Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 30, 2012

महाव्रत

जीवन को देखने के सबके अपने-अपने ढंग होते हैं। हम किसी दूसरे के ढंग को हू-ब-हू नहीं अपना सकते। न हम महावीर बन सकते हैं, न ही ईसा मसीह। न ही राम या कृष्ण। हां, उनके जीवन से कोई अंश ग्रहण कर सकते हैं। यह भी तभी संभव है जबकि हम भी उन्हीं की तरह देख पाएं। उन्हीं अर्थो को समझ पाएं, जिन अर्थो में वे जी गए, कह गए, देख गए। देखना-जानना आत्मा के दो धर्म हंै। आत्मा करता कुछ नहीं है। उसका भी बस साक्षी भाव रहता है। जाग्रत रूप का साक्षी भाव ही तो जानना है। जाग्रत चेतना ही ज्ञान का पर्याय है। धर्म के तीन आधार स्तम्भों में एक है दर्शन (देखना) तथा दूसरा है ज्ञान (जानना) तथा तीसरा है चारित्र। चारित्र दर्शन और ज्ञान का ही व्यावहारिक रूप है।

 

 

व्यवहार को ही धर्म कहा जाता है। व्यवहार को भी वहां मूलत: महाव्रतों में बंाटा गया है। सत्य-अहिंसा-ब्रह्मचर्य- अचौर्य तथा अपरिग्रह। मूल में परिग्रह ही इन पांचों का आधार बनता है। स्थूल और सूक्ष्म रूप में कर्म और विचारों के  परिग्रह का विस्तार ही दिखाई देता है। ग्रहण करते रहना या संग्रह करने की मानसिकता ही परिग्रह है। इसमें आवश्यकता की मर्यादा नहीं रहती। लोभ और अहंकार, विषयों के प्रति आसक्ति, आदि सुप्त चेतना के स्वरूप मूल कारण हैं।

 

शरीर का सुख और ज्ञान का दंभ परिग्रह कराते रहते हैं। व्यसन-वासनाएं भी इस के चंगुल से मुक्त नहीं होने देते। महायुद्धों तक के मूल में परिग्रह का दानव रहा है। मेरा पहला अनुभव है कि कोई सिद्धान्त नकारात्मक नहीं हो सकता। नहीं तो इसके प्रयोग निषेधात्मक रूप धारण कर लेते हैं। अहिंसा का जीवन में सीधा प्रयोग नहीं होता।

 

हिंसा का ही होता है। परिग्रह का ही होता है, अपरिग्रह का नहीं होता। अचौर्य का नहीं होता। परिग्रह ही हिंसा का सबसे बड़ा कारण है। सुख-दु:ख, दिन-रात जैसे युगल रूप में होते हैं, वैसे ही हिंसा-अहिंसा, सच-झूठ, परिग्रह-अपरिग्रह भी युगल रूप भाव होते हैं। इसका अर्थ है एक का होना, दूसरे का अभाव। अविद्या जन्म के साथ होती है, विद्या का तो अभ्यास करना पड़ता है। हिंसा-झूठ आदि तो जीवन के अंग हैं। परिग्रह ही झूठ का भी एक बड़ा हेतु है। परिग्रह-मुक्ति के भाव के साथ हिंसा और झूठ रहते ही हैं।

 

जब मुझे कोई पूछे कि अहिंसा क्या होती है। मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं होता। मंैने इसको व्यवहार में सीखा ही नहीं। व्यवहार में तो हिंसा के अनन्य भाव सीखे हैं। तब मेरा उत्तर होगा-हिंसा से बचो, तो अहिंसक बन जाओगे। अहिंसक बनाने के लिए मैं सबको हिंसा का निषेध सिखाऊंगा। रात्रि भोजन का निषेध, बिना छाने पानी पीने का निषेध, आक्रामकता का निषेध, जीव हत्या का निषेध, आदि-आदि। मेरे पास कोई विकल्प नहीं है अहिंसा को समझा देने के। यही बात अचौर्य और अपरिग्रह पर लागू होती है।

 

ये दोनों भी नकारात्मक दिखाई पड़ेंगे। अभाव रूप सिद्धान्त हैं। विवेचन और व्यवहार में दोनों ही निषेधात्मक हैं। तब इनको लागू करना सहज दिखाई नहीं देता। ब्रह्मचर्य आचरण है, जहां काम-वासना का अभाव है। काम-वासना का अपना परिग्रह संसार है। वहां भी हिंसा छिपी हुई है। आक्रामकता है। क्योंकि ब्रह्मचर्य व्यवहार में नहीं आता। व्यवहार में काम-वासना का होना अथवा नहीं होना ही रहता है। वासना को जिया जा सकता है। ब्रह्मचर्य काम का अभाव मात्र है। न्यूनाघिक काम-वासना तो ब्रह्मचर्य से भी जुड़ी रहती है। एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

 

जीवन तो सारा ही असत्य पर टिका हुआ है। यहां तक कि जगत को ही मिथ्या कहकर देखा गया है। सत्य अदृश्य है एक तरह से। उसे तो व्यक्ति इस जीवन में खोजता है। झूठ का स्वरूप नहीं टिकता। आत्म-दर्शन के साथ सारे असत्य स्वत: ही लुप्त हो जाते हैं। फिर भी सत्य को जिया नहीं जाता। असत्य को ही जिया जाता है।

 

कार्य-कारण भाव की दृष्टि से भी सिद्धान्त में कारण होता है। अक्षर संस्था है। पांचों महाव्रत क्षर संस्था से जुड़े हैं। अक्षर सूक्ष्म जगत है। सारा आचरण स्थूल रूप है। हां, दृष्टा और ज्ञाता भाव सूक्ष्म हैं। उनकी अभिव्यक्ति ही आचरण है। लक्षण हैं। इनका अभाव पैदा किया जाता है। अभ्यास से भी मन को पटु बनाने में बरसों लग जाते हैं।

 

क्या परिग्रह को दबा पाना सहज है? कोई व्यंजन जब अच्छा लगता है, तब व्यक्ति ज्यादा खा जाता है। स्वयं को रोक नहीं पाता। तब क्या चोरी और वासना के प्रवाह को रोकना सहज है। वासना तो हमारी सृष्टि का मूल कारण है-एकोहं बहुस्याम्। सृष्टि विस्तार का आधार है। न जाने किस-किस जन्म में हमने किस-किस जीव के साथ मिलकर सृष्टि विस्तार किया होगा। आज वे किस-किस रूप में पृथ्वी पर विचरण कर रहे होंगे। सामना होते ही क्या पिछली वासना जाग्रत नहीं होगी? आप कितना दबा लेंगे-अभाव पैदा करने के लिए! एक स्थिति के बाद दबाना भी संभव नहीं हो तो? कब फू ट पड़े, नहीं जानते। तब तक हम ब्रह्मचारी हैं।

 

हर धर्म ब्रह्मचर्य की बात करता है। आज सब तरफ-हर धर्म में-क्या हो रहा है। असत्य, काम-वासना, परिग्रह को जिया जा रहा है। क्योंकि अहिंसा-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रह को छू भी नहीं सकते। ये एक ऎसी स्थिति है जहां न निषेध के द्वारा पहंुच सकते हैं, न ही अभ्यास के माध्यम से। यहां समझ सकते हैं कि इन महाव्रतों की अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोश में उपस्थिति तक नहीं है। ये तो मूलत: वैराग्य सूचक धरातल हैं, जो धर्म एवं ज्ञान पर आधारित हैं। प्रज्ञा अथवा चेतना के जागरण के साथ प्रकट होने लगते हैं।

 

विज्ञानमय कोश का द्वार खुलने के बाद इनका स्वरूप उभरने लगता है। व्यक्ति उपासना-भक्ति-ध्यान आदि के क्रम में आगे बढ़ चुका होता है। शरीर के शिथिलीकरण के साथ ही परिवर्तन शुरू होने लगते हैं। कर्मेन्द्रियों का विश्व शांत हो जाता है। श्वास के मंद पड़ने पर व्यक्ति अपनी स्थूलता छोड़ देता है। बाहर के विश्व के साथ उसका सम्पर्क अल्प काल के लिए टूट जाता है। शरीर की अनुभूतियां छूट जाती हैं। झूठ-वासना-परिग्रह आदि की अभिव्यक्तियां ठहर जाती हैं, किन्तु रोग की जड़ें अभी जीवित हैं।

 

आगे का मार्ग संकल्प की दृढ़ता पर ही टिका होता है। अन्य कोई सहायता कार्य नहीं करती। यहां से तो व्यक्ति स्वयं आगे बढ़ता है। शब्द तथा चित्र अनाहत तक छूट जाते हैं। तब सारे महाव्रत भी स्वत: ही पैदा होते जान पड़ते हैं। शायद शास्त्रों का यह मत हो कि व्यक्ति उसके बाद ही धार्मिक स्वरूप ग्रहण करता है। संकल्प या धारणा से व्यक्ति भ्रू मध्य की ओर ध्यान के लिए अग्रसर होता है। विज्ञानमय कोश में प्रवेश के लिए। ध्यान की साधना के साथ ही सारे धार्मिक लक्षण पैदा होने लगते हैं। ध्यान के परिणाम स्वरूप। क्योंकि जब तक ध्यान की साधना पूरी नहीं हो जाती, धर्म के सिद्धान्त घटते नहीं हैं।

 

आज तो हजारों उदाहरण उपलब्ध हैं इस बात के कि बिना ध्यान साधना के, मात्र दबाव में कितने साधु धार्मिकता के मुखौटे लगा कर घूमते हैं। कितने मठ और आश्रमों में रहने वाले ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पर प्रवचन देकर धन अर्जित कर रहे हैं। किन्तु उनके आचरण में इन महाव्रतों की प्रतिष्ठा दिखाई नहीं दे सकती। क्योंकि इनकी साधना तो संभव ही नहीं हैं। ये तो साधना के परिणाम हैं, फल हैं।

 

जहां दर्शन और ज्ञान स्पष्ट नहीं होते, वहां आचरण और महाव्रत साधना का विषय बन जाया करते हैं। जिनको जिया नहीं जा सकता, उनकी साधना कैसे हो। इससे तो जीवन की प्राकृतिक सहजता भी नष्ट हो जाती है। दुखों का स्रोत फूट पड़ता है। अत: धर्म को अपने प्राकृतिक स्वभाव रूप में देखा जाना चाहिए। इस स्वभाव का नित्य आकलन होता रहे-परिष्कार होता रहे। यही महाव्रतों को आमंत्रित करने की शुरूआत है।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

2 टिप्पणियाँ »

  1. aapka vichar me osho ki jalak milti hai sir jee, aap me bhi ek vidrohi ki jalak dikti hai, me aapka ispandan bhi padta hu. mai aapka fan hu. mai osho ka sanyasi bhi hu sir jee, mera vasvik naam to guru ne hi diya hai (Swami Anand Priyash). sahil mera ek duja kaha na jay. duja sahib jo kahu sahib khada rajye. (Kabir das).

    टिप्पणी द्वारा Yogendra Singh — जुलाई 28, 2013 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: