Gulabkothari's Blog

नवम्बर 25, 2012

रे मनवा मेरे!

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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वाह रे मनवा,
बहुत चालाक भी है
तू
जान लेता है
दूर बैठकर भी
और कह भी देता है
अपनी बात
दूर से ही,
क्या है तेरी
यह ‘टेलीपेथी’,
कर लेता बातें
ठाकुर जी से
मन्दिर में ही
और मस्जिद में
अल्लाह से,
पहुंचा देता है
पिण्डदान भी
पितरों तक
मौन रहकर भी,
तू भी देता दावत
हर खुशी पर
मित्रों को,
अन्न ही श्रेष्ठ
माध्यम है
प्रेम जताने का।
प्रेम का रस ही
बदलता है
खाए हुए अन्न को
पाचक रस में,
बढ़ता है तब
सौन्दर्य मन का।
कम नहीं पड़ता
भोजन किसी को
प्रकृति ने दिया
बहुत है,
फिर भी अहंकार
आक्रामक है न,
मारता है खाने को
पशु-पक्षी भी,
हर युग में
रहते हैं इन्सान
ऎसे भी।
देखा है सभी ने
पागल गायों का
सरकारी कत्ल,
मांसाहार के कारण,
मानव भी तो
होता ही होगा
प्रभावित मांसाहार से,
वरना शास्त्र
क्यों करते बखान
सात्विक आहार का,
शाकाहार का!
टकराती है ध्वनि
शरीर से,
मोटी त्वचा से
लौट जाती है,
व्यर्थ जाता है
सारा जाप
कैसे हो पाएगा
पार सेतु
प्राणमय कोश का?
कहते हंै कि
भाव के भूखे हैं
भगवान,
और वही बैठे हैं
मन के भीतर,
महत्व है भावों का
भोजन से अधिक,
भाव ही स्वभाव है।
हम सब हैं
अन्न एक-दूजे का,
ऊर्जा रूप, प्राणन्,
संवेदना रूप
ग्रहण करते है,
उपभोग करते हैं
एक-दूसरे का,
एक का भगवान
दूसरे के भगवान का।
कहां पकड़ पाते हैं
मकड़ जाल माया का,
कहां रहते हैं
भाव विभोर
बतियाते किसी से,
समझ इसको,मनवा
आ लौट चलें
फिर वही तू
फिर वही मैं
जान सके भूख,
भोक्ता-भक्ष्य को
जीत सकें क्षुधा
माया प्रवेश को।
स्त्री का प्रवेश
जीवन में
जगाता है इच्छा,
कामना, क्षुधा1,
नहीं तो कैसे
चल सकेगा
सृष्टि व्यापार
कैसे पूर्ण हो
क्षुधा ब्रह्म की
‘एकोहं बहुस्याम्’2,
पुरूष ब्रह्म है
नर में भी
नारी में भी,
और हंै दोनों ही
अर्द्धनारीश्वर भी,
माया रूप कामना
घेरती है जाल में,
माया शरीरों को,
आनन्द के परिवेश में,
आत्मोन्मुखी होकर
विज्ञान-बुद्धि से
झंकृत करती है
प्राणोे को
मन की इच्छा
कर्म करने को
पाने को प्रसाद।
साथ चलती है
माया नित्य
और हो जाती है
रूपान्तरित
महामाया जैसे
खींचती सूक्ष्म में
पुरूष को
स्थूल से बाहर,
यदि संकल्पित है
मन भी
चलने को भीतर।
माया ही
नया रूप लेकर
कर देती विरक्त
दोनों पुरूषों को,
डूबकर देवरति में
करने लगते प्रेम
बिना अपेक्षा भाव
जीने लगते तब
एक-दूजे के लिए।
शान्त होने लगती
क्षुधा,
जाग्रत होता
विद्या भाव,
एक-दूसरे के सहारे
दोनों बन जाते
मोक्ष मार्गी।

रे मनवा मेरे
जानता है तू
तीनों रूप अपने,
चेतन, अवचेतन
और यह भी कि
स्थूल को चलाता है
सूक्ष्म,यानी कि
जीवन चलता है
अवचेतन से।
जब तक
नहीं पहुंच जाती
चेतन की धारणा
ध्यान बनकर
समाधि तक,
संभव नहीं है
रूपान्तरण
कोई इसके लिए,
करना होता है
शिथिल शरीर
कायोत्सर्ग3 में,
ताकि हो सके
शिथिल गतिविधियां
काया की।
ध्यान ही बनता है
समाधि
सुसुप्ति अवस्था
जहां बस याद हो
कि ‘मैं’ हूं।
जिन-जिन से भी
व्यक्ति या पदार्थ
लौटना है तुझे
लक्षित कर उनको
चेतना में पहले,
धारणा कर उनकी,
और पहुंचाना है
उन सभी को
शरीर के पार,
जहां हो सके मन
तेरा भी एकाग्र
ध्यान बनकर।
विचारों का ठहराव
विकल्पों का मिटना
ही होता है ध्यान,
वहीं प्रतिष्ठित होते
बदलाव के भाव।
आ लौट चलें
उसी अवचेतन पर
गिनते चलें खूटियां
जिनको हटाना है,
इसके लिए पहले
पटु बनना पड़ेगा
तुझको, मनवा,
झांककर देख
अपनी शक्तियों को
कितना देख पाएगा
कितना ग्रहण होगा,
देख पात्रता अपनी
क्षमता स्वयं की
वहीं से होती है
शुरू यात्रा तुम्हारे
संकल्पित होने की।
अहंकार क्या है
क्यों बढ़ता है
जानता है तू
मेरे मितवा?
एक ही कारण
क्षुधा पूर्ति,
धन की, यश की,
भोग की, ज्ञान की,
शरीर की, पद की
न जाने कितने
रूप में पकड़ती है
माया,
बन्धन ही बन्धन
बाहर से फेंकती
चकाचौंध भरे जाल,
भीतर से उठते
अविद्या के भाव,
कभी तू पकड़ता
बाहर भेजकर
इन्द्रियों को,
कभी विषय आते
स्वयं तेरे पास।
एक काम कर,
जागता रह, बस,
देखता रह
हर विषय को
बन्धन वाचक,
सतर्कता बरतो,
कुछ विषय तेज
घुस जाते भीतर
बिना प्र्रयास के
जैसे श्रवण
चाहो, न चाहो,
कान सही है
आवाज हो रही है
सुनना ही पड़ेगा।
जानता है तू
रे श्रावक,
सुनना पड़ता है
हर जीव को
जाग्रत स्वप्न
सुसुप्ति में भी,
रोक नहीं सकते
ध्वनि तरंगों को
किसी प्रयास से,
तभी तो सुन सका
अभिमन्यु भी
तोड़ना चक्रव्यूह
गर्भ में ही,
आज भी
प्रत्येक जीव
आता है सीखकर
बहुत कुछ
गर्भ में ही।
यदि कोई मां
चाहे यदि बनाना
वैज्ञानिक,नेता,
संत या भक्त
अपने बच्चों को
तो पढ़ा सकती है
उनको गर्भ में
जीवन के अध्याय,
बन सकती है
गुरू
अनपढ़ मां भी
अपनी संतान की।
कोई नहीं है
बीच में बाधा
मां-संतान के,
नाभि से नाभि
एकाकार,बस
पूरी उम्र यह नाभि,
सुनती है तरंगें
जिन्हें नहीं पकड़ पाते
कान,
वे सारे सूक्ष्म,
सूक्ष्मतम स्पन्दन
बनते उपादान कारण
जीवन संचालन के
और भनक भी
लग नहीं पाती
हमको उनकी,
बदलते रहते हैं
हर क्षण इनको
प्रकृति के जरिए।
जानता है न
शब्द ब्रह्म को,
विश्व का श्रेष्ठतम
हथियार,
इसके रूप हजार
जो मार देता है
स्वयं व्यक्ति को
अज्ञानवश।
बहुत बांधता है
श्रवण भी
मन केन्द्र को,
बहुत लोग खा चुके
मार इसकी
मधुरता से भी
और कर्कशता की भी।
मधुरता बांधती है
अनेक रूपों में
अनेक रिश्तों की,
हर उम्र में,
ढूंढना पड़ता है
मधुरता को आज,
और सोचना भी
क्यों है कोई भी मधुर
तुमसे!
माया का छलावा
ही परीक्षा है
ईश्वर की,
वही करती है
फेल-पास
सारे दिन
किसी न किसी
स्वरूप में।
जागते रहना
मनवा मेरे,
पे्रम भी करना
पूरी सृष्टि को
और बंधना नहीं
किसी मिठास से
रागी बनकर।
कर्कशता तो
पैदा कर देती है
विरक्ति मन में,
और दूर होने में
लगा रहता है मन
छूट नहीं पाता,
समझा देता है
अर्थ कर्कशता के,
ताकि कभी न हो
कर्कश तुम्हारी वाणी।
शब्द है स्वयं
एक शरीर माया का,
इसके भीतर भी
होते हंै प्राण,
मन और आत्मा
हमारी तरह ही,
ब्रह्म है न,
मिलते ही संयोग
उचित सा,
आच्छादित मन
सोचने लगता है
‘एकोहं बहुस्याम्’,
और दोनों ही यदि
सोचते एक जैसे,
तब हो सकती
नई सृष्टि,
इसी को रखने
नियंत्रण में
बनाए गए हैं
नियम-कायदे
समाज विशेष में।

गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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