Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 21, 2012

लज्जा रूपेण संस्थिता

या देवी सर्वभूतेषु लज्जा रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

परिवर्तन के इस दौर में सामाजिक और नैतिक मूल्यों की बड़ी उठापटक हुई। जीवन भौतिकवादी दृष्टिकोण के कारण इतना एकपक्षीय हो गया कि सुर-असुर के बीच का झीना परदा -लज्जा- भी फट गया। लज्जा ही सदाचार में बनाए रखती है और अनाचार में प्रवेश से रोकती है। लज्जा के पीछे कई प्रकार के भय रहते हैं। उसी से व्यक्ति मर्यादा में रहता है। लज्जा नर-नारी दोनों पर समान रूप से लागू होती है। दोनों ही अर्धनारीश्वर हैं।

पुरूष चूंकि çस्त्रयों के अनुपात में आक्रामक अधिक होता है, अभिमानी अधिक होता है, उतावला होने की वजह से करने के बाद विचार करता है, लज्जा के भय से बहुत हद तक मुक्त रहता है। इसी लज्जा को बनाए रखने के लिए नवरात्रा में शक्ति पूजा करता है, कन्या पूजन करता है, ताकि महिलाओं के प्रति उसके आदर भाव में कोई कमी नहीं आए। यदि कमी आ भी गई, तो आराधना करके, प्रायश्चित करके पुन: प्रतिष्ठित किया जा सके। देवी स्वरूप की व्याख्या करके उसका झूठा महिमामण्डन नहीं किया जाता। पुरूष-प्रकृति की गलत परिभाषा भी इसके लिए उत्तरदायी है। प्रत्येक पिण्ड, मूर्ति और आकार का केन्द्र पुरूष ही है — जड़, चेतन, नर-नारी में। पुरूष के चारों ओर परिधि तक माया-प्रकृति है।

पुरूष में अहंकार के कारण आसुरी (नकारात्मक) भाव अधिक होते हैं। स्त्रैण ही इनका संतुलन है। आज नारी का स्त्रैण घट रहा है। वही उसके संत्रास का मुख्य कारण है। शिक्षा ने नारी का पौरूष भाग अधिक विकसित किया। भयमुक्त भी किया और विवाह की उम्र भी बढ़ा दी। एक ओर, उसके विचारों का लचीलापन लगभग समाप्त होने लगा, दूसरी ओर, प्रकृतिदत्त मातृत्व भाव का दबाव भी अपना प्रभाव दिखाता रहा। उसकी पुरूष प्रकृति का विकास विकर्षण का कारण बन गया। विवाह विच्छेद होते ही सुरक्षा-चक्र टूटने लगा।

नौकरी के यौन शोषण ने उसको अपनी ही नजरों में गिरा दिया। उसका सारा गर्व चूर-चूर हो गया। किसी युवा महिला का अकेले जीना शायद जमाने को गवारा ही नहीं। हर मुकाम पर अत्याचार, बलात्कार और वह भी अपने ही समर्थ लोगों द्वारा, किसका ह्वदय नहीं चीर देगा! तब लगता है कि नारी होना एक अभिशाप है। यही सच है। इसका उत्तर स्त्रैण भाव में निहित है, जो पीछे छूट गया। मैं कार चला रहा हूं। सामने से एक कार आ रही है। ड्राइवर नशे में लगता है। दुर्घटना होने के बाद ड्राइवर को कोसने से क्या फायदा। कारण तो हमारी असावधानी या अक्षमता है।

आज तो भ्रूणहत्या और आत्महत्या दोनों के आंकड़े वीभत्स नजर आते हैं। भ्रूणहत्या तो अपने आप में दरिन्दगी का प्रमाण है। इस कृत्य में मां, दादी, डॉक्टर, नर्स आदि सभी महिलाएं जुड़ी होती हैं। पुरूष वर्ग को कभी अभाव महसूस नहीं होता। प्रश्न यह है कि हत्या से जुड़ी सारी औरतें अपने-अपने जीवन से इतनी दुखी होती हैं कि भय के कारण किसी नई कन्या का अवतरण ही नहीं चाहतीं? क्या दहेज हत्या, महत्वाकांक्षा आदि घर में नारी को देखना ही नहीं चाहते, संतान को संस्कारवान कोई देखना ही नहीं चाहता?

इसी का दूसरा पहलू है पुरूष का नारी के प्रति व्यवहार। इसमें पिछले वर्षो में बहुत गिरावट आई है। शायद नारी की अत्यधिक महत्वाकांक्षा का ही दोहन हो रहा है। शुरू का दौर ग्लैमर युक्त रहता है। उम्र के साथ एक भाव फिर से मन में कौंधने लगता है कि घर पर रहती, तो कभी अपमान के इतने घूंट नहीं पीने पड़ते।

नारी को अत्याचारों से मुक्ति चाहिए तो सबसे पहले उसे अपने स्वरूप की जानकारी हो। शरीर के आगे वह पुरूष से कई गुणा आगे है। वही समाज को धर्म, संस्कृति और पहचान देती है। हर एक के भीतर शक्ति है। उसका विकास ही उसका त्राण बन सकता है। बाहर जिसकी सहायता मांगेगी, वही अपना मोल मांगेगा। यही अत्याचार की शुरूआत है। इसका पहला बीज मंत्र है लज्जा।

गुलाब कोठारी

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