Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 23, 2012

रे मनवा मेरे! 9

रे मनवा मेरे

 

तू है प्रतिबिम्ब

मेरे आत्मा का,

कौन मेरा और

तुझ से प्रिय,

बंधा है मेरा

सारा जीवन

संग तेरे

धर्म-अर्थ-काम में,

हां, छूट जाएगा

पीछे, तू

मोक्ष काल में।

जब तक है तू

साथ मेरे

वही है स्वरूप

मेरा अपना,

तू ही है बाधा

मेरे मोक्ष की,

जानता है न?

तेरी चंचलता

जग जाहिर है,

थक चुके लाखों

ऋषि-मुनि भी,

नहीं कर पाए

बस में तुझको।

मुझे भी करना है

संघर्ष तुझसे,

देने को मुझे

मोक्ष मार्ग,

कैसा संग्राम यह

अपने ही मित्र से!

कैसा कम्प्यूटर तू

चलता अहर्निश है,

चाहे खुली हो आंखें

या बंद ये द्वार हों।

कितना देख चुका रे

सारी योनियों में

और बन न सका

दृष्टा,

बता फिर क्या देखा?

जो देखा सपने सा

पर्दे वाली आंखों से,

पर्दे वाले नजारे भी,

प्रकृति देखी

दूर-दूूर तक फैली,

प्रकृति देखी

देह में सिमटी भी।

फूल देखे

भागा तोड़ने को,

फल देखे

भागा बटोरने को,

देह के पीछे

भागा छीनने को

विरासत बच्चों की,

अभिमानी था

‘एकोहं बहुस्याम’1 का!

चंचल होना,

मचलते रहना,

उतावलापन तेरा,

डालते रहते हैं

मुसीबत में

सदा ही मुझको।

तू मन मेरा है

मुझे पता नहीं

कब क्या कर बैठेगा

तू

करना कठिन है

विश्वास,

कब चल पडे

किसी ओर

पकड़ने जल्दी में

और बंध जाए

उम्र भर के लिए।

कितना बंधेगा रे

और कहां-कहां,

क्या तेरे शरीर पर

जगह बची है

नई खूंटी लगाने को

किसी नए बन्धन की?

कैसे सुख मिलेगा

इन्सान को

जिसकी देह पर हो

इतनी खूंटियां

जन्म-जन्मान्तर से

और खींचती हो

हर खूंटी अपनी ओर,

ऊपर से इन्द्रियां

लाती हो जहां

नित नई खंूटियां,

आ, लौट चले

मन मेरे

खंूटियों के पार

हल्का हो भार।

रे मनवा

सोचा कभी तूने

कितना शक्तिमान है

रे तू?

कितना निर्लेप2 है

तेरा स्वभाव

चिपकता भी है

और जब छोड़ता है

विष्ाय को तब

बेलाग होकर।

कुछ काल दिखता है

चिपका हुआ, और

छोड़ते ही तू

जुड़ जाता है

किसी अन्य विषय से

खाली नहीं रहता कभी।

लाल होता है

देख लाल रंग

और आते ही श्वेत के

हो जाता श्वेत

छोड़कर लाल रंग।

पानी चिपकता नहीं

वायु की तरह

आकाश से,

असंग3 है आकाश

तू भी असंग है

मेरे मनवा।

इतना चंचल

मानते हैं सभी

तेरे स्वभाव को,

जानते नहीं

स्वरूप तेरा,

कितना निष्क्रिय है

आकाश की तरह,

भरा है घटनाओं से

किन्तु निष्क्रिय स्वयं,

तेरी तरह,

लगता है बहुत हैं

क्रियाएं तेरे घर में

किन्तु सही है रे,

तेरी नहीं हैं ये,

प्राणों की हैं,

जो रहता है

सदा साथ तेरे।

तू तो पूर्ण है

पर्वत में भी

और राई में भी,

फिर भी न तू

छोटा है, न बड़ा,

न तेरे आगे-पीछे कुछ,

न दिशा-देश-काल,

कहते हैं शास्त्र

तुझे अनवच्छिन्न।4

नहीं कोई रूप

तेरा अपना,

दिखता रहता हो

भले छोटा-बड़ा।

जिस रंग-रूप या

परिमाण (वस्तु का)

जुड़ा तो हो गया

उसी जैसा।

अनवच्छिन्न!

देख, सुन रे मन,

कब कहा मैंने

कौन हूं मैं,

तू ही कहता है

अभिमानी बनकर,

मैं ‘अमुक’ हूं।

प्राण तेरा अघिष्ठाता

वाक्  अघिष्ठान्।

वाक् टिकती है

सहारे प्राण के

और प्राण का ब्रह्म

मन होता है।

मन ही ब्रह्म है,

प्राण क्षत्र है,

विट् है वैश्य।

कितना व्यापक है

व्यापार तेरा, रे

व्यापारी मन!

सृष्टि के तीन रस

वाक्  से आप् रस

प्राण से अग्निरस

मन से सोम रस

क्रमश: पैदा करते हैं-

पृथ्वी-सूर्य-चन्द्रमा।

इच्छा है क्रिया

मन की।

तप है प्राण-क्रिया

श्रम क्रिया वाक्  की।

तुझे मुक्त होना है

संगत से

प्राण-वाक्  की

गौण करके इन्हें।

 

रे मनवा

देखा है तूने

कभी माया को

तत्व रूप में,

घेरती सदा

तुझको ही है,

सम्पादन करती है

सृष्टि का

साथ लेकर तुझे?

जहां तत्व

कभी बदले नहीं

निर्माण में,

वह होता है-

जल-वाष्प-बर्फ

की तरह,

सृष्टि की तरह।

जब बदल जाए

स्वरूप तत्व का

तब कहलाता

परिणाम है-

जैसे दही नहीं

बन सकता

दूध, फिर से।

यही माया शक्ति

अव्यक्त रहते हुए,

व्याप्त है भूतों में

चेतना बनकर।

सूर्य की अमृत रूप

सविता ही व्याप्त

जीव रूप (चेतना) में,

मृत्युमय पिण्डों में।

माया शक्ति ही

विकसित होती है

बुद्धि में,

जो कि आती है

सूर्य के तत्व

ज्योति (मनोता) से,

इनके साथ जुड़ी है

प्रकृति

सत-रज-तम रूप,

जबकि शुद्ध थी

चेतना इससे पूर्व।

दिन-रात भ्रमण करती

बुद्धि, त्रिगुण रचित

संसार में।

सूर्य से प्राप्त

ज्ञान रूप ज्योति

गुणाधीन हो गई

अत: प्रार्थना करते हैं

हम नित्य-

‘घियो योन: प्रचोदयात्’

जो हमारी बुद्धि को

करे प्रेरित।

सूर्य से प्राप्त

मूल रूप ज्ञान-ज्योति,

धी

समाविष्ट हो

हमारी बुद्धि में।

हमारा जीवन क्रम

चलता है बुद्धि से

जुड़ा अमृत-मृत्यु से-

तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्।

माया ही करती

निर्माण सृष्टि का,

चिति रूप में

सारे शरीरों का

और भीतर प्रवेश कर

संचरित करती है

बुद्धि रूप में।

माया शक्ति है

बुद्धि भी,

जिसके जोर से

करते हैं हम

अभिमान

अपने निर्णयों पर,

‘श’ का अर्थ है

ऎश्वर्य और

‘क्ति’ यानी पराक्रम।

जैसे ही शान्त हुई

भूख, क्षुधा, अशनाया,

मिट जाता है अभाव

और खड़ी हो जाती

शक्ति,

धन आया-शक्ति आई

पुत्र मिला-शक्ति आई

यश मिला-शक्ति आई,

शक्ति ही माया है,

तृप्त रूप है

क्षुधा का और

चलाती है संसार

चकित रखती है

जीव को अपने

मायाजाल में।

एक अर्थ है

शक्ति का

चमत्कार भी,

इसके बिना

कैसी शक्ति,

और सबसे बड़ा

ग्लैमर है

चमत्कार भी

आक्रान्त रहते हैं

ग्लैमर-फिल्मी

जगत सारा इससे।

शक्ति और भय

एक युगल सा

प्रतीत होता है।

देश भर के

देवता 33 करोड़,

जिन्दा है

भय के कारण,

मारा-मारा फिरता

हर आदमी

किसी अभाव से,

भय के कारण

देवी-देवताओं के,

शास्त्रीय भी-

ब्रह्मा-विष्णु-राम

लोक देवता भी

रामदेव-गोगाजी

तेजाजी-पीर भी,

कमजोर करते नित

कर्म भाव को,

पराश्रित रहते हैं

जैसे निकलने को

तैयार बैठी है

कोई लॉटरी

किसी चमत्कार से

परखते नहीं

पहले

किसी देव को

किसी भोपे को,

जो बताता है

नाम डॉक्टरों के

इलाज के लिए

एजेण्ट बनकर।

रूप बदल गए

सम्प्रदायों के

मंत्रों के,

पंचमकार तक के,

समय के अभाव से

आ धमके

सावर मंत्र भी

शुद्ध तामसिक,

डरावने प्रयोग वाले,

तू बता रे

जिज्ञासु मन

क्या अन्तर है

आस्तिकता-नास्तिकता में,

डर के प्रकम्पन में

भक्ति के भाव में

शक्ति के अभाव में

अज्ञान के प्रवाह में?

क्या सुना नहीं तूने

‘एको साधे सब सधे

सब साधे सब जाए’,

फिर क्यों

खाता ठोकरें

दर-दर की,

क्यों नहीं विश्वास

किसी एक पर,

क्या सरकार सा

कार्य होता है

अलग हर विभाग का,

अलग-अलग देव का?

जानता है न

देव कहते हैं

प्राण को,

तैंतीस देवता

तैंतीस ही प्राण

सृष्टि में।

हां, एक चमत्कार

प्राणों का ही,

तैंतीस हंै अक्षर

वर्णमाला के,

व्यंजन रूप योनियां

और स्वर हंै बीज

सृष्टि रचना के,

प्राणों की तरह,

वे भी अक्षर हंै

अदृश्य हैं,

पैदा करते हैं

स्थूल सृष्टि

क्षर पुरूष की,

भाषा की तरह,

अर्थ वाक् -शब्द वाक्।

मनवा क्यों भय खाय,

मरने से, रोग से

गरीबी से?

वैसे सारे भय

मृत्यु सूचक हैं

मूल में तो।

जीवन में

बहुत बड़ी है

सुख की चाह,

भले झूठी हो

नश्वर हो,

इसको पूरा करने

चलता रहता है

आदमी उम्रभर

भूलकर दु:खों को

एक बारगी।

इतना ही जानता है

देवताओं को भी,

कल्पना भरी है

मन के भीतर

स्वर्ग-नरक की,

यमराज का भय,

मृत्यु उपरान्त भी

जीने नहीं देता

मुक्त भाव से

व्यक्ति को।

संत भी डराते

नरक भय से

जैसे डराता है

डॉक्टर बीमारी से।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

 

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