Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 2, 2012

कर्ता भाव

शायद हमारे कार्यो पर दूसरे लोग गर्व करते हैं। हम स्वयं जो करते हैं, वह अभिमान कहलाता है। गर्व सकारात्मक अभिव्यक्ति है प्रशंसा की और अभिमान नकारात्मक। अभिमान में अहंकार की छाया रहती है। ‘मैं’ इस अभिमान का आधार है। कारण तो कोई भी विशेषता हो सकती है। अभिमान में महत्वाकांक्षा भी रहती है, कुछ  प्रशंसा पाने की, यश पाने की भी इच्छा रहती है।

यही अभिमान समय के साथ अहंकार बन जाता है। वैसे तो अहंकार का मूल तो अज्ञान या अविद्या है, जो जन्म से साथ रहती है। इसी विद्या-अविद्या के योग या सम्मिश्रण से जीवन चलता है। जीवन में कर्म-भाव-विषयों आदि के हजारों धरातल  हैं। अभिमान को किसी भी धरातल के साथ जोड़ा जा सकता है। अहंकार की शुरूआती अभिव्यक्ति भी कही जा सकती है।

अभिमान में ही व्यक्ति स्वयं के बारे में ‘अपने मुंह मियां मिटू’ बनता है। अपनी प्रशंसा करते थकता नहीं है। किसी को शरीर का, ज्ञान का, धन या पद का अभिमान हो सकता है। अपनी किसी कला पर अभिमान हो सकता है। मुझे मेरे घर पर, कमरे पर, साज-सजावट पर, गहनों पर, मित्रों पर, किसी भी बात पर हो सकता है अभिमान। यही उसके विकास की बाधा भी बन जाता है। इसका कारण है कि अभिमान कत्ताü भाव के साथ जुड़ा होता है। कत्ताü भाव ही अभिमान होता है।

जीवन के सुख का मूल रहस्य यही कत्ताü भाव का आवरण है। कृष्ण तो स्वयं को भी कत्ताü नहीं मानते। सम्पूर्ण चराचर को अव्यय रूप में धारण करने वाले भी कर्ता  योगमाया को मानते हैं। जब कर्म योग का सूत्र बताते हैं- ‘कर्मण्यवाघिकारस्ते’ तब भी उनका यह आशय स्पष्ट हो रहा है कि फल पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं है।

कब मिलेगा, यह ईश्वर ही तय करेगा। तब किसी भी उपलब्घि के लिए अभिमान करने का आशय क्या है? यह सही है उपलब्घि का कारण हमारे कर्म ही बनते हैं, किन्तु यह आवश्यक नहीं कि सभी कर्म, जो इस उपलब्घि से जुड़े हैं, वे वर्तमान जीवन के ही हों। माता-पिता का प्राप्त होना, परिवार, व्यापार, स्थान, सन्तान आदि हजारों कारण हैं जो उपलब्घि में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में भूमिका निभाते हैं और वर्तमान जीवन से पूर्व का प्रभाव दिखाते हैं। तब सारी उपलब्घियों का श्रेय स्वयं लेना कहां तक उचित है!

दूसरा पक्ष यह भी है कि हमारी ज्ञानेन्द्रियां भी केवल स्थूल को ही पकड़ पाती हैं। हमारा आत्मा, हमारा मन, हमारी प्रज्ञा सूक्ष्म क्षेत्र है। इसके ज्ञान के बिना, समझ के बिना व्यक्ति अध्यात्म में आगे नहीं बढ़ सकता। जीवन के रहस्यों को नहीं समझ सकता। स्वयं के स्वरूप को भी नहीं समझ सकता। तब उपलब्घियों पर गाल फुलाना कहां तक उचित है! जब हमारे पुरूषार्थ का लक्ष्य ही मोक्ष है, तब ईश्वरीय शक्तियों का अस्तित्व और भूमिका पर भी चिंतन तो करना पड़ता है।

जो सूक्ष्म मेरी बुद्धि की पकड़ से बाहर है, उसके लिए प्रज्ञा का मार्ग पकड़ना ही पड़ेगा। सुप्त चेतना को जाग्रत करना ही पड़ेगा। भीतर सूक्ष्म में यात्रा करनी ही पड़ेगी। ईश्वर भले ही हमारे भीतर बैठा हो, हमारे आस-पास चल रहा हो, वह आस्था से ही समझ में आएगा। जीवन में कई बार अचानक हमारे भीतर कुछ ऊर्जा-स्फोट होते हैं, हम कुछ विशेष कर बैठते हैं। हर एक के साथ ऎसा होता है। इसी को वह स्वयं की उपलब्घि मानकर अभिमान कर बैठता है।

कहते हैं कि ईश्वर हमारे लिए कार्य नहीं करता, हमारे साथ कार्य करता है। ‘हिम्मत-ए-मर्दा, मदद-ए-खुदा’। वह अकेले ही सब के साथ कार्य करता है। उसको हमारी सहायता की जरूरत नहीं पड़ती। न हम उसके कार्य में हाथ बंटा पाते हैं। हां आस्था हो तो भावना और श्रद्धा के पुष्प चढ़ा सकते  हैं। यह निश्चित है कि हम अपने-आप पार नहीं उतर सकते। हमारे सिर पर कर्मो का एवं ऋणानुबंधों का इतना बोझ लदा है, जिसको ढोते-ढोते यहां तक  पहंुचे हैं। इस बोझ के मूल में भी हमारा कत्ताü भाव ही रहा है।

द्रोपदी के चीर हरण का उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर आता है। जब हमारे सारे प्रयास विफल हो जाते हैं। थककर चूर हो जाते हैं। हार मान लेते हैं। हमारा सारा अभिमान गल जाता है। उस समय यदि हम विश्वास के साथ ईश्वर के आगे समर्पण कर देते हैं, उसको पुकारते हैं, तब वह आता है। क्योंकि तब व्यक्ति अपने कर्ता भाव को समर्पित कर देता है। तब उसको अपनी शक्तियां भी निरर्थक लगती हैं। साधन-सुविधाएं अपना अर्थ खोते जान पड़तेे हैं। चिन्तन का एक नया धरातल उभरने लगता है। अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त होता है। व्यक्ति शब्दों से मौन में उतरने लगता है।

अध्यात्म में भाषा नहीं रह जाती। वहां एक प्रकार की सहजता आ जाती है, जीवन में। अभिमान इस सहजता का शत्रु है। जीवन की नैसर्गिकता का हनन करता है। अभिमान का भी एक तनाव होता है जो समय के साथ बढ़ता ही जाता है। इसकी निर्विरोध निरन्तरता ही दृढ़ता धारण करके अहंकार का रूप ले लेती है। अभिमान को दूर करना सहज है, अहंकार असुर रूप है। दिव्य शक्ति ही इस पर विजय प्राप्त कर सकती है। अहंकार में व्यक्ति स्वयं को ही श्रेष्ठ मानता है।

अत: कोई समझौता नहीं करता। यही कर्ता भाव का शिखर स्वरूप है। सभी परिणामों का आधार स्वयं को ही मानता है, किन्तु स्थूल भाव में ही होता है। कहता भी होगा कि सब कुछ ईश्वर करता है। झूठ कहता है। प्रयास भी करता होगा, किन्तु प्रयास तो कर्म ही है। प्रयास का अर्थ है कि मैं हंू और कर रहा हूं।

आज शिक्षित वर्ग सर्वाघिक दु:खी जान पड़ता है। अभिमान ही उनके जीवन का नेतृत्व करता है। कत्ताü भाव से जकड़े हुए है। जो इनकी बुद्धि में नहीं आता, उसका अस्तित्व स्वीकार्य नहीं है। मन की भाषा, संवेदनाओं से इनका पाला ही नहीं पड़ता। अत: श्रद्धा, भक्ति, करूणा, समर्पण जैसे मानवीय गुणों से ये रूखे ही दिखाई पड़ते हैं। अत: यह लोग यदि अभिव्यक्ति के क्षेत्र में भी जुड़े तो कला में पारंगत नहीं हो पाते। अभिमान के जरिए खड़े रहते हैं। अभिमान हमें कभी संतुष्ट नहीं होने देता। अन्य प्राणियों को यह कष्ट नहीं होता। अपनी चिन्ता में शिक्षित वर्ग इतना खोया रहता है कि दूसरों की चिन्ता करने का ध्यान ही नहीं रहता।

दूसरों की बातों का अर्थ भी तोड़-मरोड़ कर देखता है। अभिमान चूंकि बुद्धि की ऎंठन ही है, अत: विष्ायों को भी सीधे नहीं देखता। यथार्थ तक पहुंच भी नहीं पाता। व्यक्ति जो कुछ कह सकता है, सोच सकता है, कर पाता है, वह समय की परिघि में ही होता है। कालातीत होने के लिए सूक्ष्म में पहंुचना पड़ेगा। समर्पण एक ऎसा माध्यम है कि व्यक्ति को तुरन्त कालातीत कर देता है। इधर हार मानी, समर्पण किया कि उधर ‘अहं ब्रह्मास्मि’। बुद्धि यह करने नहीं देती।

शिक्षा ने जीवन को पूर्णत: एकांगी कर दिया। व्यक्ति नौकरी के अलावा कुछ भी सोच नहीं  पाता। सारा जीवन, सारी शिक्षा, मां-बाप का सारा धन नौकरी प्राप्त करने में, पेट भरने का मार्ग चुनने में लगाता है। पेट भरना सीखने को 15-20 साल लगाने पड़े, तो अघिकांश सृष्टि तो भूखी रहकर ही मर जाएगी। क्योंकि इतनी तो उसकी उम्र ही नहीं होती। नौकरी पाने के बाद जिस प्रकार का जीवन व्यक्ति जीता है, जिस प्रकार जीने के लिए संघर्ष और मूल्यों से समझौते करता है, शायद उसी को सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी मानकर अभिमान करता है। अपनी बुद्धि और इन्द्रिय क्षमता के अनुसार अपने विश्व को समझता है। चेतना सुप्त प्राय: रहती है।

अवचेतन मन जीवन को चलाता है। जो कुछ यहां स्मृति में संग्रहीत है, वही कार्यरत होता है। चेतना का जागरण बिना दृढ़ संकल्प के नहीं हो पाता। शिक्षा और तकनीकी विकास ने व्यक्ति के सामने इतने सारे विकल्प और चकाचौंध खड़ी कर दी है कि वह विकल्पों में खो गया। लक्ष्य से भटक गया। पेट भरने के अलावा जीवन में अन्य लक्ष्य ही नहीं रह गया। कर्ता बनकर अपने ही जाल में फंस गया।

अभिमान का जाना ही विनम्रता का आना है। सुख-दु:ख की समझ भी तभी आती है। प्रायश्चित से मन की चिति या पुनर्निर्माण होने लगता है। तभी व्यक्ति ईश्वर के प्रति विश्वस्त भी होता है। उससे क्षमा भी मांगता है। यही चेतना का जागरण है। यही कत्ताü भाव का समर्पण है।

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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