Gulabkothari's Blog

सितम्बर 30, 2012

लोक को लूट लिया

हमारा लोकतंत्र सठियाने लगा है। जिस लोक ने आजादी की लड़ाई लड़कर अपना तंत्र स्थापित किया था, वह लोक सो गया। इस नींद का फायदा उठाकर तंत्र ने ही लोक को लूट लिया। आज चारों ओर इस लूट में मची होड़ की ही चर्चा है। नागरिक भ्रमित है कि समस्याओं के निवारण के लिए किसका दरवाजा खटखटाए। सच तो यह है कि दरवाजे बाहर से बन्द दिखाई देने लगे हैं। धक्का मारकर खोलने की कीमत देनी पड़ती है। नागरिक जितना आज तंत्र से अपमानित महसूस कर रहा है, वैसा गुलामी के दिनों में भी नहीं था। आज तो रिश्वत के नाम पर नेता, अधिकारी, न्यायाधीश आदि भी महिलाओं को घर भेजने की बातें करने लगे हैं। राजस्थान में ही सब देख चुके हैं। तब तंत्र किसके लिए, राज्य किसके लिए?

देश में चारों ओर भ्रष्टाचार-पुराण सारे दिन चर्चा में रहने लगा है। लोकतंत्र की सम्पूर्ण अवधारणा मर चुकी है। जनता के टैक्स से सरकार चलाने की बात थी। सरकार एवं विकास को इसी सीमा में रखने की बात थी। आज तो सम्पूर्ण राजस्व सरकारी वेतन-भत्तों और पेंशन में ही कम पड़ जाता है। विकास चाहिए तो उधार मांगो, ब्याज दो, केन्द्र से मांगो और सब मिलकर मजे कर जाओ। काम के लिए रिश्वत भी वेतन से भारी। जनता सरकार भी चलाए और रिश्वत भी दे, काम फिर भी नहीं हो तो लोकतंत्र की सार्थकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है।

इन सबका कारण राजनेताओं के मन में अनन्तकाल से चली आ रही भूख—सोने की लंका बनाने की। हर व्यक्ति इसीलिए चुनाव लड़ना चाहता/चाहती है कि पैसा बनाना है। क्यों बनाना है—पता नहीं। क्या करना है—पता नहीं। कितना बनाना है—पता नहीं। कैसे बनाना है—येन-केन-प्रकारेण। शिक्षा ने कमाई के लिए सम्पूर्ण मानवता को ही झोंक दिया। संवेदना जीवन से बाहर निकल गई।

सत्ता में आते ही व्यक्ति स्वच्छन्द होने लगा। राजनेताओं का शैक्षणिक स्तर कुछ भी हो, विभाग को प्रदेश या राष्ट्र के स्तर पर समझ पाना असंभव है। इसी का लाभ कार्यपालिका ने उठाया। आय बढ़ाने के नित-नए रास्ते निकलते गए। पुलिस सत्ताधीशों को सलाम कर-करके उनको, एकमात्र उनको ही सुरक्षा देने में जुट गई। सारा तंत्र सत्ता-धन-बल (भुजबल) एक हो गए। थोड़ा बहुत डर था न्यायपालिका का। आज उसमें भी दो धड़े हो गए। एक सत्ता या धन के साथ और दूसरा पूर्णत: स्वतंत्र। सरकारें इनको भी सुविधाएं दे-देकर खरीदने में लगी रहती हैं। कई राज्यों में आकलन करने पर सारे तथ्य प्रमाणित हो जाएंगे।

अन्त में बचा मीडिया—यानी लोकतंत्र का रखवाला। इसका डर सर्वोपरि, किन्तु लोभ से अछूता नहीं। लोभ गला कटवाता है। सरकार से सुविधाएं मांगते-मांगते सरकारों के साथ ही जुड़ने लग गया। सरकारें बदलती गई, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया स्थाई तीन स्तंभ हो गए लोकतंत्र के। विधायिका अस्थाई जैसी हो गई। मीडिया ने स्वयं को चौथा स्तंभ घोषित कर दिया तथा खुले रूप से सरकारों का पक्षकार बन गया। यहीं से लोकतंत्र की जड़ें उखड़ने लग गई और परिणाम हमारे सामने हैं।

मीडिया के साथ होते ही तंत्र निर्भय हो गया। नियमित बंटवारों का मार्ग प्रशस्त हो गया। हाल ही हुए कोल ब्लॉक्स के खुलासे में, टू-जी स्पेक्ट्रम के मामले में तो मीडिया की भूमिका शर्मनाक ही साबित हुई। आज सत्ता किसी भी दल के पास हो, पर्दे के पीछे सब एक हो गए। भाजपा के चेहरे कांग्रेस से कम काले नहीं। सपा-बसपा का ताण्डव पूरे देश ने देखा है। जयललिता-करूणानिधि के उदाहरण लोकतंत्र को नंगा करने के लिए काफी हंै। आज जो भी संसद या विधानसभा में पहुंचता/पहुंचती है, चुनाव में संविधान की अच्छी तरह धज्जियां उड़ाने के बाद। तब क्या लोकतंत्र की रक्षा करेंगे, सोचा जा सकता है। इस पूरे माहौल में मीडिया ने धन लेकर खबरें छापने का रास्ता भी निकाल लिया।

यह भी सही है कि बड़े घोटाले मीडिया ने ही खोले हैं। इसका कारण मीडिया नहीं, राजनेताओं की ईष्र्या अधिक है। धन इतना बरस रहा है कि व्यक्ति स्वयं न तो संभल पा रहा है और न ही लोभ का संवरण कर पा रहा है। नेता चोले बदल रहा है—देश को बेचकर खा रहा है। राजनीति से माटी का बोध बाहर निकल गया। सारा लोकतंत्र झूठे आंकड़ों पर टिका है। चाहे नेताओं और अफसरों की आय के हों अथवा योजनाओं के खर्चे के। जो कुछ भी यदि बचा है, उसे विदेशियों की झोली में डाले जा रहे हैं, चाहे बांग्लादेशी हो या एफडीआई। मानो कह रहे हों— “आओ, सारा व्यापार-उद्योग अपने हाथ में ले लो। हमारे रहते। अभी जनता सोई है। जाग गई तो काम नहीं बन पाएगा।” देश बिक जाएगा। भाजपा भी 100त्न एफडीआई के पक्ष में थी।

उधर, जनता की आवाज कमजोर करने में भी सारे राजनीतिक दल एक हो गए हैं। एकता और अखण्डता का अवशेष तक देश में नहीं रहना चाहिए। पहले अल्पसंख्यक पैदा किए। फिर बहुसंख्यकों के आरक्षण के हथियार से टुकड़े-टुकड़े कर डाले। आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में अल्पसंख्यक ही बहुसंख्यक के नाम से जाने जाएंगे। टुकड़े-टुकड़े देश क्या सत्ता से जूझ सकेगा? इनके पंजों में फंसे देश को सुरक्षित रख पाएगा? क्या नई पीढ़ी कोई सपना भी देख पाएगी? बेरोजगारी, भुखमरी के दिन लौट आएंगे। आज धन बटोरने वाले मर चुके होंगे। उनकी औलाद अपराधियों के साथ होगी। सबके हाथ में पिस्तोलें, बन्दूकें और अतिक्रमण, आक्रमण करने वाले दस्ते साथ होंगे। राज कंस और रावण करेंगे। नाम लोकतंत्र ही रहेगा।

रास्ता एक ही है। जिसे आगे जीना है, उसे जागना पड़ेगा। वह भी छात्र चुनाव के बहाने भ्रष्टाचार का प्रशिक्षण पा रहा है। छोड़ना होगा। भविष्य संवारना है तो तपना होगा। संकल्प करना पड़ेगा कि पहले स्वयं को तैयार करूंगा, सशक्त बनूंगा और फिर देश को बचाऊंगा। बीज हूं, पेड़ बनूंगा। देश को फल मिलेंगे, छाया मिलेगी। मौत से डरा तो न पेड़ बन सकेेगे, न खुद के काम आ सकेंगे। हर युवा बीज बने। हम सीचेंगे उनको। हमारा लक्ष्य देश को फिर से ऊपर उठाना है। हम सब सिर ऊंचा करके जीना चाहते हैं।

आज तो सरकारों की बेशर्मी से, नेताओं की संवेदनहीनता से रोजाना सिर झुकता रहता है। इस प्रवाह को केवल युवा ही रोक सकता है। आज की पीढ़ी तो स्वयं भ्रष्टाचार में ही शामिल है। अत: गूंगी है और युवा को आगे बढ़ने से रोक भी सकती है। हमें संकल्पित होकर एक-एक को गांधी और अन्ना बनना है। वरना यहां एक अलग नारकीय स्थिति होगी। ईश्वर करे आपकी जवानी देश को नई दिशा दे सके।

गुलाब कोठारी

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