Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 28, 2012

क्यों बोझ उठाएं लोग?

इस देश में दो ही लोग दु:खी हैं। एक कर्जदार, दूसरा- बेटी का बाप। राजस्थान विधानसभा में राज्य के ऋण भार का आंकड़ा रखा गया – एक लाख छह हजार करोड़ रूपये और जनता से प्राप्त टेक्स एवं अन्य वसूलियां अलग। वास्तव में सरकार का खर्च व विकास, दोनों ही जनता से प्राप्त राजस्व से होना चाहिए।

उधार क्यों और किसके भरोसे? इतना ज्यादा उधार लेकर जनता को क्या दिया? वही गंदा पानी, भूख, बेरोजगारी, नशाग्रस्त पीढ़ी, शिक्षा के नाम पर अंगूठाटेक, मौत का ताण्डव और नकली दवाइयां, बदहाल सड़कें और भी न जाने क्या-क्या।

तब कौन खा गया राजस्व और उधार का धन? जब भूख-प्यास का प्रबन्ध न हो, रहने जीने का प्रबन्ध न हो, तब क्यों बनती हंै हजारों करोड़ की ठेकेदारी योजनाएं? क्यों सूखने दिया अफसरों ने रामगढ़ और क्यों लाए बीसलपुर का पानी? क्यों बेच रहे हैं जनता की जमीन अपना पेट भरने के लिए? क्यों मांगते हैं टेंडर माल खरीदने के लिए, जब सीधा अनुबन्ध कर सकते हैं थोक भाव में? क्यों नहीं पकड़ती कोई सरकार चोरों को, बिजली-पानी-सड़क परिवहन सभी जगह तो सरकार ही बिठाती है चहेतों के नाम से चोरों को।

आजकल तो खनन माफिया, शराब माफिया, मादक पदार्थ माफिया, हथियार माफिया, भू-माफिया, ड्रग ट्रायल माफिया, आतंककारी, कट्टरवादी जैसे हाई-प्रोफाइल लोग चला रहे हैं मेरे लोकतंत्र को। इनमें लाखों-करोड़ों का धन लगा है। कहां से आता है! ऊपर से रिश्वत-भ्रष्टाचार! रावण की लंका से तो हम बहुत आगे निकल चुके हैं।

लोकतंत्र में सरकारें जवाबदेह होती हैं और होनी भी चाहिए। सरकार को सार्वजनिक रूप से यह भी बताना चाहिए कि जनता की मूलभूत समस्याओं को वह फिर भी क्यों नहीं सुलझा पाई है? क्या व्यवस्था होगी इस एक लाख करोड़ से ज्यादा कर्ज राशि को ब्याज सहित चुकाने की?

सरकार ने कई अर्थो में पारदर्शिता के नाम पर मुखौटे भी लगा रखे हैं। भ्रष्टाचारियों के विरूद्ध कारवाई करने में सरकार मौन हो जाती है यानी खुली छूट है। लूट सके, तो लूट। यह बात स्वयं सरकार ने प्रमाणित भी कर दी, जब आधिकारिक रूप से 18 वरिष्ठ अधिकारियों के विरूद्ध आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में कार्रवाई रूकवा दी।

यह सब इस बात के संकेत हैं कि इस सरकार की अर्थव्यवस्था पर अपनी कोई पकड़ नहीं है। सब दोनों हाथ से बटोरने में लगे हैं। उधार लेकर घी पीना है। चुकाने वाले जानें। इस रवैये से तो नई पीढ़ी एकदम पंगु हो जाएगी। राज्य में हर व्यक्ति पर आज भी 15,631 रूपये का उधार है। क्या ऎसे में युवा पीढ़ी को हाथ पर हाथ धरे बैठना चाहिए? सबसे पहले तो उन्हें राजनीति से बाहर आ जाना चाहिए। नहीं तो उनकी तो शुरूआत ही भ्रष्टाचार से ही होगी। भ्रष्ट होकर वे देश-प्रदेश के किसी काम नहीं आने वाले।

जरूरत है एक क्रान्ति की। विचारों के साथ-साथ मूल्यों की, समानता की, साम्प्रदायिकता से ऊपर उठने की, शिक्षा स्वरूप परिवर्तन की और सरकारी कामकाज के प्रति जागरूक होने की। युवाओं को अपना भाग्य विधाता बनना पड़ेगा। हर युवा एक आरटीआई अवश्य लगाए। कोई गलत बिल पास हो, कोई गलत क्रियान्वयन हो रहा हो, तो तुरन्त रोकने को आगे आए।

प्रमाणित भ्रष्टाचारियों का सामाजिक बहिष्कार भी किया जाना चाहिए। चाहे वह किसी भी धर्म-जाति या राजनीति दल का हो। इनको सार्वजनिक समारोह में तो हर्गिज नहीं बुलाना चाहिए। एक अन्ना यदि देश में भ्रष्टाचार के विरूद्ध बिगुल बजा सकते हैं। जब एक-एक युवा अन्ना हो जाएगा, तो एक लाख करोड़ का उधार भी सरकार ही चुका देगी।

गुलाब कोठारी

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