Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 14, 2012

रे मनवा मेरे! 4

अरे मनवा

 

जानते हो कि

दो दिशाएं हैं

तुम्हारी गति की?

एक ब्रह्म रूप,

कर्म रूप दूसरी।

मन-विज्ञान-आनन्द

है विद्यात्रयी,

इसमें विज्ञान है

ज्योति, ज्ञान रूप

दाहकता शून्य

और तुम्हारा रूप

संकल्प है (मन में)

पदार्थ के रूप का।

संसार भाव में

ज्योति रूप मन का

अन्तर्भाव होता है

कर्म में, और

ज्योति की

प्रधानता में

कर्म का अन्तर्भाव,

विज्ञान है।

आनन्द अछूता है

कर्म से सदा।

इसी प्रकार ह्वदय,

ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र

अक्षर प्राण भी

भासित रहते हैं

अव्यय पुरूष से,

विद्याओं से।

तीनों अक्षर पुरूष

बन जाते हैं धर्मी

आनन्द-विज्ञान-मन से,

और करते हैं

धारण-पोषण

इस जगत का।

देखो,

आनन्द है विद्या

ब्रह्म की,

विज्ञान है विद्या

इन्द्र की, और

पदार्थो का

रचनात्मक संकल्प

है वैष्णवी विद्या।

जिस मन में

भासित हो ये सब

तो स्थाई हो जाएं

उसके सारे संकल्प,

समाप्त हो जाते हैं

सारे दु:ख

भूख-शोक आदि के।

यदि मन जुड़ा हो

प्राण-वाक््  से

और साक्षी हों

आनन्द और विज्ञान

तब बनता है यह

कर्म-रूप वीर्य भी

तीन प्रकार का –

मन-काम रूप,

तप है काम

प्राणों का,

और चाहिए श्रम

पदार्थ (वाक् ) पाने को।

काम ही है

पहला तत्व सृष्टि का,

पहला वीर्य (रेत)

श्वोवसीयस1 मन का,

अव्यय का, और

जानता रहता है

भीतर-बाहर,

करता रहता है

कुछ न कुछ।

यही वीर्य भाव

जब उठता है

प्राण में, तब

क्रिया होती है,

जब उठता है

वाक्2 में

अन्न के लिए

उठता है।

(पदार्थ = अन्न)

मन में उठता है

वीर्य भाग,

तो आनन्द के लिए,

विज्ञान से जुड़कर।

जीवन चलता

अन्न के द्वारा,

क्रियाएं होती

प्राणों से, और

ज्ञान मिलता है

विद्या3 से।

भीतर ले सकते हैं

ज्ञान और कर्म भी,

अन्न की तरह

और जाग्रत करते हैं

इनसे जुड़े हुए

विद्या और कर्म।

तीन भाव हैं

कर्म रूप वीर्य के

ब्रह्म-क्षत्र-विट्,

ज्ञान को मन में

समर्पित करना,

प्राण में संचार

बल का करना,

अन्न का अर्पण

वाणी में करना ही

कार्य हंै इनके।

समझ रहे हो न,

अपना कार्य स्वरूप

मानस मेरे?

ब्रह्म वीर्य से

भोगों की प्रधानता,

क्षात्र-वैश्य बलों के

कारण, भोक्ता इन्द्र

इन्द्रियों का ग्रहण

देखता रहता है।

ब्रह्मा में ब्रह्म वीर्य,

क्षात्र वीर्य इन्द्र में,

विष्णु में वैश्य वीर्य

की प्रधानता है।

धर्मी है अव्यय

इन तीनों धर्मो से।

अत: विद्या और कर्म

ही आत्मा है।

तेरी नींद के कारण

ही बांध दिया

माया ने तुझको,

अनेक रस्सों से

एक खूंटे पर

और हर खूंटा

खींच रहा है तुझको

बाहर की ओर,

कहीं-कहीं तू भी

बंध जाता है

अपनी मर्जी से

नई रस्सियों से,

कुछ बंधन छूटे

समय के साथ,

कुछ को छोड़ना है

ज्ञान के सहारे,

और देख,

ज्ञान किसका ?

अपने स्वरूप का,

अपने सम्बन्ध का,

माया की रस्सियों का,

उनकी शक्तियों का,

अपने वीर्य का,

लक्ष्य का

संकल्प का।

तेरा स्वामी है

चन्द्रमा,

सौम्य- शीतल,

पत्नी रूप है

सूर्य का, सृष्टि में,

परिभ्रमण करता है

पृथ्वी के नित्य

प्रतिदिन एक बार।

जानते हो, मनवा

कितने रूप हंै

खुद तुम्हारे,

कौन-कौन करता है

प्रभावित

तुम्हारे कार्यो को?

तुम्हीं आधार हो

सारी प्रवृतियों के

काम बीज (कामना) से,

यही अव्यय मन

आत्म मन है

‘श्वोवसीयस’ है।

तुम्हारा रूप

वर्तमान वाला

जो दिखता है

मेरे को

आवरणों के भीतर,

प्रतिबिम्ब है वह

इस श्वोवसीयस का।

तुम्हारा जो रूप

संकल्प-विकल्प है,

उसी अनुसार

पकड़ता है

‘इन्द्रिय मन’

विषयों को।

यह बनता है

सोम से, जो

उपलब्ध है

तैंतीस स्तोम4 तक।

विषय अलग हैं

हर इन्द्रिय के

और समान है

अनुभूति

अनुकूल-प्रतिकूल की

‘सर्वेन्द्रिय’5 मन की

अतिन्द्रिय मन की।

इतने धरातल हैं

तुम्हारे कार्यो के,

भावनाओं के

विचारों के,

तुम्हीं द्वैत हो,

अद्वैत तुम हो,

तुम्हीं जीव हो

ईश्वर तुम्हीं हो,

इसलिए कहता हूं-

ब्रह्मास्मि

अपने आप को,

भाग्यवान हूं मैं

तुम्हारे कारण।

आओ!

लौट आओ,

हे जीवात्मा मन,

मनवा मेरे,

फिर से

ईश्वर रूप में,

निर्विकार होकर।

 

रे मनवा!

देखा तूने

धर्म का रूप,

सुना तूने उनको

कहते भगवान से

‘भुला नहीं देना

मैं शरण तेरी।

क्योंकि कहा था

तुमने गीता में

‘बस, आ जा मेरी शरण।’

लो, मैं आ गया।’

याद रखते हैं

हम कितनों को,

बता रे मन,

कृतज्ञता से

जीवन भर ?

याद रखना

भूल जाना

छलावा है जीने का,

मैं रखंू याद सबको

और भूल जाऊं

स्वयं को ही

क्या अर्थ है ?

मैं याद रखूं

उनको, जो मर चुके,

घटनाओं को

जो बीत गई,

अनुभवों को, जो

बन चुके

श्ृंगार मेरा

उसी समय?

स्मृतियां धोखा है

बंधे रहना है

माया भाव से,

तू तो सर्वेन्द्रिय है

इन्द्रियातीत6 है न

रे मन मेरे!

तब क्यों भटकता

जंगलों में

स्मृतियों के,

कुछ न लौटेगा,

कोई नहीं होगा

अब साथ तेरे,

ओ भोले नाथ,

मूर्ख बना रही

माया तुझको

छीनकर

वर्तमान तेरा,

ताकि न बना सके

भविष्य अपना,

छूटकर माया से।

जितनी यादें

उतने बन्धन,

आ लौट चलें,

भीतर अपने।

‘हम भी छोटे थे,

स्कूल बहुत दूर थे,

पैदल जाते थे,

क्यारियां बनाते थे,

ऎसे थे एक ‘टीचर’,

क्या दिन थे

पिकनिक जाते थे,

बारात के मजे

त्यौहार के मजे,

छेड़छाड़ के मजे,’

आज भी इतराता

मेरा मन इन पर,

पिछले साठ साल में

लम्बी हो गई

यादों की सूची,

लद गए दिन

सुदामा के,

विज्ञान ने

दी नई दृष्टि,

स्पष्ट दिखने लगी

पुरानी सृष्टि,

जीवन्त ‘काण्ट्रास्ट’

अकाट्य भेद।

मृतकाय स्मृतियां

बढ़ गइंü इतनी,

छोटा पड़ रहा

श्मशान

दफनाने को इन्हें।

खाली कर

मकान अपना

इन मुर्दो से,

निकलेगा कुछ

दबा हुआ नीचे,

तेरा आत्म-ज्ञान

लेकर आया है

जन्म के साथ

कई जन्मों से।

क्या यह कम है

याद रखना है

अनेक नाम

लोगों केे

शहरों के,

अंकों को

ताकि अटके  नहीं

विकास जीवन का।

आत्मा से जुड़े हैं

स्मृति-स्मरण और

अपोहन7।

त्रिगुणी8 है मन,

बुद्धि भी,

जैसे ही टकराती

स्मृति इनसे

किसी संयोगवश,

तुरन्त खुल जाता

पिटारा संस्कारों का

जन्म-जन्म का भी,

तय करता है

यही संग्रहालय ही

हमारे पुनर्जन्म भी।

कैसे होते हैं

साहित्यकार भी,

प्रशस्तिगान करते

स्मृतियों का,

हम भी शौकीन हैं

पुराने एलबमों के,

आसक्ति का पर्याय

है स्मृति-

कहीं राग-कहीं द्वेष,

हम हैं कि

चिपके जाते हैं।

लौट आ, मन

काटकर इस

सारे जंजाल को,

क्यों फंसा रहता

अतीत की छांव में

तुझे तो चलना

भविष्य की राह

पकड़ना मंजिल,

जान समय का मोल,

मांग ले क्षमा

सभी से,

द्वेष पूर्ण हो कोई

कर ले प्रायश्चित,

मांगकर आशीष

सभी से,

क्या पता लौट जाएं

स्मृतियां

जन्म-जन्म की,

जाति-स्मरण ज्ञान,

छान लेना इनको

रे प्राज्ञ,

प्रज्ञा की छलनी से,

अज्ञान, अंधकार

न रहे शेष

अब इस जीवन में,

अंहकार भी

करने नहीं देता

प्रायश्चित कभी,

अत: छोड़कर भाव

स्वयं ‘कर्ता’ का,

बन जा निमित्त

अपने भाग्य का,

लौट आ शीघ्र

स्मृतियों से

लील जाएंगी

वर्तमान तेरा,

निर्दयी हंै देख

खाती वर्तमान को,

लोहा करती है

मेरे स्वर्ण काल को,

शत्रु है बड़ी

मेरे जीवन की

स्मृति की माया

सुन्दर सी काया,

तू छोड़ सकेगा

यदि स्मृति में हो

खड़ी

यौवन की देहरी पर

सुन्दर सी छाया,

समझ ले-

हाथ कछु न आया,

कुछ गया जेब से,

आ लौट चलें,

बहुत कम बचा है

वर्तमान

अपने खाते में

खर्च नहीं करना

खरीदकर

स्मृतियों को,

कर दे अर्पण

इन सबको ही

माया के चरणों में।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के

प्रधान संपादक हैं

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: