Gulabkothari's Blog

जनवरी 20, 2013

रे मनवा मेरे! 11

सुखी रहना है

 

यदि मनवा रे

तो फेंक दे

बाहर उठाकर

माया का भाव

स्थूल का चिन्तन

राग-द्वेष

अभिनिवेश

अस्मिता

अविद्या के भाव,

सारे सम्बन्ध

निर्मित किए जो

मानव ने,

बांधने को तुझे

चलाने को

निश्चित पटरी पर,

कैसे आएंगे

नए स्टेशन इस पर,

बना पटरी अपनी,

कोई न रहे साथ,

न ठहरें कहीं

लम्बी अवघि तक,

न रोक सके

आंधी, बरसात,

मान ले जाना है

ससुराल, अकेले

दुल्हन बनकर

सदा के लिए,

न लौटने के लिए,

आ लौट चलें

रे मनवा मेरे!

फूल आए मार्ग में

सूंघ लेना बस,

तोड़ मत लेना

बढ़ जाना आगे,

फल भी होंगे

मीठे-खट्टे

लगी होगी भूख भी,

सामने रख राम का

बनवास,

खाना बस

शबरी के हाथ।

तेरे थक जाएं

पांव कहीं

कर लेना विश्राम

देखकर छांव

बड़े पेड़ की,

होना नहीं सवार

किसी रथ पर

भले ही सारथी हो

कृष्ण!

चलना तुझे ही है

अकेले,

न पत्नी, न संतान,

धर्म का मार्ग भी

छूट जाएगा,

मंजिल पर,

पार करना है

विज्ञान-मय

आनन्दमय कोश

तुझे संकल्प से

यही साक्षात्कार

तेरा-तुझसे!

ध्यान रखना

मेरे मनवा

शक्ति ही बनाएगी

शक्तिमान तुझको,

अंग बनेगी तेरा,

अत: जरूरी है

परिचय उसका,

ताकि कर सके

विकास उसका

भिन्न-भिन्न रूप में।

हर देवता की

होती है शक्ति

अपनी-अपनी,

एक देव हैं, बस

सत्यनारायण,

बिना पत्नी के।

देवता को भी

जानना है

शक्ति के साथ,

बिना विष्णु के

काम नहीं आएगी

लक्ष्मी अकेली,

बना रहेगा

शक्तिमान जीवन भर

अपने अहंकार में।

तुष्ट रहेगा सदा

स्थूल भाव से

माया के।

धन-सत्ता-शक्ति

आकर्षित करती है

सुरा-सुन्दरी को,

सत्ता के पर्याय हंै

ये दोनों,

उसमें भी सुन्दरी

स्वयं माया

अपने सम्पूर्ण वैभव में,

कैसे हार सकती है

हराने वाली

मधु-कैटभ को,

चंचल मानव से!

निकल नहीं सकता

बाहर तमोगुण से,

अंधकार से,

बहना हीे पड़ेगा

उसे तो

इस प्रवाह में

नीचे, बहुत नीचे।

कर प्रणाम माया को

जहां देखें,

कर प्रशंसा उसकी,

सौन्दर्य की,

उस ईश्वर की

जिसने बनाया उसे,

और लौट आ

भीतर फिर से,

अच्छा होगा

न निकले बाहर

उसे देखने को,

इच्छा हो जाएगी

उसे छूने की,

वही पाप है,

तेरा कर्म है

कर्ता भाव है,

देखने तक

पूजा थी ईश्वर की

अब अपेक्षा हो गई

सुन्दरता से,

बाहर उभर आई

वासना मन की,

छूट गया मन का

साक्षी भाव,

गिर पड़ा नीचे।

कोई बात नहीं,

खड़ा हो जा

पुतला है गलती का

आदमी,

मांग ले क्षमा

आत्मा से अपनी,

ईश्वर से

जो बैठा है भीतर,

जिसने दी सुन्दरता,

जिसने जगाई वासना,

दिया फिर झटका

योग मार्ग का,

करने को प्रायश्चित,

पूर्ण करके

खण्डित मन को,

आ लौट चलें

रे मनवा

वासना से

भावना तक,

साक्षी होकर,

ऊध्र्वमार्ग में,

करके प्रणाम

उस माया भाव को

जो आई थी

कहने तुझको-

‘हे आयुष्मन,

अर्जन किया है

आपने दिव्य भोगों का,

अपने सद्गुणों से,

हम तरस रही हैं

बिखेरती सुन्दरता,

सौरभ-संसार को

आपके दर्शन को

सभी सुर बालाएं।

आभा जडित हंै

आपके दिव्य अंग,

हम हंै रसायन

करने को दूर

जरा और जीर्णता,

अमृत रूप,

स्वीकारिएगा,

प्रतीक्षा है हमें

आपके

कृपा कटाक्ष की।’

लौट आ मन मेरे,

ताकि न पड़े

कोई नई खंूटी

तुम्हारी देह पर।

जो दिख रहा

स्थूल दृश्य, उसका

कारण सूक्ष्म अदृश्य है,

है वह भी माया

तू जानेगा कैसे

उसके त्रिगुण,

क्यों आई सामने तेरे

क्या इरादे लेकर,

तेरा तो नहीं

कोई इरादा,

किन्तु ठहरा तो

निहारता रहा तो

चिन्तन किया तो

बाहर जाकर

छुआ उसको,

समझ इस द्वन्द्व को,

कौन पार पाया,

क्या कहती है

बुद्धि तेरी, सुन

कहां उछलता है

तोड़ने को सेब

किसी बाग की,

कच्ची निकली तो,

पड़ गई गले तो

उम्र भर के लिए,

माली ने मारा तो,

क्या पाया-क्या खोया,

देख अद्वैत इसमें,

तू ही बैठा है

उसके भीतर भी,

तू ही कर रहा

उसको प्रेरित,

निकाल खूंटी

रे मनवा मेरे

कर दे समर्पित

उसको ही।

 

कभी सुना है

तूने, रे मन

तोड़ते मर्यादा,

करते अतिक्रमण,

फिर तू क्यों

अकेला ही लांघता

लक्ष्मण रेखाएं

प्रकृति की,

क्यों करता है

संहार दूसरों का,

क्यों त्रस्त हैं

तुझसे ही

अन्य प्राणी जगत के?

तूने भी सुना होगा।

श्रेष्ठतम है मानव

इस सृष्टि में,

ऋषि कह गए हंै-

‘सर्वेश्वर परात्पर ब्रह्म

की विभूति लक्षणा से

महिमा मण्डित महामहिम

बने हुए,

ज्ञान-क्रिया-अर्थ-शक्तियु

द्युलोक अघिष्ठाता इन्द्र

अन्तरिक्ष अघिष्ठाता

हिरण्य गर्भमूर्ति वायु

पार्थिवलोक अघिष्ठाता

विराट भूति अगिA है

सर्वश्रेष्ठ।’

अनेक ऋषियों ने

दी उक्तियां अपनी

श्रेष्ठता के लिए।

‘परमेश्वर के साथ

जो हो सके

एकाकार, अद्वय

सालोक्य, सामीप्य,

सारूप्य, सायुज्य

भावों द्वारा,

वैसा प्राणी विश्व में

मानव ही एक है।

ईश्वर की शक्तियों

वाला यह मानव

केन्द्रस्थ प्रजापति

शाश्वत ब्रह्म(मनु)

आत्म-प्रतिष्ठा से

सर्वश्रेष्ठ है।’

तब क्यों करता है

अतिक्रमण ?

विद्या-अविद्या से

परे है ईश्वर।

सारी विभूतियां

ईश्वर की साथ हंै

मानव के

ईश्वर अंश जो हैं,

और वो भी है

जो नहीं है

ईश्वर में अविद्या

अस्मिता, आसक्ति,

अभिनिवेश(क्लेश)

कर्म-विपाक आशय,

आसुरी विभूतियां-

ईष्र्या-दंभ-मद-

मात्सर्यादि भरी है

मानव में।

स्वतंत्र है पुरूषार्थ

मानव का,

करता है इसका

दुरूपयोग और

निकल जाना चाहता

आगे ईश्वर से,

इसीलिए तोड़ता है

मर्यादाएं ईश्वर की।

भूलकर प्राकृत भाव,

सत्य-सनातन-नियम

ईश्वर के

बना लेता अपने

काल्पनिक नियम

ठीक विपरीत इनके,

और बंधकर इनके

व्यामोह पाश में

कर बैठता है

अतिक्रमण।

बुद्धि गर्व के कारण

(बुद्धिविमोहन के कारण)

हो जाता है उसका

आत्म स्वरूप व्यामोहन।

बन जाता है मानव

गतानुगतिक

होकर आकर्षित

भावुकतावश

मनोवशवर्ती मानव

करके अन्धानुकरण

इस प्रवृति से

होना स्खलन का

अतिक्रमण ही है

मानव स्वरूप का

भोगता है दुष्परिणाम

इस अतिक्रमण के,

भले न करे

अभिव्यक्त मुंह से,

करता है अनुभूत

सदा अन्त:करण में

किन्तु मोहवश

पद-प्रतिष्ठा-व्यक्तित्व

पाशबन्धन के,

रहता है मौन

किन्तु छूट नहीं

सकता विस्फोटन से,

नहीं कर सकता

अपना परित्राण।

आत्म-स्वरूप से

जो अभिव्यक्त है

सर्वात्मना,

वही ‘मानव’ है।

जो भाग भू-पिण्ड का

आता है मानव में,

बनता वह शरीर है।

तेरा जनक, रे मन

चन्द्रमा है।

तुझे घेरने वाली

बुद्धि, आती है

सूर्य से,

और जो अंश

नहीं होता व्यक्त

वही आत्मा है

‘मनु’ है

प्राणमूर्ति है।

आत्मा होती है

जड़ में-चेतन में,

किन्तु नहीं होती

इन्द्रियां,जड़ में।

न गति न विकास।

इन्द्रियां बहिज्ञाüन हैं,

बाहर ही देखती हैं।

नहीं पकड़ सकतीं

सत्य को ,

तब कैसे बोले

सत्य?

क्यों पड़े हैं पीछे

शास्त्र सारे, इसके।

सत्य को जानने

समझने को चाहिए

विज्ञान दृष्टि,

प्राण विज्ञान,

यही बनाता शनै: शनै:

बुद्धि को

सत्यानुगामी।

तू नजदीक है

रे मनवा

आत्मा के,सत्य के,

यदि हो जाए

एकाकार तो

पूरा होता है

प्रत्येक संकल्प।

किन्तु हावी हो

बुद्धिमानी या

मनमानी,तब

तब निश्चित है

अतिगामी।

बुद्धि आगAेय है

विकासवादी है

सूर्य से आती है,

चान्द्र मन सौम्य है

श्रद्धा है,शीतल है।

अगिA- विश्वास-

आगAेय पुरूष है,

सोम-श्रद्धा

शान्त-स्नेह रूप

संकोचात्मक स्त्री है।

मानव समाज का

स्वरूप संरक्षण है

दोनों के ही

समन्वय में।

जब कभी भी

किसी भी कारण

हो जाते हैं दोनों

विभक्त,

तब करने लगते

अतिक्रमण दोनों ही।

शिक्षित समाज

बुद्धि के दंभ पर

कर रहा मनमानी,

जीवन स्वच्छन्द

समाज मर्यादाहीन,

चारों ओर आक्रमण

प्रकृति सहस्र पर,

आक्रान्त जीवन

आ लौट चलें

रे मनवा मेरे

आत्म-सत्य में।

 

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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