Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 16, 2012

मन्दिर

बोलचाल की भाषा में छोटी मात्राओं का उच्चारण नहीं किया जाता। मन्दिर शब्द का उच्चारण मन्दर=मन+अन्दर हो जाता है। इसके दोनों अर्थ किए जा सकते हैं- मन जिसके अन्दर तथा मन के अन्दर। मन को मन्दिर भी कहा गया है। इसमें भी कोई रहता है। मन में कामना रहती है,चाहे जड़ की हो या चेतन की। मन में संस्कार रहते हैं,जो मूलत: जन्मकाल से पूर्व के होते हैं। चाहे पिछले जन्मों के,या गर्भकाल के। ये संस्कार ही कामना एवं कर्म की दिशा तय करते हैं।

 

 

वैसा ही हमारा भविष्य बनता जाता है। तब कामना ही भविष्य विधाता बन जाती है। क्योंकि कामना भी ईश्वर ही पैदा करता है। हम तो पैदा नहीं कर सकते। कामना ही व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करती है। इसीलिए मन को दर्पण कहा जाता है। जीवन में प्रतिक्षण कोई न कोई संयोग बनता रहता है। कोई मिलता है,बिछुड़ता है।

 

बुरा या अच्छा लगता है। लोभ या ईष्र्या पैदा होती है। राग-द्वेष का अनुभव होता है। ये सारे भाव ही तो मन के स्वरूप को प्रतिबिम्बित करते हैं। ये प्रतिबिम्ब,सही अर्थो में,मेरी परीक्षा का प्रश्न-पत्र है। इनके माध्यम से ही हम अपने बदलाव का आकलन कर पाते हैं। मेरी साधना का प्रभाव जीवन में कितना हो पाया,मुझे पता चल जाता है।

 

क्रोध-लोभ-वासना-ईष्र्या आदि भावों की क्रिया और प्रतिक्रिया मन में हो जाती है। मानो ईश्वर प्रतिदिन हमारी परीक्षा ले रहा हो। हां,परीक्षक के रूप में वह हमारे मन मन्दिर में बैठा है। साक्षी बना हुआ है-आत्मभाव में। उसकी उपस्थिति में ही जीव अपने कर्म करता है। इसीलिए कहते हैं कि हम जमाने से छिपकर रह सकते हैं,स्वयं से छिपकर नहीं रह सकते।

 

कामना का स्वत: पैदा होना इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि हम अपनी मर्जी से पूर्णत: नहीं जी सकते। कामना पूर्ति या उसको नकार देने का निर्णय हमारा हो सकता है। इस निर्णय के पीछे भी वही ईश्वरीय शक्ति है,जो पिछले कर्मो के फलों के अनुरूप ही निर्णय कराएगी। प्रकृति के सत-रज-तम और ऋणानुबन्ध कामना पूर्ति के निर्णय को प्रभावित करते हैं। इस कारण कर्मो का फल हमारे हाथ में नहीं रहता।

 

सही अर्थो में तो कर्म का कत्ताü भी व्यक्ति नहीं होता। जब कामना तथा कामना पूर्ति का निर्णय दोनों ही व्यक्ति के हाथ में नहीं हैं,तब उसका कत्ताü भाव तो पीछे छूट चुका होता है। फल उसके हाथ में होता ही नहीं है। कामना का केन्द्र मन है। मन चाहे तो कामना प्राण के साथ जुड़कर वाक् (सृष्टि) का निर्माण करता है।

 

चाहे तो विज्ञानमय चेतना का सहारा लेकर शान्त्यानन्द में लीन हो जाता है। किसी व्यक्ति को देखते ही मन में क्रोध का भाव जाग्रत हुआ,तब इसका कारण उसका कोई कर्म तो नहीं है। उसने कुछ किया ही नहीं है। बस,उसे देखते ही क्रोध आ गया। प्रारब्ध का यही रूप है। आप भी बिना विचारे क्रोध में फुफकारने लगते हो। सामने वाला भले कोई भी स्वजन-परिजन हो,प्रतिक्रिया जताता है। यहां जो व्यवहार है,वह शुद्ध प्रकृति दत्त है। प्रत्येक प्राणी में एक जैसा होता है। मानव में ही यह क्षमता है कि वह चाहे तो विवेक पूर्वक इस परिस्थिति को टाल सकता है। विवेक ही प्रारब्ध को भाग्य में बदलने मे सक्षम है।

 

विवेकवान व्यक्ति अपने स्वरूप एवं क्षमताओं को समझता है। उसकी आंख सामने वाले व्यक्ति पर नहीं होती। अपने मन के दर्पण पर होती है। मन कहेगा कि ‘प्रारब्धजन्य इस परिस्थिति को मौन रहकर टाल जाओ। अभी तक तुमने भी कुछ ऎसा नहीं किया कि उसका क्रोध जाग्रत हो। वह भी तो प्रारब्ध के कारण ही आपके सामने आया है।

 

ईश्वर ने ही उसके मन में इच्छा पैदा की है कि वह यहां आए। त्रिगुणी बुद्धि के निर्णय से ही वह चलकर यहां पहुंचा है। उसने भी अभी तक अपने विवेक का उपयोग नहीं किया है। वह भी पशुभाव में ही है। यदि तुमने अपना हिंसक रूप दिखाया तो वह भी टूट पड़ेगा। दोनों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ जाएगी। जो थोड़ी भी श्रद्धा या विश्वास है,वह भी न्यूनतम हो जाएगा। नए कर्मबन्ध भी पैदा होंगे। मौन ही रहो।’ क्रोध अध्यात्म यात्रा का बड़ा शत्रु है।

