथवा संकीर्ण, समय का पाबंद, विनम्र, धैर्यवान आदि गुण संपन्न है अथवा नहीं। प्रशिक्षक का ध्येय, व्यक्तित्व का आकर्षण, मानवीय संवेदना का होना उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके बिना प्रशिक्षक  क ी  कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। इण्टरनेट है न!

 

शिष्य तो कच्ची मिट्टी की तरह होता है। गुरू उसको जो चाहे बना दे। आज का प्रशिक्षु कई अर्थो में गुरू या प्रशिक्षक से अघिक जानता है। अत: उसका श्रद्धालु होना बहुत कठिन है। वह जागरूक है, विषय के प्रति, किन्तु विष्ाय को जीवन का अंग नहीं मानता। अत: मूल्यों के बारे में चिन्ता मुक्त है। स्वभाव से स्वच्छन्द भी है, जिसे स्वतंत्र बनाना है। भीतर की और बाहर की जीवन शैली को संतुलित किए बिना भी कोई प्रशिक्षण सफल नहीं होगा। विषय को आत्मसात करना तभी जाकर संभव होगा।

 

इन सबके लिए सम्प्रेषण की कला भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यही प्रशिक्षण का मुख्य केंद्र बिन्दु होता है। चाहे किसी विषय का प्रशिक्षण हो अथवा जीवन शैली का। ज्यादातर प्रशिक्षक यहीं आकर अटकते हैं। यदि आप किसी प्रोफेसर की तरह व्याख्यान देकर चले जाएं, तो प्रशिक्षण पूरा नहीं होगा। प्रोफेसर बुद्धिमान बनाता है, ज्ञानवान, प्रज्ञावान नहीं बनाता। उसका उद्देश्य अपने छात्रों को सत्य की खोज सिखाना नहीं होता। उसका अपना अपेक्षा भाव भी होता है। प्रशिक्षण का उद्देश्य व्यक्ति को विषय से एकाकार कर देना है। रूपान्तरण हो जाता है प्रशिक्षु का।

 

प्रशिक्षण में पहले प्रशिक्षु की परीक्षा होती है। उसके ज्ञान का स्तर, ग्रहण करने और पचा सकने की क्षमता समझी जाती है। फिर ज्ञान को उस धरातल पर रूपान्तरित किया जाता है, ताकि प्रशिक्षु ग्रहण कर सके, और पचा सके। फिर प्रशिक्षु की अन्य अभ्यासों के द्वारा ज्ञान ग्रहण क्षमता बढ़ाई जाती है। तब वह आगे का ज्ञान ग्रहण करने के योग्य बनता है। मूर्ति यदि बनानी है, तो पत्थर को धैर्य के साथ गढ़ना पड़ेगा। बिगाड़ भी होंगे, पुनरावृत्तियां भी  होंगी। पत्थर को दृढ़ता दिखानी पड़ेगी। चोट यदि सहन नहीं कर पाया, तो बिखर जाएगा। चोट खाकर भी यदि खड़ा रहा, टूटा नहीं, तब एक दिन मूर्ति बनकर मंदिर में प्रतिष्ठा पा जाएगा।

 

प्रशिक्षक और प्रशिक्षु दोनों को इसके लिए संकल्पवान होना पड़ता है। यह संकल्प ही प्रशिक्षक का धर्म भी है, प्रशिक्षु का भी धर्म  है। यही प्रतिमा बनकर प्रकट होता है। बिना संकल्प के संभव नहीं होता। इतने बड़े रूपान्तरण के लिए प्रशिक्षक को भी द्रष्टा बनना होता है। भविष्य उसकी आंखों में झलकना चाहिए। समय के साथ होने वाले परिवर्तन उसको दिखाई देने चाहिए।

 

इसके बिना उसका प्रशिक्षु कुछ समय बाद इस जीवन की दौड़ से बाहर निकल जाएगा। इसके लिए प्रशिक्षु को भी समय का ज्ञान अनिवार्य रूप से कराना होता है। हम सब महाकाल की गति से संचालित भी हैं और आपस में एक दूसरे के साथ भी प्रकृति के नियम से बंधे हैं। आज हम जो कुछ हैं उसका कारण हमारे पूर्व कर्म हैं। इसी प्रकार हमारे वर्तमान कर्म से हमारा भविष्य बनेगा। अत: वर्तमान का प्रत्येक क्षण भविष्य निर्माण में लग जाना चाहिए।

 

इस वर्तमान को अज्ञान, प्रमाद, आलस्य, स्मृति, कल्पना आदि चुराने को आतुर रहते हैं। न तो स्मृतियां ही लौटकर आ सकती हैं, न ही भविष्य हमारे हाथ में है। हर प्रशिक्षक जागरूकता बनाए रखने का प्रयास करता है। इसी से आलस्य-प्रमाद छूट जाते हैं। तब व्यक्ति अतीत और अनागत से बाहर आकर वर्तमान में टिक पाता है। उस पर भी मन शान्त नहीं रहने देता। एक-एक इन्द्रिय प्रतिक्षण मन को अशान्त करती रहती है।

 

कार्य के बीच में तरह-तरह की मन में उठने वाली इच्छाएं भटकाव पैदा करती रहती हैं। प्रशिक्षक के इस भटकाव को रोककर प्रशिक्षु के मन में एकाग्रता बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। यह भी सच है कि बिना वर्तमान में स्वयं को प्रतिष्ठित किए व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता। भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता। जीवन तो वर्तमान के सिवाय कुछ होता ही नहीं है। इसमें जो छूट गया, सो छूट गया।

 

वर्तमान में रहकर ही प्रशिक्षु औचित्य सिद्ध कर सकता है- प्रशिक्षण का। वर्तमान में ही वह अध्यात्म का आकलन कर सकता है। स्वयं की शक्तियों एवं कमजोरियों को भी समझ सकता है। सत्व, रज, तम प्रकृति के तीनों गुणों का भीतर अध्ययन कर सकता है। अविद्या, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश को विद्या भाव से दूर कर सकता है। कर्म को अकर्म (ब्रह्म) स्वरूप प्रदान कर सकता है। इसमें प्रशिक्षक और प्रशिक्षु दोनों का ही कर्ता भाव नहीं रहना चाहिए। वरना सारा ज्ञान अहंकार से आवरित हो जाएगा। किया कराया व्यर्थ हो जाएगा। इस प्रकार यदि अच्छे प्रशिक्षु के प्रति मन में राग पैदा हो जाए तब भी प्रशिक्षण भटक जाएगा।

बाजारू प्रशिक्षण की बात तो मैं नहीं कह सकता हूं, किन्तु आत्मिक धरातल के प्रशिक्षण का अर्थ है प्रशिक्षक द्वारा किया गया स्वयं का दान।

 

उसकी उम्र भर की पूंजी, उसका ज्ञान, उसकी आत्मा का अंतरंग पक्ष होता है। उसी ज्ञान से उसका व्यक्तित्व बना होता है। अपनी उस संपूर्ण दौलत का स्वेच्छा से दान करके प्रशिक्षु को भी अपने जैसा बना देना एक तरह से ईश्वरीय कार्य ही है। यह ज्ञान और प्रशिक्षण भी प्रज्ञा को जाग्रत करके ऎश्वर्य देने वाला ही होता है। न ईश्वर हमसे कुछ मांगता है, न ही प्रशिक्षक। जैसे प्रशिक्षु श्रद्धा पूर्वक प्रशिक्षण ग्रहण करता है, उसी संयम और अनुशासन में रहकर प्रशिक्षक भी अपने गुरू प्रदत्त ज्ञान को आधार बनाता है।

 

सही अर्थो में व्यक्तिश: प्रशिक्षण का कार्य भी एक तरह की पूजा ही है। पत्थर से मूर्ति बनाकर मंदिर में बिठाना है। पूजा का फल समय की पाबंदी से जुड़ा है। जो समय के साथ बंधना नहीं चाहता/चाहती, वह सफलता के द्वार सहजता से कभी नहीं पहुंच सकता। श्रम अलग है, बुद्धि अलग है, भाव अलग है। समय की पाबंदी से इनका कोई लेना-देना यदि है तो बस यही कि समय होते ही इनमें कर्म करने की भूख तीव्र हो उठती है। इधर लोहा गर्म हुआ, उधर चोट मारी कि कार्य पूरा। यह अभ्यास व्यक्ति को उम्र भर के लिए प्रशिक्षु बना देता है, भले ही वह प्रशिक्षण का कार्य करता हो। यही तप है, यही कान्ति है। इसी के स्वेद का नाम अमृत है।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

 

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