Gulabkothari's Blog

नवम्बर 4, 2012

सत्य

जीवन सत्य की एक तलाश भी है और इसको पा जाने की आस भी है। प्रश्न यही है कि सत्य की पहचान क्या, परिभाषा क्या! क्या प्रत्येक व्यक्ति एक ही परिभाषा मानता है, सत्य की? सत्य ईश्वर है। ढंका हुआ सत्य झूठ है। हमारे भीतर ईश्वर है, ढंका हुआ है, अत: जो दिखाई देता है झूठ है? जिस ईश्वर की मन्दिर-मस्जिद-गुरूद्वारों में पूजा होती है, क्या वही सत्य है! सत्य को किस रूप में ढूंढ रहे हैं यह महत्वपूर्ण है। ज्ञान रूप में, आत्मा के रूप में, अव्यय पुरूष के रूप में, कृष्ण के रूप में।

 

 

सत्य का एक स्वरूप तो पुरूष रूप है। यानी कि जिसका केन्द्र हो, परिघि हो, आकार हो, जो स्थान भी घेरे। जो केन्द्र में बैठा हो, वही पुरूष कहलाता है। वही सत्य है। जिसके न केन्द्र है, न ही परिघि है, वह ऋत् है। जैसे हवा, पानी, आकाश। सत्य की खोज भी अनादि काल से चल रही है। आत्मा के दो पहलू हैं-ज्ञान और कर्म। दोनों की गति विपरीत दिशा में रहती है। कर्म सृष्टि की ओर ले जाता है तथा ज्ञान ब्रह्म की ओर। दोनों के सत्य भी विरोधाभासी होंगे। तब सत्य की खोज का मार्ग कैसे प्रशस्त हो और क्यों नहीं संभव हो पाता?

 

जीवन नाम आस्था का है, संकल्प का है। यही धर्म बनकर मार्ग प्रशस्त करता है। किन्तु कहने मात्र से संकल्प नहीं हो जाता। बोलने से भी नहीं होता। पहले श्रद्धा और समर्पण का विकास आस्था के साथ जुड़कर करना पड़ेगा। यही सबसे कठिन कार्य है। झुक जाना सहज नहीं है। झुकने के बाद कुछ करने की जरूरत नहीं रह जाती। भक्त प्र±लाद और एकलव्य के उदाहरण इस संकल्प और श्रद्धा के पर्याय हैं। मन चंगा तो कठौती में गंगा।

 

मार्ग कोई भी पकडें, श्रद्धा के बिना सफलता का सपना व्यर्थ ही होता है। सत्य की परिभाषाएं भी बदलती जाएंगी, विकल्प अपना कार्य करते रहेंगे, इन्द्रियों का साम्राज्य यथावत् छाया रहेगा। मन सत्य को खोजता रहेगा।

 

क्या सत्य का सम्बन्ध बोलने से है? केवल झूठ नहीं बोलने से है? क्या सृष्टि का सत्य इस सत्य से भिन्न हो सकता है? आखिर शब्द भी तो ब्रह्म ही है। और शास्त्र ब्रह्म को ही सत्य कह रहे हैं। उसी को कुछ अद्वैत के नाम से कहते हैं और द्वैत स्वयं असत्य बन जाता है। जीवन व्यवहार में सत्य आंखों देखा माना जाता है, जो टी.वी.के उदाहरण से असत्य साबित हो रहा है।

 

दूसरा प्रश्न है कि मैं अपनी भूल स्वीकार कर लूं तो वह सत्य मान लिया जाएगा और नहीं स्वीकार करूं तो क्या प्रभाव पड़ने वाला है। क्या सत्य भाषण मुझे ब्रह्म तक पहुंचा सकता है? यह बात तो निश्चित ही है कि झूठ बोलने से मैं ब्रह्म से दूर हो जाऊंगा। मेरे मन पर एक नया आवरण चढ़ जाएगा।

 

सत्य को ढंकने का मेरा प्रयास बन्धन का ही कार्य करेगा। अब यदि सत्य को ढूंढना है, तो इस आवरण का हटना पहली अनिवार्यता होगी। किसको पड़ी है इसे हटाने की! दिन भर की दौड़ में ऎसे तो अनेक  असत्य जीवन में भरते जाते हैं। हर व्यक्ति के साथ झूठा या अलग व्यवहार करना भी मुखौटों का ही कार्य करना है।

 

माया का कार्य है ढंकना और यह नित्य सैकड़ों आवरण चढ़ाती जाती है। कामना ही हमें स्वयं से दूर करती है। सच तो यह है कि कामना की पूर्ति ही सत्य का दर्शन है। तृष्णा रूप में माया कामनाएं बढ़ाती जाती है। नित नए विषय इन्द्रियों के समक्ष आते रहते हैं। मन अटकता रहता है। पिछला भूल जाता है। नए पर मन अटकता जाता है। व्यक्ति स्वयं से झूठ बोलता जाता है। अपने किए को खुद ही झुठलाता रहता है। कामना-प्र्रयास-मोह-लोभ-ईष्र्या आदि का जाल फैलता ही जाता है। ये सारे कामना के ही स्वरूप हैं। सभी सत्य को धक्का मारकर पीछे करते जाते हैं। मन को सत्य की ओर मुड़ने का अवसर भी नहीं देते। सत्य की खोज ही तो जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। यही द्वन्द्व है। यही द्वैत है। ब्रह्म कुछ चाहता है, माया उसे होने से रोकने का प्रयास करती है।

 

ब्रह्म से सृष्टि निकलती है और उसी में लीन भी होती है। सच में तो सत्य इतना ही है। हां, बीच के काल को, अवरोध को, आवरणों को हटाने का नाम ही जीवन है। आवरण पैदा करना पुनर्जन्म का हेतु बनता है। जब तक कामना है, कुछ पाने की लालसा है, सत्य ढंका ही रहेगा। बाहर की दौड़ में सत्य मिल नहीं सकता। विज्ञान के सारे उपकरण, सारे प्रयास सत्य तक नहीं पहुंच पा रहे। सत्य विज्ञान से परे है, बुद्धि से परे है और यहां तक कि प्रज्ञा से भी आगे है। प्रज्ञा तो सत्य की खोज का प्रवेश द्वार है। विज्ञानमय कोश में तो चेतना का जागरण होता है। जब तक हम प्रयास करते हैं, प्रत्येक साधन का स्वरूप बदल जाता है।

 

शरीर, विचार, भाव तो प्रतिक्षण बदल जाते हैं। इसलिए समय के साथ सत्य की खोज के आयाम बदल जाते हैं। सृष्टि परिवर्तनशील है। समय के साथ बदलती है। जो नहीं बदलता वह आत्मा है। वह शाश्वत है। वह सदा है। उसे ढूंढना नहीं पड़ता। ढूंढना तो कामना पूर्ति के मार्ग को पड़ता है। उधर मुड़े कि माया का घेरा शुरू।

 

क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, पूरा कुनबा घेर लेता है। मन बाहर अटकता ही चला जाता है। भीतर जाने के लिए अमन की स्थिति चाहिए। साक्षी भाव चाहिए। इसका अर्थ है स्वयं को क्रिया से बाहर रखना। जीवन को चलचित्र मानकर देखना। तब अभ्यास के साथ साक्षी भाव पैदा होने लगेगा। विश्वास जागेगा, श्रद्धा जागेगी और आनन्दमय कोश में प्रवेश करने की घड़ी उपस्थित हो जाएगी।

 

मन मीरां बन जाएगा। पूर्णत: स्त्रैण, पूर्णत: समर्पित। यह सौम्या अब तैयार है ब्रह्माग्नि में आहूत होने को। यही अन्तिम कामना है मन की भी, अन्तिम आवरण है, सत्य पर छाया हुआ। जैसे ही आवरण गिरा, मन कामना मुक्त हुआ और तुरन्त आकाश हो गया।

 

ओशो ने लिखा है-‘समय की छाया सिर्फ काम है। चाहे काम को समय की छाया कहो अथवा समय को काम की छाया कहो। ज्यादा उचित होगा कि समय काम की छाया है। अगर कामना गिर जाती है, तो समय भी गिर जाता है। मूल में कामना है, कुछ चाहिए। समय और काम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।’ ओशो ही अन्यत्र लिखते हैं-‘समय की धारा चीजों को खण्डों में बांटती है। समय विभाजन का स्रोत है। जिसने समय की तरफ से अस्तित्व को देखा, वह देखेगा अनेक। जिसने आकाश (स्पेस) की तरफ से देखा, वह देखेगा एक। जिसने समय की तरफ से देखा वह सोचेगा भाषा में-साधना की, सिद्धि की। चलना है, पहुंचना है, गन्तव्य है कहीं। श्रम करना है, संकल्प करना है, चेष्टा करनी है। तब कहीं पहुंच पाएंगे। जो आकाश की तरफ से देखेगा, उसकेे लिए कहीं कोई गन्तव्य नहीं है।

 

सिद्धि मनुष्य का स्वभाव है। आकाश यहां है। जाने को कहां है। जहां हो, वहीं आकाश है। बाहर-भीतर व्याप्त है। सदा से है। समय (टाइम) में चलना हो सकता है। आकाश में कैसा चलना। आकाश में यात्रा का कोई उपाय नहीं, समय में यात्रा संभव है।

 

श्रमण परम्परा कहती है श्रम से परमात्मा को, सत्य को पाया जा सकता है। तपना पडेगा। हिन्दू का आधार ‘अहं ब्रह्मास्मि’। पाने की कोई बात नहीं। जागना है, जानना है। ब्रह्म तो भीतर बैठा हुआ है। यह है आकाश दृष्टि। महावीर ने आत्मा को जो नाम दिया वह है समय। समाघि को कहा सामायिक।

 

जो समय को मानेगा, समर्पण संभव नहीं होगा। आकाश में झुक जाना श्रद्धा है- श्रम नहीं है। बोध काफी है। समय के साथ शुभ-अशुभ है। नैतिकता का भाव होता है। अंधेरे को काटना है, प्रकाश को लाना है, योद्धा बनना पड़ेगा-महावीर। जैन शब्द का भी अर्थ है, जिसने जीता। यही बात किसी भक्त से पूछो, कहेगा कि जीतने से कहीं परमात्मा मिलता है क्या।

 

हारो तो मिलता है। हारो! समर्पण कर दो। हारते ही मिल जाता है।’ द्रौपदी जब तक संघर्ष करती रही, दु:शासन को रोक नहीं सकी। जैसे ही हार मानकर समर्पित हुई कि चमत्कार घटित हो गया।

 

यह स्पष्ट है कि सत्य को पाना सहज है। चंूकि हम स्वयं असहज हो जाते हैं, प्रयास में जुट जाते हैं, तब सत्य ओझल हो जाता है। स्वयं प्रयास ही आवरण बन जाता है। समर्पण का अर्थ है प्रयास बंद कर देना। प्रयास और अहंकार पर्यायवाची हैं। सत्य को खोजना नहीं पड़ता। सारे प्रयास असत्य की धारा है, जो आत्म -सत्य से दूर करती है। विज्ञान के प्रयास भी यही कर रहे हैं। सत्य है वर्तमान-साक्षी भाव। आनन्दमय कोश के आगे की मंजिल।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

 

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