Gulabkothari's Blog

सितम्बर 30, 2012

रे मनवा मेरे! 3

देख रे मनवा,

 

कैसे घुसती है

तेरे जीवन में

यह माया,

‘कामना बनकर’,

इसके बिना तो

अस्तित्व कहां तेरा,

कामना है तो

सारी क्रियाएं हैं,

प्राणों में होती

हलचल है।

यह कामना ही

ले जाती है

पकड़कर दूर

तुझको

तुझसे ही,

पता भी नहीं चलता

तू चला जाता है

कितनी दूर,

नदी के जल-सा,

बहता जाता दूर

उद्गम से।

इच्छा का आधार

ज्ञान और ज्ञेय

ज्ञाता के अनुरूप,

साथ रहते हैं तीनों।

‘मन का बीज’

कहते हंै कामना को,

सृष्टि का मूल,

कामना ही है।

तू कभी जान लेगा,

हटते ही आवरण

त्रिगुण के ,

क्या है मूल में

तेरा स्वरूप,

कैसे फैलाती है

कामना जाल अपना।

इच्छा हो भले

किसी भी इन्द्रिय की,

देखने की, सुनने की,

खाने की या गानेे की,

कहलाती भूख है,

ठहरे हैं इस पर

सारे ताण्डव

इस जगत के।

इच्छापूर्ति होती है

सदा अन्न से,

इन्द्रियों के विषयों से,

बुद्धि के तर्को से,

मन के भावों से,

हर भोग्य पदार्थ से।

सारा अन्न (सोम)

हो जाता है

आत्मसात् भीतर

आत्मा से।

सोम होता है

सभी अन्न,

समर्पित अग्नि क ो,

तब शेष्ा क्या-

बस अग्नि!

यह भी समझ ले

सृष्टि की मूल

एकमात्र कामना है

‘एकोहं बहुस्याम्

प्रजायेय’

मैं अकेला हंू,

प्रजा रूप में

फै लना चाहिए,

यही व्यापक भाव है

आत्मा का और

यही भाव दिखता है

जीवन को चलाता भी।

ब्रह्म का धर्म है

बढ़ते रहना,

ब्रह्म आकाश है,

कहां बढ़ेगा ?

व्योम में बढ़ता है,

लोक संस्था बनती है,

व्योम में,

संकुचन रूप है

माया के कारण

ब्रह्म भाव का।

ब्रह्म का अंश ही,

चेतना रूप में,

माया पकड़ती है,

अति सूक्ष्म रूप में,

कामना के द्वारा

माया ही बदलती

इस अल्पता को पूर्णता में।

तभी लाती है

भंाति-भंाति का अन्न

बाहर से,

और पोषण करते

भीतर आत्मा का।

अन्न वही

जो भीतर जाए,

विस्तार करे मेरा।

बता रे मन,

क्या तू नहीं

कभी सोचता

विस्तार पाने की?

मनुष्य तो क्या

सोचते हैं

पशु-पक्षी-पेड़ भी

बदल जाने को

अनेक रूपों में।

हर संतान

अपने आप में

पूर्ण ब्रह्म है

और चाहती है

अपना विस्तार भी

स्वतंत्र रूप में।

किन्तु बांध लेती है

प्रकृति इनको भी

सत-रज-तम से।

पहला आवरण

तमोगुण, अज्ञान का,

फिर रजोगुण से

ज्ञानकला तक

और तत्काल

हवाले हो जाता है

अहंकार के।

अज्ञान रूप बल से

जाग्रत होता है

अभिमान,

यही जुड़ता है

कामना शक्ति से,

अर्थात- कामना

होती नहीं ब्रह्म में,

किन्तु माया के योग से

अकेला नहीं ब्रह्म,

अत: कामना बदलती है

गुणों के कारण

सतोगुणी-तमोगुणी,

करती पैदा भेद को

भिन्न व्यवहार को,

इस भेद से ही

निकलती ईष्र्या है।

कामना और गति भी

ईष्र्या के कारण,

कौन रोके

इस प्रवाह को,

ऊपर आता है

अपना स्वार्थ,

छोड़कर पीछे

मानवता को,

यही माया है,

गिराती है नीचे,

अविद्या-ईष्र्या से,

क्षुधा शक्ति करती

आवृत जीव को।

अहंकार पकड़ता है

फल ईष्र्या को

गिरना ही गिरना है।

रे मनवा!

आ लौट चलें,

ईष्र्या ले जाएगी

न जाने कहां,

फल की नहीं

हेतु की कर

ईष्र्या

ताकि हो सके

बंधन मुक्त

कामना के रूप से,

प्रकाशित हो जीवन

पुरूष्ाार्थ से,

बड़ी करके

रेखा अपनी नित्य

बिना ईष्र्या के

निकल जाएंगे

आगे दूसरों से,

रहेंगे प्रतिष्ठित

अपने भीतर

साक्षी बनकर

आ लौट चले

रे मनवा!

 

देख रे मनवा,

लोग कैसे लगते हैं

जनम-जनम के भूखे,

अनन्त कामनाओं वाले

मानसिकता पूरी तरह

अभावग्रस्त,

किसी को भूख

धन की,

किसी को पुत्र की,

किसी को यश की,

किसी को सुख की,

राग-द्वेष, लोभ

मोह, अभिनिवेश1

और ऊपर से

अहंकार

रोकता नहीं जो

कामना के आवेग को

प्रवाह में आवेश के

बंधन में डालते

तुझको,

तू ही तो है कारण

बंध और मोक्ष का,

दूसरी ओर बंध है

विद्या भी,

धर्म भी,

मार्ग हैं ये

शिखर छूने के,

शिखर नहीं है

स्वयं कोई।

वैसे तो सुना होगा

तू ने भी

कलियुग के बारे में,

त्रेता या द्वापर में,

असुर-देव

नहीं होते भिन्न-भिन्न,

दोनों रहते हैं

एक ही देह में,

कभी सुर बनकर,

कभी असुर जैसे,

पता नहीं कब

कौन टूट पड़े

भेडिया बनकर,

हिंसा का जोर

धर्म के नाम पर,

राजनीति हिंसक,

समाज मर्यादाहीन,

संस्कार लुप्त-से

श्रद्धा, स्नेह

वात्सल्य, प्रेम

सब पुस्तकों में

दब चुके हैं,

अपनी ही चिन्ता

करता है आदमी,

जो कुछ दिया

ईश्वर ने

भुला दिया,

रो रहा उसको

जो उसको नहीं मिला

भूख मिटती नहीं,

तृष्णा रूकती नहीं,

लोभ छूटता नहीं

मोह भी अटूट है।

इच्छा रहती है

अघिग्रहण की

अतिक्रमण की

अघिकार जताने की

बड़ा मानने की

स्वयं को दूसरों से,

बांध लेता है

अहंकारवश खुद को,

जकड़ लेता है

ताकि लगे उसको

‘वह जी रहा है

अपनी मर्जी से।’

आक्रमण स्वयं पर

सर्वाघिक होते हैं-

‘प्रात: छ: बजे

उठ जाना है,

सात बजे स्नान

आठ बजे समाचार

नौ बजे नाश्ता

दस बजे काम पर,

कपड़े केवल

कमीज-पैण्ट,

साफा नहीं

धोती नहीं,

नाश्ते में बस

डबल रोटी-मक्खन,

कार्न फ्लेक्स,

नहीं चलेगा

ठण्डा परांठा

या बासी रोटी’

एक उदाहरण

छोटा-सा

बंध जाने का

अपने ही हाथों

बोध रूप

स्वतंत्रता के।

देख रे जिज्ञासु

मुक्ति भाव के!

यही हाल रह गया

हर धर्म का

सम्प्रदायों का,

कोई करता नहीं

कभी चर्चा

मुक्त होने की,

बांधना चाहते हैं

सब अपने साथ,

कट्टरता क्या है

यह बांध लेना ही

देख लो संतों को

बंधे हुए

अपने वेश में,

नियमों में

जो बनाए थे

इन्हीं के लोगों ने

कुछ पीढियों में,

कपड़ों का रंग

भिक्षा परम्परा

स्वाध्याय पक्ष

और भगवान-?

अपने-अपने स्वरूप

अपनी-अपनी व्याख्या

और मजे की बात

कोई जीता नहीं,

धर्म के संग

सब जीते हंै

धर्म के लिए,

सब मरते हैं

बिना छोड़े चोला

अपने धर्म का,

धर्म तो मार्ग है

छूट जाता है

मंजिल आते ही,

किन्तु हर संत

मर जाता है

मार्ग में ही।

इसलिए मनवा,

रहना सीख

‘स्व’ में अपने ही

भीतर बैठकर

लौट आ जल्दी,

समझ ले

छोटा- बड़ा नहीं कोई

अच्छा -बुरा नहीं

प्रकृति में बराबर

हर कोई।

सम्प्रदाय भी

आरक्षण जैसा है,

तोड़ता है,

मानव समाज को,

संकुचित करता है

मानव मन को

पशु की तरह,

रोकता विस्तार

‘स्व’ का

सृष्टि का अंग

ईश्वर का अंश

है न तू तो,

फिर बता

किस तरह जीएगा

संकुचित होकर?

धर्म तो कोई

करता नहीं बात

जीने की

कुदरत के साथ,

टकरा जाता है

हर जगह

उसका अपना स्वार्थ।

कौन मानता है

प्रकृति की संतान

स्वयं को,

दूसरों को भी

अन्य प्राणी,

पेड़-पौधों सब कोे,

कौन करता प्रेम

सबको एक सा,

कौन करता है

क्षमा, शत्रु को

फिर प्रेम भी,

कौन मिलता है

बिना अपेक्षा के

किसी से,

तभी है यह देश

शून्य भी

नेतृत्व से।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

 

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