Gulabkothari's Blog

नवम्बर 11, 2012

रे मनवा मेरे! 6

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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मन मेरे

 

कितना जान पाए हो

माया को

84 लाख योनियों में?

यदि जान पाते

तो हो गए होते

मुक्त

इसकी पकड़ से।

इसका रूप है

अहं-विमर्श1,

यानि मौलिक स्फु रणा2,

जो प्रकट करती है

एक ही शक्ति को

विभिन्न रूपों में,

संकल्पात्मक है

इसका सारी

क्रियात्मकता,

उन्मुखता मात्र है।

एक अविराम

गतिशीलता है

स्फुरणा।

मन में उठता है

जब नया भाव

अलक्ष्य तीव्रता से,

तब डूब जाता है

पूर्ववर्ती भाव

उसी तीव्रता से।

तब ठहर जाती है

बाह्य गति

मानसिक वृत्तियों की

इनके मध्य क्षण में।

निर्विकल्प होता है

यह क्षण,

जानता है न रे

मेरे मन,

इसमें कौंधती एक

बिजली तीव्रता से

प्रकाश मानता रूप।

तब बाह्य शक्ति को

ऎसे क्षणों में

कश्यप सदृश्य

भीतर समेटकर

हो जाते हैं

अन्तर्मुखी।

इसी प्रक्रिया को

कहा जाता है

चित्तनिरोध3।

मोक्षमार्गी को

इसमें जोड़ना है

संकल्प की दृढ़ता,

अटल श्रद्धा,

सद्विचार

आत्म शक्ति(तीव्र),

सारी बाधाएं

संसार की

पार करता है

तू ही

मेरे मन

संकल्प से

दृढ़ संकल्प से।

कोई क्षुधा

मिट नहीं सकती

बिना संकल्प के,

कोई प्रयोजन

कैसे सिद्ध होगा

इसके बिना,

कैसे पार पाएंगे

विकल्पों से

बिना संकल्प के,

यही मार्ग है

उपासना का

भक्ति का

कर्म की दृढ़ता का

यही बन जाता

धर्म व्यक्ति का,

यही अस्त्र

जीवन संघर्ष का

ठीक है न?

किसी ने छुआ है

कोई शिखर

बिना संकल्प,

किसके सहारे

जी लेती है

एक स्त्री

ससुराल में

तीन चौथाई काल,

मन ही प्रवृत्ति

निवृत्ति भी मन,

मन रागी

मन विरागी,

और वैराग्य पथ

ले जाता है

ऎश्वर्य तक।

हर क्षुधा के संग

जुड़ते हैं सदा

विद्या-अविद्या के रंग।

हर वृत्ति

हर इन्द्रिय की दिशा

है विद्या-अविद्या,

संकल्प है गति,

मार्ग है मंजिल,

निरन्तरता करती

तय अवघि को,

हर मार्ग पर

चौराहे अनेक

आकर्षण अनेक,

माया भाव के,

प्रारब्ध की प्रेरणा

कब मोड़ दे

मार्ग जीवन का।

भोजन देता है

ऊर्जा

करने को निर्माण

काया का,

क्षति पूर्ति का,

वही भोजन

अति होकर

बन जाता है

कष्ट कारक।

बेमेल होकर,

प्रकृति विरूद्ध

अथवा विषैला सा

कर देता है

रोगग्रस्त।

विद्या से होगा

सात्विक-सुपाच्य,

अविद्या से सदा

नियंत्रणहीन

और बेमेल

असमय अथवा

बिना भूख के भी

तामसिक आहार,

अभिमानी करता है

अंहकार युक्त,

शरीर पर प्रहार।

विद्या देती है

अल्पता और

अविद्या बढ़ाती भार,

करवाती है लोभ

स्वादु भाव का।

कैसे बंधा होता

रे मन तू

स्वाद से,

रस तो हैं

केवल छ:

और व्यंजन?

स्मृतियां लाखों

क्या खाया

किस शहर में,

किसकी शादी में,

किसके हाथ का,

किस हलवाई का,

कितनी कर लेता,

पुनरावृत्ति

नित्य जीवन में।

तुझे याद है रे

कितने नाम

जो जुड़े हैं

खाने की वस्तु से

विशेष रूप से।

जाता है कोई

बीकानेर, तो

मुंह से निकलता

किस सहजता से

‘ले आना पापड़’,

रतलाम से

‘नमकीन’

जयपुर से

‘मिश्री मावा’

अन्तहीन है

सूची-क्षुधावर्घक।

कौन याद रखता है

‘जैसा खावे अन्न’

मंगाते समय,

कौन जानता है

व्यवहार रसना का,

जल तत्व का,

मन और चन्द्रमा का,

चन्द्रमा और अन्न का।

जल तत्व ही

कारक है शुक्र का,

बनता है जो

अन्न से ही।

उठता है अन्न

पृथ्वी से

मूलाधार से,

स्वाघिष्ठान तक,

जल तत्व की

प्रतिनिघि होती है

रसना-जिह्वा,

जो ग्रहण करती है,

उगलती है

वैसा ही

वाणी रूप में,

भाव बनकर।

वैसा ही बनता

शरीर

सप्त धातुओं से,

वैसा ही होगा

आभामण्डल,

जिसमें देख लोगे

प्रभाव

विद्या-अविद्या का,

अंहकार बनती है

अविद्या,

पकड़ लेती है

ईष्र्या को,

आवृत्त करके जीव को।

तब याद करके

गीता के ज्ञान-

भक्ति योग को

पकड़कर विद्या मार्ग,

होना चाहते हैं

बाहर क्षुधा से,

अविद्या से

प्रार्थना करके

ईश्वर से।

तू जानता है

रे मनवा,

किस प्रकार से

मिटती है क्षुधा

तन की, मन की?

भोजन या आहार

केवल अन्न-ग्रहण है

अथवा कुछ और भी,

विचार-भावना

क्या भक्ष्य नहीं,

वायु मण्डल से,

श्वास-प्रश्वास से

क्या आहार नहीं?

क्या इनका रूप

सत-रज-तम नहीं?

क्या प्रकाश खाद्य नहीं?

वायु से प्राण

धूप से शक्ति

न मिले तो?

खुराक बढ़ जाती है

व्यक्ति की,

व्यसन छोड़ते ही

खुराक बढ़ जाती,

तब कहां सम्बन्ध

केवल भूख का,

केवल अन्न का

आहार से?

तप करना क्या

नहीं करता कार्य

आहार का,

क्या नहीं करते

हम आहार ग्रहण

पैरों से,

पृथ्वी से

और रह सकते

स्वस्थ बिना इसके?

समझा तू

कैसे तय करना है

आहार

मिटाने को क्षुधा

और करने को

विजय, क्षुधा पर?

तू भी तो

समझता है न रे

भाषा शरीर की,

क्या खाना

क्या नहीं खाना,

कब खाना

क्यों खाना,

तेरा यह ज्ञान,

बुद्धि का उपयोग

चेतनामय रूप

ही बनता है

वातावरण

रस-नियंत्रण का,

आ लौट चलें

मनवा मेरे,

जहां एकाग्रता से,

सात्विक भाव से

तृप्त कर सकें

तन-मन-वचन

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

 

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