Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 7, 2012

संभव हो संवाद

आजादी के 65 साल बाद भी इस देश में जो मूलभूत कमी है अथवा हमारे राजनेताओ के द्वारा पैदा जान पड़ रही है, वह राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रीय नेतृत्व की है। तब यह देश रसातल में क्यों नहीं जाएगा! आज लोकतंत्र में भी विकास का वातावरण मुक्त नहीं है। लोग नीतियों के नाम पर देश को बेचने में जुटे हुए हैं। राष्ट्रहित तो अब सपने में भी दिखाई-सुनाई नहीं देता। “स्व” हित सर्वोच्च हो गया, भले ही पार्टी हित भी पीछे छूट जाए। राष्ट्रहित की चर्चा कौन करे! साठ सालों में तो अपनी प्रतिबद्धता का संकल्प तक नहीं ले पाए।

कौन नहीं जानता था कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण के विचार आपस में नहीं मिलते थे, फिर भी उनका सम्मान कितना था कि उन्हें उप प्रधानमंत्री पद प्रस्तुत किया गया। इसके विपरीत एफ.डी.आई. के मुद्दे पर भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ अभियान छेड़ा। जब यह बात सार्वजनिक हो गई कि स्वयं भाजपा तो 100 प्रतिशत एफडीआई चाहती थी, तब भाजपा का दोगला चेहरा उजागर हो गया। भाजपा अध्यक्ष गडकरी को लगा कि हाथ आई कुर्सी छूट रही है, तब फिर से एफडीआई का समर्थन करने की घोषणा कर दी। इसी के पुरस्कार में इनका कार्यकाल बढ़ना लगभग तय है। भले ही इन पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हों। यह है, हमारे राष्ट्रीय चरित्र की एक बानगी।

पिछले महीनों में कांग्रेस ने तो विवेकहीन और दिशाहीन कुशासन से रिकार्ड बना डाले। सभी सौ कौरवों के चेहरे, चाल-ढाल काले और गरिमा शून्य दिख रहे हैं। छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस मूकदर्शक से अधिक कुछ भी नहीं बची है। जयललिता, मुलायम, मायावती, मोदी जैसों के परचम बहुत ऊंचे फहरा रहे हैं। नैतिकता की बात किससे करें। उमर अब्दुला से?

जिस देश में लोगों को शिक्षित ही नहीं होने दिया जा रहा, मत खरीदा जाता हो, जातिवाद एवं वंशवाद हावी हो, जनप्रतिनिधियों के आय के आंकड़ों का सत्यापन तक नहीं होता हो, तब इंडोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति सुकार्णो क्या गलत कह गए थे कि भारत को अभी “निर्देशित लोकतंत्र” ही चाहिए।

अमरीका, ब्रिटेन में राष्ट्रहित में राजनीतिक दल अपना स्वार्थ छोड़ देते हैं। हमारा वसुधैव कुटुम्बकम् का नारा कहीं धूल चाट रहा है। हम हर मुद्दे को खण्ड-खण्ड कर देखते हैं। समग्र दृष्टि की अवेहलना, मात्र आलोचना के लिए की जाती है। उधर, अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव के लिए दोनों दलों के प्रत्याशियों में राष्ट्रीय मुद्दों पर देशव्यापी बहस छिड़ी हुई है। अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर दोनों प्रत्याशियों ने देशवासियों के सामने चित्रण प्रस्तुत किया कि अवसर मिलने पर वे देश को किस ओर ले जाएंगे। यह डिबेट राष्ट्रपति चुनाव का महत्वपूर्ण अंग है।

क्या मेरे देश में ऎसी बहस संभव है। भले ही दो राष्ट्रीय दलों के बीच हो। अभी तो चुनाव घोषणा-पत्र भी प्रत्याशियों को याद नहीं होता। चुनाव बाद लगभग सभी दल इसकी चर्चा बन्द ही कर देते हैं। सत्तापक्ष का रवैया रहता है कि जो हम सोच रहे हैं, उसके आगे सत्य ही नहीं है। केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, मात्र चुनाव चिन्ह का ही भेद है। संविधान को धर्मनिरपेक्ष बनाकर धर्महीन राज्य की स्थापना कर दी।

इसीलिए सबसे बड़ा संकट ही राष्ट्रीय चरित्र हो गया। वैश्वीकरण के नाम पर नीतियां तो बन गई। स्पर्घा अपना स्थान नहीं बना पाई। समृद्धि का दायरा बढ़ नहीं सका। अमरीका की मदद से ताइवान और दक्षिण कोरिया ने जो गति दिखाई है, अद्भुत है। मुक्त व्यापार की अर्थव्यवस्था ही इसका कारण रहा है। वहां भी ईमानदार तो रहना ही पड़ेगा। आज भाजपा को और प्रदेशों में विपक्षी दलों को शासन में आने के सपने आ रहे हैं। अत: सत्ता पक्ष जो निर्णय लेता है, उसके विपरीत बोलने लगते हैं। मानों कोई भूत-प्रेत आकर खा जाएगा।

यदि उनके सपने पूरे हो गए तो वे कई गुणा अधिक भ्रष्ट होंगे। इसलिए राष्ट्रीय बहस और मुख्य दलों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति होनी आवश्यक है।

इस दृष्टि से राजस्थान पत्रिका/पत्रिका ने कई तरह के प्रयास एवं प्रयोग किए हैं। जागो जनमत, प्रत्याशी से मतदाता रू-ब-रू हो कर अपनी बात कहे। पिछले कार्यकाल की उपलब्घियों एवं कमियों की चर्चा करे, प्रत्याशी से एक निजी घोषणा पत्र भरवाने का कार्य (अपने-अपने क्षेत्रीय मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में) आदि कार्य कर रहे हैं। समय के साथ और शिक्षा के अनुरूप इतना काफी नहीं है। अन्य मीडिया भी आगे आए। प्रयास होने चाहिए कि चुनाव मुद्दों के आधार पर लड़े जाएं, न कि धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर। भ्रष्टाचार प्रमाणित होने पर जन प्रतिनिधि का सामाजिक बहिष्कार का मतदाता को अधिकार मिलना चाहिए। आज तो ऎसे लोगों को पदोन्नतियां और अलंकरण मिल जाते हैं।

गुलाब कोठारी

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: