Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 9, 2012

रे मनवा मेरे! 8

सुना है संगीत

 

कभी जीवन में

और भूल सका

स्वयं को

कुछ काल तक

सुनकर कोई संगीत?

गाई है कभी

या सुनी होगी

कोई आरती

किसी मन्दिर में,

शास्त्रीय संगीत

या सिनेमा के गीत,

लगता कुछ भेद

इनके प्रभाव में

तेरे ऊपर,

बता रे मनवा?

जानता तू

शब्द का प्रभाव

पहले होता है

बोलने वाले पर,

उसका शरीर,

मन, प्राण, वाक् ,

गुजरते हैं पहले

इस प्रभाव से

तब निकलता

है शब्द बाहर

हमारे मुंह से,

और फिर कभी

लौटते नहीं

पास हमारे।

किन्तु हां,

कर जाते

अपना काम

माया के निर्देश में,

मोह रूप में

अहंकार में, या

व्यापार में।

जानते हो न

निर्जीव होता है

शरीर,

डालने पड़ते हैं

फूंकने पड़ते हैं

प्राण इसमें

हिलाने को इसे,

यंत्रवत्,

मानव बनता है

हर शरीर,

भावनाओं से,

देव भाव हो

या असुर भाव,

यही हाल है

शब्द शरीर का भी

भाव बिना शून्य

सारे शब्द

दिशा विहीन

प्रभाव विहीन

निरर्थक प्राय:।

भाव पूर्ण रूप

और मनोयोग

बना देते हैं

मंत्र

शब्दों को,

करने को निर्माण

बदलने को जीवन

स्वयं का भी

दूसरों का भी,

तू ही केन्द्र है

भावना का भी

कामना का भी,

तू ही होता है

प्रभावित भी,

तू ही करता है

पैदा प्रभाव भी

रे मन मेरे!

कान दो हैं मेरे

विपरीत दिशा में

किन्तु देख कैसा

सामंजस्य इनमें,

नहीं सुनते कभी

अलग-अलग,

मात्रा हो सकती

अलग-अलग सुनने की,

और यदि हो जाए

बन्द कार्य इनका?

क्या प्रभाव बोल,

जीवन में?

तब कानों का

विकल्प होती

अन्य इन्द्रियां

नेत्र-त्वचा आदि

नहीं जान पाते

स्पन्दन ध्वनि के

बाह्य जगत के।

क्या इस स्थिति

का कर सकते

उपयोग

सार्थकता पूर्ण

बता श्रोता मन!

न सुनने का

एक अर्थ है

बन्द हो गया है

आयात शब्दों का,

निर्यात चालू है।

जल्दी समाप्त हो जाएगा

भीतर का गोदाम,

तब एक मार्ग है

मौन,

शक्ति संचय का,

चिन्तन विकास का।

साथ नहीं संभव

शब्द और चिन्तन

मौन रोकता है

अनेक हलचल

मन के धरातल की।

व्यक्ति मुक्त रहता है

प्रतिक्रियाओं से,

न बांस, न बांसुरी,

न कोई विवाद

न किसी से झगड़ा,

बोलते-बोलते व्यक्ति

फूलने लगता है

भारी हो जाता है

अहंकार बोलता है,

मौन में सब शान्त!

जीवन है सम्प्रेषण

आदान-प्रदान शब्दों का,

श्रवण और रसना

श्रवण ध्वनि का,

शब्दों का

स्पन्दनों का,

बोलना दिखावा

बोलना बुद्धि से

बोलना मन से

आत्मीयता से!

शरीर की ध्वनि

शरीर तक,

बुद्धि की बात

तर्क-वितर्क तक,

मन की बात

मन तक।

कैसे करती है

बातें माता

नन्हे शिशु से,

बिना शब्दों के

कैसे सुनती है

शिशु की बातें,

पालतू जीवों की

पशु-पक्षियों की

बातें,

बिना श्रवण के

कैसे बनते श्रावक!

यह सुनना ही

होता है ध्यान,

शब्दों को सुनना

करता नहीं एकाग्र

सुनने वाले को,

एकाग्रता ध्यान है,

धारणा से आगे,

भावनाओं पर

स्पन्दनों तक जाना

समाघि का रूप,

बिना शरीर,

बिना मन-बुद्धि

सुनना ही

शुद्ध श्रवण है।

श्रवण, अर्थात

बोलने की प्रक्रिया

का ठहर जाना,

चिन्तन रूक जाए,

दूरी सिमट जाए,

अन्तराल घटता जाए

शब्दों के मध्य का,

तब प्रभाव होता

हर शब्द का

मंत्रों की तरह।

तब आप भी

कर सकते हैं

पैदा सुनने वाले,

जैसे कि

पैदा करता है

नवजात शिशु

मां को

श्रावक रूप में।

क्षुधा,

अभावग्रस्त भाव

कर देती निर्बल

मनुष्य को,

भूखा आदमी

हो जाता निढाल

भूलकर पराक्रम,

समर्थ स्वरूप

और दौड़ता है

पूरी करने को

कामना-क्षुधा

अपने मन की।

जुटाता है अन्न

इन्द्रियों के

हो जाने को

आप्त काम1।

आ जाती है

चेहरे पर चमक

शान्त होते ही क्षुधा,

यह चमक भी

निकली है माया से

छाया रूप में,

सामथ्र्य रूप में,

करता है व्यवहार

जगत में ज्ञान और

वाणी से, छाया से,

ढंके रखकर

स्वयं के यथार्थ को।

क्या छाया नहीं

जीवन के सम्बन्ध

घर-परिवार के?

माया ही बता रही

रिश्तों को

मर्यादाओं को,

तब कैसे जीए

छाया से बाहर कोई,

छाया प्रतिबिम्ब है

प्रकाश नहीं है,

बिम्ब केन्द्र में

केन्द्र आवरणों में

छाया त्रिगुण युक्त।

यदि मान ले

प्रत्येक व्यक्ति को

एक मानव आकृति, बस

तब क्या चल पाएगा

जीवन जगत का,

बिना किसी संज्ञा के?

यह पशु रूपता है,

जंगल विहार है

भोग योनियों का,

अविद्या जगत है,

केवल काम का,

न धर्म, न मोक्ष,

अर्थ शून्य जीवन,

आक्रामक होकर

हिंसक बनकर

खाते रहो

निरीह प्राणियों को,

कहां सम्बन्ध

कहां प्रेम,

कहां संवेदना,

तेरे मन में!

पहिचान नहीं

कोई जीवन की,

सम्मान नहीं कोई,

तब नाम दिया

हर रूप को,

हर देह को

समाज ने,

बढ़ गया क्षेत्र

लोकाचार का।

स्पष्ट हो गए

रूप सभी

स्वजन-परिजन के,

तब एक ही व्यक्ति

करने लगा व्यवहार

भिन्न-भिन्न लोगों से

लगाकर मुखौटा

सम्बन्धों का,

छिप गया इसमें

मूल स्वरूप उसका,

कोई नहीं जान पाया

असली चेहरा

भीतर मुखौटों के,

आखरी दम तक,

घिरा रहा माया से,

छूट न सका

मोह-पाश से,

उतार नहीं पाया

मुखौटे चेहरे से,

जीता रहा नाम ले

जाति-धर्म का

उधार के चेहरे से।

यही माया

यही छाया, मुखौटा

झूट है जीवन का

सबसे बड़ा,

डरता है आदमी

प्रकट कर सत्य,

मृत्यु की तरह।

इसलिए व्यक्ति स्वयं

भूल जाता है

चेहरा अपना

सौ साल में

भुलाते-भुलाते

दबाते-दबाते

अनेक मुखौटों से,

जीता रहा जैसे

मेरे बिना मैं!

होशियारी मानता है

तू इसी को अपनी,

इस कला को

दंभी की तरह,

बदलता रहता है

जीवन शैली

समय के साथ

जुड़ा दिखने को

जगत व्यवहार से,

भागता है

बनाने पहचान

नकली, जीवन में,

कमाने को यश

नकली चेहरे से

जीवन में।

 

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

2 टिप्पणियाँ »

  1. i like your articles,……

    टिप्पणी द्वारा poonam keswani — जुलाई 3, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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