 

प्रेम पथ के यात्री को क्रोध विक्षिप्त कर डालता है। क्योंकि प्रेम अहंकार शून्य स्थिति में संभव है। क्रोध अहंकार का पर्याय है। प्रेम ह्वदय मे रहता है,अहंकार बुद्धि में। स्वभाव से दोनों ही विरोधाभासी हैं। प्रेम में व्यक्ति स्वयं को कभी नहीं देखता। प्रेमी के आगे स्वयं लीन हो जाता है। जैसे मन्दिर में ईश्वर के आगे समर्पित होकर चित्त में उसको स्थिर कर लेता है। यही तो प्रेम की परिभाषा है। वहां कभी दो नहीं रहते।

 

जब पता तेरा लगा,तो अब पता मेरा नहीं। स्वयं का यह गौण हो जाना ही कत्ताü भाव का लीन/गौण हो जाना है। यही अग्नि पुरूष में सोम की आहुति है। यही स्त्रैण है। प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम को रस या ब्रह्म कहा है। रसो वै स:। वही ब्रह्म या ईश्वर होने से मन भी मन्दिर कहलाता है। जब किसी को देखकर मन में क्रोध जागे या वासना का उदय हो,तब पहली प्रतिक्रिया हो कि इसको ईश्वर ने मेरी परीक्षा लेने भेजा है। मुझे पास होना है। मेरे भीतर भी ईश्वर बैठा है। क्या वह फेल हो सकता है! यही विवेक समय के साथ व्यक्ति को इन्द्र्रिय निग्रह में पारंगत करता है। भावनाओं को सात्विक बनाता है।

 

मन के दर्पण में व्यक्ति अपने प्राप्तांक देखता जाता है और आगे बढ़ता जाता है। वह स्वयं झूठ नहीं बोल सकता। यही उसकी मजबूरी है। न ही वह कत्ताü भाव से छुटकारा पा सकता है। धर्म एवं समाज के नियमों में बंधा हुआ स्वयं अपनी अहंकृति एवं प्रकृति से भी संघर्ष करता रहता है। यही संघर्ष ही द्वन्द्व को बनाए भी रखता है।

 

द्वैत भाव में उलझा रहता है। वह अपने कत्ताü भाव को दृढ़ से दृढ़तर बनाता जाता है। कत्ताü भाव का छूटना ही व्यक्ति को भीतर झांकने को प्रेरित करता है। यहीं से मन-मन्दिर की ओर यात्रा शुरू होती है। कुछ तो स्वयं को ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ मानकर भीतर उतरते हैं। कुछ ‘अहं ब्रह्मास्मि’ मानकर। आत्मा का आधा भाग ईश्वर है,आधा जीव।

 

कत्ताü भाव के यथार्थ को जान पाना ही मूल भाव है। तभी आस्था के साथ अन्य शक्ति को स्वीकार किया जा सकता है,जो स्वयं से अघिक शक्तिमान हो। समय के साथ उसी श्रद्धा के कारण आत्म साक्षात्कार होता है। कत्ताü स्पष्ट होता है। कत्ताü की प्रतिष्ठा के कारण मन मन्दिर हो जाता है। व्यक्ति को अपनी जीव रूप यात्रा का आभास होने लग जाता है। कौनसा शरीर छोड़ा होगा,कैसे माता के गर्भ से गुजरता हुआ इस देह में जी रहा है। पहले कितनी माताओं की देहों में से गुजर चुका होगा।

 

इस भाव के साथ ही देह के प्रति मोह छूटता जाता है। वह यात्रा का एक पड़ाव जान पड़ती है। तब सारे सम्बन्ध भी एकाएक ठहर जाते हैं। वे भी सहयात्री हैं और अपने-अपने पड़ाव पर खड़े हैं। उनमें भी कोई कत्ताü नहीं है। जो कुछ भी वे मेरे साथ कर रहे हैं,वह उनके शरीर का प्रतिनिघि नहीं है। जीव के कर्मो के कारण ही सब चल रहा है। उसका कत्ताü भाव ही उसका अहंकार है। उसका अज्ञान है। मुझे उसके किसी कर्म के प्रति प्रतिक्रिया नहीं दिखानी चाहिए।

 

जो ईश्वर मेरे मन-मन्दिर में बैठा है,वही तो उनके मनों में बैठा है। वह भी यात्री है। व्यक्ति का यह भाव मन के साथ-साथ सात करोड़ कोशिकाओं में भी व्याप्त हो जाता है। उन सबके भी मन हैं। उन सभी के आभा मंडल प्रकाशित होने लगते हैं। यही चेतना का जागरण है। तब उस मन्दिर में घण्टियां बजने लगती हैं। इस प्रेम रस से विष्णु प्राण ह्वदय स्थित ब्रह्मा प्राण का पोषण करने लगता है। इन्द्र प्राण कूटस्थ भाव को तैंतीसवें स्तोम अर्थात परमेष्ठी लोक तक ले जाता है। जहां से सृष्टि आरम्भ होती है। वही सृष्टि का मन भी है,और वही सृष्टि का मन्दिर भी है।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: