Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 28, 2012

रे मनवा मेरे! 5

देखा रे मनवा,

 

मकड़ जाल

स्मृतियों का,

धर्म कहता है

‘नेकी कर

कुएं में डाल’

स्मृति भी न रहे।

कर्म में यदि

जुड़ी फल की इच्छा

तो बनी रहेगी

स्मृति संग-संग

भटकाए चित्त को,

बढ़ती है

प्रवृत्ति संग,

प्रतिक्रिया रूप

बहुत लम्बी।

बदल डालती

रूप हमारा,

चिपका देती

विषय को,

लादकर रखते हैं

स्मृतियों का बोझ

टोकरा भरकर

श्रमिक की भांति

सिर पर

जीवन भर।

डूबते रहें

चिन्ता में,

करते नहीं प्रयास

निवृति1 के कभी।

दो प्रकार की

स्मृति है

एक याददाश्त,

दूसरी मेधा जनित,

पैदा होती है जो

संस्कारों से,

चित्त के ठहराव

पर जब

बैठ जाए बात,

बन जाती है

स्मृति।

इसी के लिए

किया जाता है

संस्कार-मेधा जनन,

यज्ञोपवीत के साथ।

यह स्मृति

जाग्रत होती है

सत्व गुण के साथ,

तम और रज के

प्रभाव में दब जाता है

सत्व गुण और

साधारत: स्मृति का

यह स्वरूप

नहीं होता प्रकट।

विद्या अंश नहीं रहा

भारत में आज

भूल गए स्मृतियां,

छूट गई भारतीयता,

आंख मीच ली

नई पीढ़ी ने भी,

यही भाग्य में है

शायद इस देश के।

वही स्मृति है ये

जो थी कृष्ण को

और नहीं थी

अर्जुन में,

कृष्ण को याद थे

सारे जन्म अपने

अर्जुन शून्य था।

स्मृति बन जाती हैं

वृत्तियां

जो दबी रह गई,

किसी कारण वश

या किसी दबाव में,

जबकि चाहता था

मन तो इस वृत्ति को,

जैसे ही मिला

उचित अवसर

मन बह निकला

पीछे छोड़ मर्यादा

और निषेध सारे,

यही प्रकृति है,

बड़ा योग है

वृत्ति-प्रवृत्ति2 का,

तेज होता प्रवाह

अधोगामी वृत्ति का,

रज और तम से।

वासना बनकर

बनती है कारण

पुनरावृत्ति का,

यही व्यसन है,

पकड़ लेता है

मन को बलात्।

स्मृति जनक है

राग-द्वेष की भी,

राग और मोह

का युगल एक है,

द्वेष और घृणा का

एक अलग युगल,

दोनों ही घातक

दोनों ही पातक,

आप कहो ‘प्यार है

मुझे राम से’ तब

कुछ गलत नहीं

दिखाई देगा राम में,

और कहो घृणा है

रावण से, तो

दिखाई नहीं देगी

कोई अच्छाई,

दोनों ही स्थितियों में

गलत होंगे

मेरे निर्णय

पूर्वाग्रह के कारण,

छूट जाता है

सहज जीवन भी।

लौट आओ, मन

मेरे जीवन केन्द्र!

पूर्वाग्रह से,

मांगकर क्षमा

स्मृतियों से,

करके प्रायश्चित,

नए संकल्प से

शुरू कर लो

नया जीवन,

ओ मेरे मन।

स्मृतियां भी

रहती हैं दबी

भीतर ही भीतर,

उभरती हंै कभी

स्वप्न मेें,

कभी ध्यान में,

एकान्त में

स्वप्न भी अंग हैं

जीवन का

अतीत, वर्तमान का,

लोगों के स्वप्न

करके इंगित हैं

दर्शन जीवन का

गूढ़ भाषा में,

कहीं देव दर्शन,

भावी संदेश,

जोड़कर जीवन को

कुदरत के पास-पास,

जितने लोग

जितनी गतिविघियां,

उतने ही स्वप्न

स्वतंत्र भी

इच्छित दिशा में भी,

मनोहारी पट पर

जीवन्त लगते हंै,

लोग भटकते हैं

सपने ही देखते हैं,

इन्द्रजाल माया का

बना देता राजा

हर एक रंक को,

सलाम मोहिनी को।

मन रे

तू कम्प्यूटर

सबसे बड़ा!

कितनी स्मृतियां

कितनी बाधाएं

हर पल, हर मोड़ पर,

हर व्यक्ति के साथ,

प्रवास की

आवास की

मधुमास की,

बाधा बनती

यात्रा पथ पर,

कैसेे संभव हो

यात्रा ऊध्र्व की

कांटों के झाड़ में,

बुहारना तो है,

चल रे मन

लौट चलें भीतर

अपने ही,

न कोई लोग

न कोई रोग,

न राग, न द्वेष,

न कोई दिशा

न ही गति,

स्थिति बस है,

साक्षी है स्वयं से,

हम टिके हुए

दहलीज पर

समय की

जाने को तैयार

समय के पार

 

स्मृति नहीं यथार्थ

रे मनवा

यह है भूल-भुलैया,

है कोरी कल्पना

चित्रण में साकार,

तू तो खो जाता

भविष्य में भी

इसी तरह है यार,

हूं मैं हैरान

देखकर क्या है

तेरा स्वभाव,

चिपक जाता क्यों

गुदगुदाहट के साथ,

रहस्य, रोमांच, सट्टा

सबसे हाथों-हाथ,

फिर भी कहता

‘बहुस्याम’3 तब

बात समझ न आती,

राग कहीं और

प्रवाह में माया के

बह जाना,

बात प्रेम की

करता सबसे,

नहीं खुद पर

दृढ़ विश्वास।

क्या परिभाषा

प्रेम की तेरी,

क्या ढूंढे

‘बहुस्याम्’।

नाटक सारे राग

जगत के

नहीं सहज वैराग्य,

पुरूष रूप तुम

आक्रामक भी,

दबे-दबे माया से,

माया के भीतर

तुम्हीं हो,

तुम ही नारी

नर भी तुम हो,

खेल रही है माया,

खुद से खुद का

आलिंगन,

खुद ही भोगें

खुद को

स्वांग यह कैसा

मनवा तेरा

कोई समझ न पाया।

कर्ता नहीं तू

माया कर्ता,

भेष्ा बदल तू आया,

दोनों दिखते नहीं

साथ में

ऎसा प्रीतम पाया,

वह नहीं दिखता

तेरे रहते,

तू खो जाती

उसके आते

प्रेमी युगल बताए।

तब क्या राग

और विराग क्या

बात समझ-

नहीं आए।

जब पूरी सृष्टि में

तू ही है

एक पुरूष

और शेष सभी है

माया,

वाह रे मनवा,

कृष्ण नाम से

कैसा रास रचाया!

जब ब्रह्म स्वयं

रमा हुआ है

माया के संग

दूर-दूर तक

जपते-जपते

‘बहुस्याम्’,

तब क्यों कर

लौट सकेगा

ब्रह्म अपने धाम!

तब एक जुगत है

बाकी,

निद्र्रा में हो माया,

तू लौट-लौटकर आया।

तू लौटे वापिस

रे मन

तब हो आधा काम,

बाकी आधा हो

माया लौटे

स्वयं भी अपने धाम।

समर्पण हो जाए

आक्रमण उसका,

तू भी कर ले

प्रतिक्रमण4।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

 

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