Gulabkothari's Blog

जनवरी 13, 2013

उदारता

व्यक्ति अपने जीवन के लिए यज्ञ करता है। यज्ञ से सृष्टि होती है, विस्तार होता है। दूसरों की सहायता के लिए दान करता है। दोनों स्थितियों से ऊपर उठ पाने के लिए तप करता है। स्वयं के लिए जीना पशु भाव है, शरीर प्रधान कर्म मुख्य होते हैं। दूसरों के लिए चिन्तन करना मानसिक धरातल है। संवेदना प्रधान कर्म है। तप का लक्ष्य प्रतिसृष्टि होता है।

 

 

दान जीवन का बहुत ही महžवपूर्ण पहलू है। इसके बिना व्यक्ति केवल लेने की, बटोरने की ही चिन्ता करता है। जितना पाता है, वह भी कम प्रतीत होता है। जीवन में सदा एक अभाव-सा बना रहता है। लोभ-मोह और ईष्र्या व्यक्ति को घेरे ही रहते हैं। एक पक्षीय चिन्तन, स्वार्थ प्रधान कर्म तथा प्राप्त करने की आक्रामकता जीवन के पर्याय बन जाते हैं। परिग्रह का साम्राज्य फैलता जाता है। अभावग्रस्त व्यक्ति कभी देने की नहीं सोच सकता। स्वार्थी-संकुचित मानसिकता वाला भी देने में संकोच ही करेगा।

 

मजबूरी में देना भी पड़े तो अपनों को ही देगा। देने के लिए पास में कुछ होने की अनिवार्यता नहीं है। यह तो एक भाव प्रधान मानसिकता है। जिसके जीवन में स्वयं के अलावा किसी और का स्थान भी हो, तब उसके बारे में चिन्तन जाग्रत होगा। उसके प्रति मन में संवेदना, दया, करूणा का भाव भी होना चाहिए। हर व्यक्ति में अर्द्धनारीश्वर का स्वरूप प्रतिष्ठित है। पुरूष बुद्धिगत भाव, शारीरिक सौष्ठव पर आधारित स्थूलता की भूमिका में होता है।

 

नारी स्त्रैण-संकोच-ग्राह्यता-वात्सल्य-माधुर्य का रूप है। दोनों में जो भी भारी पड़ेगा, वैसा ही चिन्तन-भाव-कामना और कर्म प्रकट होगा। एक लेने के पीछे भागेगा, दूसरा देने की सोचेगा। जीवन को स्त्रैण चलाता है, माया नचाती है। वही दूसरों की ओर देखती है, घेरती है। पुरूष का देना शुद्ध व्यापार रूप होता है। नारी भी कुछ लेने की दृष्टि से ही देने का अभियोजन करती है। यह सारा सृष्टि व्यापार है। इसमें जो भी स्त्रैण होता जाएगा, उसका विस्तार होता जाएगा। उसके मन से लेने की वृत्ति छूटती चली जाएगी। महामना, उदार, दानी, दातार बनने की ओर बढ़ेगा या बढ़ेगी। पुरूष की लेने की प्रवृत्ति और आक्रामकता शिथिल पड़ती जाएगी। बुद्धि की प्रधानता तब मनीषी का रूप धारण करने लगेगी।

 

जीवन में हर प्रिय वस्तु मन और आत्मा का अंश बन जाती है। इन्हीं व्यक्तियों को, वस्तुओं को व्यक्ति भोगता है। सुख की अनुभूति प्राप्त करता है। यही व्यक्ति का साम्राज्य होता है। आत्मा का विस्तार होता है। जहां-जहां तक यह भोग्य पदार्थ-यश पहुंचाता है, वहां-वहां तक साम्राज्य का विस्तार रहता है। इसके किसी भी अंश का अलग हो जाना कष्ट का कारण होता है। उसकी सम्पत्ति छूटती जान पड़ती है। इससे यह बात समझ में आ जाती है कि दान कितना साहस का कार्य है। कलेजा चाहिए प्रिय वस्तु का दान करने में। पूछो ‘कन्यादान’ करने वालों को।

 

दान उसी का किया जा सकता है जिस पर व्यक्ति का स्वयं का अघिकार होता है। दूसरे के अघिकार की वस्तु का दान नहीं किया जा सकता। दान में वस्तु से अपना अघिकार हटाकर दूसरे का अघिकार स्थापित करना होता है। ताकि वह सदा-सदा के लिए उसी की हो जाए। अत: दान में सुख भी तब ही प्राप्त होता है, जब प्राप्त कत्ताü के प्रति भी मन में संवेदना हो, मान-सम्मान का भाव हो। उससे जीवन में कभी अपनी सुरक्षा का कोई खतरा नजर नहीं आता हो। क्योंकि यह भी एक बड़ा कारण है संग्रह करने का।

 

धन को ही सुरक्षा का पर्याय मान लिया गया है। समाज में धन ही प्रतिष्ठा का आधार बन गया है। व्यक्ति इसके साथ जोर से चिपक जाता है। इससे बड़ा बंधन क्या हो सकता है! आज सारी शिक्षा का यही एकमात्र लक्ष्य है। इस कारण व्यक्ति अकेले जीने को भी मजबूर है। मुक्ति का मार्ग तो संग्रह के विपरीत छोड़ना सिखाता है। आप जब किसी को पकड़ते हो तो स्वयं भी तो उससे बंधते हो। उससे जुड़ी क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं मन पर छायी रहती हैं। मन को शांत नहीं होने देती। आगे से आगे लोभ में प्रवृत्त करती हंै। तृष्णा का रूप लेती हैं। क्रोध एवं आक्रामकता बढ़ती है। उदारता का भाव ही लोभ की रामबाण औषध है। इसी से अनासक्ति का भाव प्रशस्त होता है।

 

विद्या भाव उदारता देता है। अविद्या का प्रभाव संग्रह या परिग्रह की ओर आकर्षित करता है। तृष्णा का कारक बनता है। तम का साम्राज्य है। उदारता सत्व गुण प्रधान है। हल्कापन पैदा करता है। सत्वं लघु प्रकाशकम्। अत: मन को निर्मल भी करता है। प्राप्त करने वाले के चेहरे पर प्रसन्नता का भाव देखकर प्रसन्न होता है। अपनापन पैदा होता है। जैसे-जैसे देने का भाव बढ़ता है हमारा अपनेपन का भाव विस्तार पाता है। हम एक-दूसरे से जुड़ा अनुभव करते हैं। प्रेम जाग्रत होता है। प्राप्त कत्ताüओं की प्रसन्नता हमें प्रेरित करती जाती है। स्त्रैण बढ़ता जाता है। लक्ष्मी चंचला है। एक जगह टिकती नहीं है।

 

इसके तीन रूप हैं-दान, भोग और नाश। भोग के बाद बचे हुए का दान ही नाश से रक्षा करता है। उदारता का भाव और मुक्त-हस्त दान के गीत साहित्य में जितने अच्छे लगते हैं, उतने व्यवहार में नहीं लगते। वहां तो अच्छी चीज किसी को देने की सोचकर ही कण्ठ सूखने लग जाते हैं। राजा का गले से नवलखा हार उतारकर नर्तकी को बख्शीश (इनाम) में देना कहानियों में ही मोहक लगता है। इसका कारण है हमारी अभावग्रस्त मानसिकता। ‘मेरे पास तो देने लायक कुछ भी नहीं हैं।’ स्वभाव से व्यक्ति भिखारी जैसा व्यवहार करता जान पड़ता है।

 

दूसरी ओर प्रकृति को देखते हैं, तो वह तो कभी कुछ मांगती ही नहीं। न पेड़ फल मांगता, न ही नदी पानी पीती है। प्रकृति बस देती है, कभी कुछ लेती नहीं है। इसीलिए मां है। हवा, रोशनी, धरती, आकाश, धूप, चांदनी, और भी न जाने क्या-क्या। कुदरत की पैदा की हुई एक ही चीज है, जो देना लगभग भूल चुकी है और उसका नाम है-आदमी। कितनी महžवपूर्ण योनि और कितना छोटा उसका दिल! वह मन्दिर में भी भगवान को जो चढ़ाता है, वह सब भगवान का ही दिया होता है। अपना कुछ भी नहीं चढ़ाता। चढ़ावे के बदले में भी मांगता और है। सम्पूर्ण जीवन को ही व्यापार बना छोड़ा है।

 

देने का, सहायता का, उदारता का क्या एक ही अर्थ है-धन देना। क्या इसके अलावा देने का कोई स्वरूप ही नहीं है। क्या सेवा-सुश्रुषा दान नहीं है? क्या सान्त्वना के मीठे बोल उदारता या संवेदना के प्रमाण नहीं हंै? क्या फूल की तरह खुशबू बिखेरना उदारता नहीं है? और आज मानव इतना भी देने को तैयार नहीं है। जबकि लेने के लिए तो किसी को गोली भी मार सकते हैं। तब क्या तो अर्थ रह गया है शिक्षा का और क्या अर्थ बचा खानदानों का, संस्कारों का! सब गुड़-गोबर होता जा रहा है। एक ही कारण है सबका। व्यक्ति अपना प्राकृतिक स्वरूप भूल बैठा है। उसे याद नहीं है कि सबके भीतर एक ही सत्ता विराजमान है।

 

हम सब उसी की संतान हैं। सब की डोर भी उसी के हाथ में है। वही हमको भिन्न-भिन्न योनियों में प्रतिष्ठित करता है। इसीलिए हम सब भी एक-दूसरे से, सूक्ष्म स्तर पर, बंधे हुए हैं। हमारी संवेदना और संवेदनहीनता एक दूसरे को निरन्तर प्रभावित करते रहते हैं। हमारे स्वरूप को प्रतिक्षण बदलते रहते हैं। जब सब उसी की संतान हैं, तो उनको प्रसन्न रखकर हम ईश्वर को प्रसन्न रख सकते हैं। वह भी हमारी तरह देना नहीं जानता होगा। दृष्टि से पर्दा हटने के बाद तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। उदारता तब क्षमा में बदल जाती है। उदारता की, मुक्त ह्वदय की, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने की यह श्रेष्ठतम विधा है, गुण है। इससे तो सामने वाले की उदारता भी जाग्रत हो सकती है।

 

उदारता हिसाब-किताब करने का धरातल नहीं है। जीवन के प्रति आस्था का भाव है। ‘नेकी कर, कुएं में डाल’। मानवता के प्रति उत्तरदायित्व का बोध, भीतर समर्थ होने की अनुभूति, संकुचन के स्थान पर विस्तार का भाव पैदा होता है। साथ मिलकर जीने का, सुरक्षा का भाव जीवन में सुख प्रदान करता है। संकुचन या कंजूसी, भावनात्मक कुण्ठा और असुरक्षा का भय, हो सकता है शरीर-मन में आघि-व्याघि पैदा कर दे। आखिर, इस व्यवहार से हम ईश्वर को भी और उसकी प्रजा को भी चुनौती ही देते हैं कि जो मेरे पास है, वह बस मेरा ही है, मेरे लिए ही है। व्यक्ति का कत्ताü भाव ईश्वर से टकराता रहता है, हारता जाता है, दु:खी परिस्थितियों से बाहर नहीं आ पाता। शायद कभी कोई आए और अपनी उदारता से ऎसे व्यक्ति को क्षमा कर जाए!

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: