Gulabkothari's Blog

जनवरी 6, 2013

रे मनवा मेरे! 10

देख रे मनवा

 

शक्ति होती है

अत्यघिक असुर में,

देव से भी अघिक,

संख्या में होते हैं

तीन गुणा, देवों से,

फिर भी होते हैं

भयभीत ही

शक्ति वाले, सम्पन्न,

बाहुबलि, पदस्थ

लोग ही

वे ही करते हैं

आचरण अविद्या का,

अत: निश्चित है

उनकी गति नीचे,

नरक की ओर।

शक्तिमान होते हैं

बहुत ही कम,

जनकराज जैसे

सुशोभित विद्या से

धर्म-आधार से,

तभी बना रहता

उनका ऎश्वर्य,

जिसके बिना

कैसे हो मन

आप्त काम,

झूमती इच्छाएं

दसों दिशाओं में,

जाना है मोक्ष

तो जूझना है

असुर भाव से।

एक स्त्री आई

मिलने आज,

साथ में थीं

दो बड़ी बेटियां,

छूट गई थी

नौकरी सरकारी

बैठी थी घर पर,

बेटियां प्रसन्न थीं

मां का साथ मिला।

मैं नहीं था सहज,

कहा बधाई हो,

छूट गई नौकरी,

देखो प्रसन्नता

चेहरों पर बेटियों के,

आपका ही खून है

इनके शरीर में।

इनको कष्ट दिए

कितने

आपकी नौकरी ने,

पति को भी

मिली सजा

वनवास की

रहते आपके

नहीं किया तैयार

बेटियों को भी

जाने को ससुराल,

नहीं बनाया उन्हें

अच्छी स्त्री भी,

मां भी बनेगी,

पालेंगी गर्भ को,

क्या सिखाया इन्हें

इन विषयों पर,

कुछ नहीं न?

किसके भरोसे

भेज दोगी इनको

पराए घर में,

बिना तैयारी के

कैसे टिक पाएंगी

जीवन संग्राम में?

जीना पड़ेगा इनको

पराधीन होकर

अज्ञानी होकर,

भूलकर स्वतंत्रता।

तब बताओ मुझे

आप मां है

अथवा शत्रु इनकी

धकेल देंगी

अंधकार में

एक दिन?

क्या अहसास है

आपको कि नहीं दी

सजा आपको

कभी इन्होंने और

करती रहीं आप

गलती पर गलती?

कौन से दिए

संस्कार इनको,

जो ये दे पाएंगी

अपनी संतानों को

सुभद्रा जैसे,

जानती हैं न

निर्माण अभिमन्यु का?

मन कहता है

करो नहीं कुछ काम,

करते रहो आराम,

गुठली बनकर

बैठ जाओ

कोल्ड स्टोरेज में,

सुरक्षित रहोगे,

तब भला कैसे

लगेंगे आम,

कैसे दे पाओगे

छाया मुसाफिरों को,

मर जाएंगे

माता-पिता भी

गुठली के साथ ही

टूट जाएगा जीवन

सुरक्षा के क्रम से।

क्या समझा रे,

आम के पेड़,

गुठली रहेगी जिन्दा

नहीं मिलेंगे आम,

गुठली करेगी काम

फल पकने तक,

चलती रहेगी

पेड़ों के अंगों में

आम मिलने तक।

आम लगते हैं

गुठली के कारण

उसी किस्म के।

तभी कहते हैं-

मातृ देवो भव!

भारत ही है

एक देश विश्व में

जहां पूजते हैं

मां को आज भी,

प्रत्यक्ष में भी

वही करती है

निर्माण संस्कृति का,

वही संस्कार है

धरती मां है,

सदा कल्याणकारी

जननी और पोषक

बन गई आज

संहारक भी।

उसके मन पर

लग गया ग्रहण

शिक्षा का,

कैरियर का,

जरूरी नहीं रहे

मानव मूल्य

अर्थ के आगे,

टेक दिए घुटने

ममता ने,

उसका मन भी

नहीं चाहता

बंधन कोई

वात्सल्य का,

नौकर रख सकती

बच्चों के लिए,

भेज सकती है

दूर पढ़ने के लिए

पाने को स्वतंत्रता,

नकारकर प्रकृति,

उत्तरदायित्व बोध,

कैसे संघर्ष करेगी

कैसे बह पाएगी

धारा के विरूद्ध,

कौन देगा सहारा

बिन मोल मांगे,

कैसे कटेंगे दिन

अकेले में

बुढ़ापे के?

ये सारे प्रपंच

माया के देख

सम्पन्न घरों में

क्योंकि देता है

ईश्वर उन्हीं को

ढेर सारा,

जिनको रखना है

दूर स्वयं से,

कर देता है हवाले

माया के,

बना देता कौरव

सारे असुर प्राण

कहां जीत पाए

अन्त में धर्म से,

धार्मिकता से

केवल पांच की!

आज का भ्रष्टाचार

द्योतक है कि

नजदीक है कोई

महाभारत फिर

सजने लगा है

कुरूक्षेत्र!

 

एक ही है

ब्रह्म और माया

पदार्थ और शक्ति (ऊर्जा)

अन्न से बनता है

शरीर सबका,

कुछ लोक

बाला सती जैसे,

गुजार देते हैं

बरसों बिना खाए,

बदलकर ऊर्जा

आकाश की

पा लेते हंै

अन्न।

ऊर्जा प्राण है,

अन्नमय कोश के

भीतर ही है

प्राणमय कोश,

ऊर्जा संग्रहालय,

चेहरे की रौनक

किन्तु करता अनुसरण

तेरा, मन का,

समझा?

तेरी बात को

पहुंचाता शरीर तक

ताकि हो सके पूरी

इच्छाएं तेरी

और प्राण ही

लाता तेरे पास

विषयों को

इन्द्रियों द्वारा,

प्राण कारक है

सारे कार्यो का

सारी गति का

जुड़ाव का,

रस्सी है अदृश्य

बांधती तुझको

विषयों के जाल में,

समझ इनको

यदि होना है मुक्त

जीवन चक्र से।

विषय निर्जीव,

मन गति शून्य

प्राण सेतु है

गतिमान यजु है।

क्या प्राणहीन

नर-मादा

कर सकते हैं

सृष्टि विस्तार?

प्राण तेरी नैया है

रे मन, तू ही

खिवैया है इसका,

संसार एक किनारे,

और दूसरा छोर

जीवन के पार।

बंधा रह चाहे तो

संसार से

माया की रस्सियों से,

या फिर जगा

प्राण शक्ति

उसी माया की,

करके संकल्प

हो जा पार!

रे मनवा मेरे

मोल नहीं तन का

न तेरा-मन का,

मोल है संकल्प का

जागरूकता का

सृष्टि समन्वय का

दृष्टि उत्कृष्ट का

जीवन में ऊध्र्व का

आ लौट चलें

ऊध्र्व की ओर,

देकर विश्राम तन को

मननशील मन को,

जाग्रत कर प्राण

मारो छलांग

नभ-पथ से

द्यु लोक तक।

कर लो दैदीप्यमान

प्राणों को,

कर प्राणायाम,

यदि देनी है गति,

दिशा, शक्ति

स्वप्नों को

संकल्पों को।

कर्म करो

प्राणमय होकर,

अकर्म रूप में

ब्रह्म बनकर,

ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र

प्राणों से,

ह्वदय केन्द्र से

मन के भीतर से।

स्थिर नहीं रहती

प्रकृति स्वभाव में

फिर क्यों व्यक्ति

जिये कर्म अभाव में!

सच तो यह है

धर्मी मनवा,

कि कर्म अति है

जीवन में आज,

नहीं विश्राम

मन-बुद्धि को,

लद रहा है जीवन

प्रवृत्तियों से,

चर्चा नहीं कहीं

निवृत्ति की

विरक्ति की

विराग की।

याद रख मनवा

प्रवृत्ति काट नहीं पाती

प्रवृत्ति को,

वह तो लाती है

बाहरी पदार्थ भीतर

प्रत्येक इन्द्रिय से,

ढंकते जाते हंै

आत्मा को,

रे मनवा

तेरे जरिए और

तू है बेखबर

वाह रे मनवा!

प्रवृत्ति के साथ

उसका स्वरूप

सत-रज-तम का

करता अशुद्ध मन

को, एक-एक दोष

हर प्रवृत्ति के संग,

दिन भर में कितने

और उम्र भर में?

और प्रवृत्ति किसकी

शरीर की-क्रिया की,

तभी तो करते हैं

उत्सर्ग काया का

कुछ देर,

एकाग्र होकर

नासाग्र-प्राणों पर,

श्वास-प्रश्वास पर।

जाते-आते

भीतर-बाहर

शरीर के,

प्राण गति से,

विच्छेद करके

क्रियाओं से,

कुछ काल, ताकि

न पहुंचे विषय

इन्द्रियों से मन तक,

लागू हो निषेध

आदेशों पर मन के,

न तन-न मन

दोनों शान्त,

शान्त हो श्वास भी,

ठहर जाएं

क्रियाएं सभी,

कुछ काल रहे

निवृत्ति में

मन मेरा।

सूक्ष्म है श्वास,

खोल सकता है

मार्ग सूक्ष्म का

निवृत्ति का,

ध्यान से

संकल्प से

एकाग्रता से,

पहुंचता चेतना तक ,

प्रज्ञा लोक तक,

होता हुआ दूर

स्थूल प्रवृत्तियों से।

यहीं से हो सकता

शुरू प्रेममय जीवन,

जो मिला, प्रेम किया,

जाने लगा, छोड़ दिया,

प्रवृत्ति और निवृत्ति,

न कोई स्मृति,

न अतीत, या भविष्य

बस वर्तमान,

काम से काम!

जो डोर पकड़ी

मिलने के साथ

व्यवहार की,

छोड़ दो उसे

तुरन्त, उठने से पहले

नहीं बंधन नया,

न याद आए

न बुलाया जाए,

सभी रिश्ते हमारे

प्रकृति में ही

समा जाएं।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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