Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 24, 2012

मैं ही राधा मैं ही कृष्ण एक मानि्त्रक काव्य

आचार्य गुलाब कोठारी का जीवन और काव्य दोनों ही अस्तित्व का सहज प्रतिफलन हैं। उन्होंने जिसे जिया उसे ही लिखा और जिसे लिखा उसे ही जिया भी। इसलिए उनका जीवन श्री से अलंकृत हो गया और उनका काव्य सारस्वत सुषमा से चमत्कृत हो उठा। दूसरे शब्दों में, उनका जीवन एक काव्य बन गया और उनका काव्य जीवन का दर्पण बन गया।

योगीराज श्री अरविन्द ने कहा था कि भविष्य की कविता माçन्त्रक होगी। “मैं ही राधा मैं ही कृष्ण” उसी माçन्त्रक कविता का उदाहरण है। महर्षि वेदव्यास ने घोषणा की थी कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सम्बन्ध में जो कुछ महाभारत में कह दिया गया है उसके बाद कुछ कहने को शेष नहीं रहता-

धर्मे अर्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ।।

गुलाब जी ने चारों पुरूषार्थो पर फिर भी अपनी कलम चलाई तो लगता है कि उनकी कविता वैदिक ऋçष्ा की उषा के समान “पुराणी युवति” है। उषा न जाने कब से उदित होती आ रही है किन्तु प्रत्येक प्रात: वह नई ही प्रतीत होती है।

आलोच्य काव्य के केन्द्र में मनुष्य है और मनुष्य इतिहास के प्रारम्भ से ही सुख-दु:ख की चिरपरिचित धूप-छाया में पलता रहा है। फिर भी नूतन की उद्भावना कहां से की जाए? कश्मीर के नैयायिक जयन्त भट्ट के सामने यही समस्या थी- कुतो वा नूतनं वस्तु वयमुत्प्रेक्षितुं क्षमा:- मनुष्य से सम्बद्ध सत्य तो सनातन ही होगा किन्तु देश-काल का परिवेश नित्य नवीन होता है। अत: जो कवि देश-काल से जुड़कर चलता है वह सनातन सत्य में भी नवीनता ला देता है। पुरूषार्थ चतुष्टय पर हजारों पृष्ठ लिखे गए हैं किन्तु प्रस्तुत कृति में किसी भी पुरूषार्थ पर पढ़ते समय बासीपन का अहसास नहीं होता।

इसे ही काव्यशास्त्री “नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा” कहते हैं। गुलाब जी की विशेषता यह है कि वे नवीनता के मोह में शाश्वत को भूले नहीं हंै, जैसा कि आजकल बहुत से कवियों के साथ घटित होता रहा है। इस कृति में उन्होंने शाश्वत सत्य को भी इस तरह प्रस्तुत किया है मानो वह हमारे अपने समय का ही सत्य है। दूसरे शब्दों में कहूं तो यह कृति शास्त्र भी है और समाचार पत्र भी। इस प्रकार इसमें क्लासिकल और रोमान्टिक का संगम है। उचित होगा कि स्थालीपुलाक-न्याय से कृति के कुछ अंशों पर विमर्श किया जाए।

धर्म- मूल काव्य धर्म से प्रारम्भ होता है। महर्षि वेदव्यास की घोष्ाणा थी, धर्म से ही अर्थ और काम की सिद्धि होती है- धर्मादर्थश्च कामश्च। उनकी यह वेदना थी कि उनकी यह बात कोई नहीं सुनता- न च कश्चिच्छृणोति मे। यही वेदना प्रस्तुत काव्य की भी जननी बन रही है- श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोक:। धर्म का एक रूप पूजा भी है। कवि की पूजन विधि अद्भुत है- जो कुछ मिला है/ “उसी का” दिया है/ मुझे तो मिला है/ एक ही वरदान/कर्म करने का/ तब क्यों न चढ़ाऊं/ मैं अपना कर्म/ ईश्वर को/ बिना मांगे कुछ भी। कवि ने साम्प्रदायिक कट्टरता की सारी इमारत ही यह कह कर ढहा दी कि- धर्म नहीं है/आस्तिक होना/ नास्तिकता भी है/ धर्म/ यदि केन्द्र में हो/ आनन्द भाव। यहां कवि दार्शनिक से भी आगे निकल गया है। दार्शनिक किसी वाद को लेकर चलता है किन्तु कवि जीवन की अखण्डता को देखता है।

अर्थ- गुलाब जी का अर्थ गणित-केन्द्रित नहीं है। वह बहुत व्यापक है- अर्थ वाक्/ और शब्द वाक् / अर्थात् लक्ष्मी/ और सरस्वती एक है दोनों ही। वेदविज्ञान में कोई पदार्थ जड़ नहीं है। किन्तु जड़ में चेतन देख पाने की बात तो दूर की है, हम तो चेतन को भी जड़ मानकर चल रहे हैं- पत्नी भी अर्थ/ बच्चे भी अर्थ/ वरना नहीं है/ किसी भी काम के।

काम- काम पुरूषार्थ की व्याख्या में कवि फ्रायड को बहुत पीछे छोड़ देता है- कैसे दाम्पत्य-यज्ञ का अवभृथ स्नान हो अद्वैत सरोवर में। जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। स्त्री-पुरूष भाव की एक मौलिक व्याख्या कवि ने की है- दोनों ही/ रहना चाहते हैं/ पौरूष भाव में/ प्रारम्भ काल में/ और अन्त में दोनों ही/ बन जाते हैं/ स्त्रैण्य।

मोक्ष- इस खण्ड में कविता पूरी तरह माçन्त्रक हो गई है- मन-प्राण-वाक् का, इच्छा-क्रिया-ज्ञान/ नाद-शब्द-ध्वनि/ अहंकृति, प्रकृति और आकृति। जब इतने पर भी कवि को सन्तोष नहीं हुआ तो उसने श्रुति को ही उद्धृत कर दिया- यो बुद्धे:परतस्तु स:। जहां तक मोक्ष का प्रश्न है- कोई नहीं चाहता/ मोक्ष/ बातें करते हैं/ सब कोई मोक्ष की/ मोक्ष का अर्थ है- खुद का मर जाना।

अब “मोक्ष का अर्थ है- खुद का मर जाना” मन्त्र नहीं है तो और क्या है? इसे मन्त्र की तरह जपा जाए तो अहंकार का विष उतरता चला जाता है। विश्वास न हो तो जप कर देख लें। माçन्त्रक काव्य का रस जीवन-रस है।

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