Gulabkothari's Blog

जनवरी 26, 2013

शब्दों के पार

विश्व में चारों ओर शिक्षा की लहर चल रही है। मजे की बात है कि किसी को ‘शिक्षा’ शब्द का अर्थ भी जान लेने की जरूरत नहीं लगती। जानते ही तो समझ में आ जाएगा कि आज शिक्षा कहीं दी ही नहीं जा रही। जिस प्रकार धर्म का स्थान रिलिजन ने ले लिया, वैसे ही शिक्षा का स्थान एजुकेशन ने ले लिया। एजुकेशन का एक ही लक्ष्य है नौकरी प्राप्त कर लेना।

अपना पेट भरने के लिए जीवन किसी और के गिरवी रख देना। पूरी उम्र अपने लिए जी नहीं पाना। क्या यह कम आश्चर्य है कि सृष्टि का श्रेष्ठतम प्राणी अपना पेट भरने के लिए शिक्षित होना चाहता है, मां-बाप की उम्र भर की कमाई खर्चता है और अन्त में जीवन के बीस-पच्चीस वर्ष झोंक देता है। फिर उम्र भर के लिए किसी का नौकर बनकर जीता है। अपनी स्वतंत्रता खो बैठता है तथा पराधीन हो जाता है। जबकि शिक्षा स्वतंत्र रहकर जीना व स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना सिखाती है। सृष्टि की 84 लाख योनियों में अधिकांश की उम्र भी 20-25 वर्ष नहीं होती।

 

 

दूसरी बात यह है कि हमारा देश पुरूषार्थ प्रधान जीवन शैली का समर्थक है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष ही हमारे बुद्धि, शरीर, मन और आत्मा के धरातल का रूप है। शिक्षा में ये चारों धरातल समाहित रहते हैं। एजुकेशन में अर्थ (भौतिक पदार्थ) की ही प्रधानता है। शारीरिक सुख प्रधान लक्ष्य है। इसी से हमारी ज्ञानेन्द्रियों से जुड़ा मन भी सम्बन्ध रखता है। यही कामनाओं का केन्द्र है। एजुकेशन में धर्म एवं मोक्ष का पक्ष, जीवन का अर्धाग पूरा ही बाहर निकल गया। तब पूर्ण व्यक्तित्व तो कभी तैयार हो ही नहीं सकता है। यह अपूर्णता ही एजुकेशन की गारण्टी है। जितनी अधिक उच्च शिक्षा व्यक्ति ग्रहण करेगा, उसके व्यक्तित्व की अपूर्णता गहन होती जाएगी।

 

जीवन विज्ञान के नाम पर स्थूल सृष्टि से जुड़ा रहेगा। धर्म का आधार कम हो जाने के कारण संवेदना, दया, करूणा के भाव कम होते जाएंगे। चौरासी लाख योनियों का जो अनुभव आत्मा के साथ जुड़कर आता है, वह कभी प्रकट ही नहीं हो पाता। पिछले जन्मों का ज्ञान, संस्कार आदि विकसित ही नहीं हो पाते। दबे रह जाते हैं। इसीलिए ध्यान में स्मृतियों को खाली करना सिखाया जाता है, ताकि नीचे दबा हुआ उभरकर बाहर आ सके। स्मृतियों का कारण शब्द हैं। भाषा होती है। देश-देश की अपनी कल्पना के अनुसार शब्द बनाए गए हैं, ताकि विषय को स्मृति में रखा जा सके। काल्पनिक होने के कारण शब्द कभी यथार्थ का चित्रण कर ही नहीं सकते। अत: व्यक्ति जब तक शब्दों के पार नहीं निकल जाता, न तो वह स्वयं को पहचान सकता है, न ही विषय-वस्तु को। शब्दातीत ही प्रकाश की स्थिति है।

 

शिक्षा का एक अन्य प्रभाव है संयुक्त परिवारों का विघटन। नौकरी करनी है तो घर छोड़ना ही पड़ेगा। डिग्री और दे भी क्या सकती है। दे सकती तो देश में बेरोजगारी का यह हाल नहीं होता। संयुक्त परिवार का टूटना ही संस्कारों की विलुप्ति का कारण है। माता-पिता के पास समय नहीं होता। किसी युग में नहीं रहा। उनको नहीं मालूम कि बच्चों को क्या और कैसे पढ़ाया जाए। दादा-दादी के पास समय और  अनुभव दोनों होते हैं, किन्तु आज के मां-बाप को उन पर भरोसा ही नहीं होता।

 

सम्पूर्ण समाज संस्कार विहीन होता जा रहा है। जब शिक्षक स्वयं भ्रष्ट हो जाए, व्यापारी हो जाए, शिष्यों को ही निशाना बनाने लगे, अपचार तक करने लगे, तब शिक्षा के परिणाम क्या हो सकते हैं? जब शिक्षा में राजनीति प्रवेश कर जाए, सत्ता बल, धन बल का बोलबाला हो तो राष्ट्र धर्म के आंसू कौन पोंछेगा? आरक्षण ने देश की अखण्डता और एकता को ही जब जड़ से उखाड़ दिया, जब हमारे नीति-निर्धारक ही ध्वनिमत से देश एवं मूल्यों को खण्डित करने में व्यस्त हों, तब विद्या का स्थान अविद्या क्यों न ले ले। धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऎश्वर्य के नाम और अर्थ ही शिक्षा में नहीं रहे। अविद्या-अस्मिता-आसक्ति-अभिनिवेश फिर मानव सभ्यता को आपराधिक दानव सभ्यता में बदल रहा है। अक्रामकता, हिंसा, कट्टरवादी परिवेश इसी शिक्षा के परिणाम हैं। स्वयं के सुख के लिए हम किसी को भी कष्ट में डाल सकते हैं।

 

हमारी शिक्षा का सपना वसुधैव कुटुम्बकम् रहा है। एजुकेशन में व्यक्ति अकेला, स्वयं के लिए जीना सीख रहा है। दो पीढ़ी के बाद देश में कोई समाज बचेगा, कहा नहीं जा सकता। पश्चिम इसका गवाह है। विज्ञान और धर्म दोनों ही आज अपूर्ण हैं। धर्म को भी शास्त्रों से बाहर लाना पड़ेगा और शिक्षा को भी जीवन के सभी पक्षों से जोड़ना होगा। आज की शिक्षा तो शब्द-ब्रह्म का अपमान ही है। विनयशीलता की जगह अहंकार पैदा करती है। हम पिछले 64 सालों का इतिहास देख लें। शिक्षा स्वयं राजनीति का मोहरा बनकर रह गई है। जिनको शिक्षित होने का अवसर मिला, वे ही अंग्रेजीदां हो गए। वे ही शिक्षा नीति बनाने वाले, मंत्रियों को पट्टी पढ़ाने वाले। आज यदि देश त्रस्त है तो अनपढ़ों से नहीं, पढ़े-लिखों से त्रस्त है। सारे लोकसेवक मानव के प्रति पाषाण-ह्वदय हो गए हैं।

 

जड़ के पीछे भागते जा रहे हैं। इनकी मति भी जड़ ही मानी जाएगी। ईश्वर ने किन्हीं दो को एक-सा नहीं बनाया। शिक्षा तो सबको फैक्ट्री के माल की तरह एक सांचे में ढाल रही है। सबकी आत्मा स्कूल में ही मर जाती है। शरीर के आधार पर ही सौ साल पूरे कर जाते हैं। आहार-निद्रा-भय-मैथुन में। मानव देह में शिक्षा इसी पशुता को अभिव्यक्त करती है। देर तो बहुत हो गई है, किन्तु अब भी शिक्षा-व्यवस्था पर चिंतन कर आज की प्राथमिकता के अनुरूप आमूल-चूल परिवर्तन करना अनिवार्य है। इसके लिए अब एक मात्र आस बची है—युवा पीढ़ी, वही शिक्षा की उपभोक्ता है और वही बड़ा परिवर्तन लाने में सक्षम है।

 

उसको देश, समाज व स्वयं के सर्वागीण विकास की आवश्यकताओं का पुनर्अाकलन करके क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे। हमारे नेताओं-प्रशासकों को तो आज की अपूर्ण प्रणाली रास आ गई है। वे चाहते हैं कि देश के युवा जाति, समुदाय, बेरोजगारी, आरक्षण जैसे दायरों में सिमटे रहें। युवाओं को लोकतंत्र के तीनों पायों को यह दृढ़ता के साथ समझा देने की आवश्यकता है कि शिक्षा पहले व्यक्ति का चारित्रिक विकास करे ताकि वह केवल पेट भर कर बिना कुछ किए सौ साल पूरे न कर जाए। तब नर से नारायण बनना कौन सिखाएगा।

 

गुलाब कोठारी

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