Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 3, 2013

कन्या-1

कैसी स्थिति बन गई आज इस पूजनीय शब्द की। दुर्बल, निरीह और दया का पात्र जान पड़ता है। भारत आज पूरे विश्व में जाना जाता है तो या तो भ्रष्टाचार के लिए, या फिर कन्या भ्रूण हत्या के लिए। आश्चर्य की बात है कि देश में फिर भी नवरात्रि में कन्या-पूजन हो रहे हैं। शादियों में कन्या-दान हो रहे हैं। इसी देश में कन्याओं के साथ बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं। सरकारों द्वारा बेटियों की सुरक्षा के लिए अलग से योजनाएं तक बनाई जाने लगी हैं। मेरे ही समाज का अर्द्धाग अपने ही शेष अर्द्धाग पर आक्रमण करने लगा है। तब वह अर्द्धाग भी अपनी पूर्णता खो बैठेगा।

 

 

यही तो हो रहा है विश्व भर में। हमारा आचरण झूठे अध्यात्म पर टिका है। पश्चिम में शरीर भी भोग की भौतिक वस्तु बन गया है। हम सृष्टि का उद्भव ब्रह्म और माया के युगल तžव रूप से मानते आए हैं। ब्रह्म केन्द्र में रहता है, माया उसे आवरित करके स्वरूप प्रदान करती है। संसार भाव में इसे ‘योषा-वृषा’ का सिद्धान्त कहा जाता है। विज्ञान की भाषा में पदार्थ एवं ऊर्जा कहते हैं। शास्त्रीय रूप इनका पुरूष और प्रकृति कहलाता है। यह स्थूल सृष्टि का संचालन करता है।

 

पार्थिव प्राणी अथवा पशु भाव में नर-मादा कहलाते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश-ये पांच पाश हैं अविद्या रूप। पशु प्राण ही पृथ्वी लोक का अघिष्ठाता है। शिव पशुपति हैं। इनका स्वरूप अर्द्धनारीश्वर का बताया गया है। ऋक् -यजु-साम में ऋक् केन्द्र है और साम परिघि या स्वरूप। यजु एकमात्र गति या क्रिया प्रधान तžव है। इसमें भी दो धरातल होते हैं-यत् और जू। यत् स्थिर भाव का एवं जू गति का सूचक है। जैसे वायु और आकाश। आकाश विशाल भी है और ब्रह्म का विस्तार भी, किन्तु गतिमान नहीं है। वायु रूप माया ही आकाश स्थित ब्रह्म को आकृति, प्रकृति प्रदान करती है। यह यत् ही अर्द्धनारीश्वर है। केन्द्र ह्वदय अक्षर रूप और साम आकृति क्षर पुरूष है तथा दोनों ही स्थिर भाव में जान पड़ते हैं। गति ही शक्ति कहलाती है।

 

शक्ति का ‘श’ ऎश्वर्य सूचक है। ‘क्ति’ का अर्थ पराक्रम है। शक्ति ऎश्वर्य और पराक्रम देने वाला है। पराक्रम के द्वारा ही ऎश्वर्य प्राप्त होता है। यजु शक्ति का सूचक है। केन्द्र में ब्रह्म प्रतिष्ठा है और परिधि स्थूल परिणाम। केन्द्र और परिघि के मध्य सारी गति-क्रियाएं यत् और जू की ही हैं। कन्या का ‘क’ शक्ति सूचक है। पराक्रम (गति) तथा ऎश्वर्य (स्थिति) से जुड़ा है। ‘न्’ शून्य अर्थात ब्रह्म का द्योतक है। ‘या’ सम्पूर्ण या परिपूर्ण कला नियंत्रण का बोध कराता है।  कन्या का अर्थ हुआ ब्रह्म का नियंत्रण करने वाली शक्ति। ‘क’ और ‘ख’ विरोधाभासी व्यंजन हैं।

 

आकाश की संज्ञा ‘ख’ है। इसी से सुख-दु:ख बनते हैं। भीतर दहराकाश में। तब ‘क’ गतिमान वायु है। आकाश यदि सोम सागर है, तो ‘क’ अग्नि है। शक्ति सुप्तावस्था में ब्रह्म ही जान पड़ती है। ब्रह्म तब निष्कल होता है। कन्या निष्कल ब्रह्म की प्रथम कला भी है। यही स्थूल रूप में प्रकृति-पुरूष की कन्या होती है। ‘न’ शून्यता के साथ नाभि अथवा केन्द्र के अर्थ में भी आता है। गणपति भी इसका एक अन्य अर्थ है। कन्या का केन्द्र-ह्वदय-ही ब्रह्म की प्रतिष्ठा होती है। संसार की प्रत्येक स्थूल-सूक्ष्म गतिविघि नाभि पर ही टिकी रहती है। ज्ञान का भी पर्याय ‘न ‘ को ही माना है। ये सभी माया से आवरित रहते हैं। अत: प्रारम्भ अवस्था में कन्या शुद्ध प्रकृति रूपा होती है। उसके अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में पुरूष भाव सुप्त प्राय: जान पड़ता है, किन्तु आंखों में पूर्ण गतिशीलता बनी रहती है। गोद में रहने वाली कन्या भी हर छूने वाले स्त्री-पुरूष को छान लेती है।

 

अनेक बार वह चिन्तन में डूबी दिखाई देती है। किसी पेड़, पशु-पक्षी को टकटकी बांध निहारती रहती है। इसके बावजूद निरूक्त में यास्क ने कन्या शब्द की व्युत्पत्ति ‘तस्मै देया’ बताई है। इसका अर्थ है कि जिसके लिए माता-पिता को यह चिन्ता हो कि इस का परिणय किसके साथ हो। पुराणों के उदाहरण कुछ और कहते हैं। सीता जमीन से पैदा हुई और राम? द्रोपदी हवन कुण्ड से प्रकट हुई और  अर्जुन या पांच पाण्डव? अहिल्या बरसों पत्थर की बनकर पड़ी रही और राम कौन? राधा कभी कृष्ण के साथ नहीं रही, वृन्दावन भी नहीं छोड़ा, द्वारका में रानी नहीं बनी, तब कृष्ण का अंश कैसे और कृष्ण अच्युत कैसे? ये सारे मंत्र भाव के सूत्र हैं, जिनको खोलने पर सृष्टि के रहस्य जाने जा सकते हैं। इसके लिए बुद्धि नहीं प्रज्ञा चाहिए।

 

सारे पुराणों को, उनके कथानकों को विज्ञान के फार्मूलों की तरह खोलना होगा। तब पहली बात तो यह स्पष्ट हो जाएगी कि ब्रह्म शक्तिमान तो है, किन्तु क्रिया भाव नहीं है। जिसका पौरूष भाव बढ़ता चला जाएगा, उसका क्रिया भाव घटता जाएगा। रावण की तरह उग्र और उष्ण होता चला जाएगा। उसका गतिमान तžव घटता चला जाएगा। तब उपासना से श्रद्धा और समर्पण अर्जित करके स्त्रैण बनना ही पडेगा। सृष्टि ब्रह्म का विवर्त तो है, दिखाई माया देती है। ब्रह्म को अपने भीतर बन्द रखती है। प्रकृति में नर-मादा नहीं होते। दोनों पर सभी सिद्धान्त समान रूप से लागू होते हैं। स्वरूप भिन्नता का नाम ही सृष्टि है। उनमें समानता देखना ही दृष्टि है।

 

कन्या का एक नाम षोडशी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सोलह साल की है और सदा सोलह साल की ही रहती है। अव्यय, अक्षर, क्षर पुरूष की पांच-पांच कलाओं से युक्त है। यही तो आवरण हैं ब्रह्म के। षोडशी प्रकृति-माया से महामाया, महामाया से प्रकृति-रूप है। यहीं से नाम-रूप सृष्टि शुरू होती है। कन्या षोडशी है, किन्तु सृष्टि की शुरूआत नहीं बनती। किन्तु इसके पांच मुख प्रकट रहते हैं-चित्त्, निवृत्ति (आनन्द), इच्छा, ज्ञान और क्रिया। यही ब्रह्म की सृष्टि की ओर उन्मुखता है।

 

तंत्र में इसी को प्रकाश का विमर्श या स्पन्दना कहते हैं। प्राण रूप स्पन्दना ही प्रकाश की सत्ता है। इसमें चिदानन्द ब्रह्म या शिवभाव है। ज्ञान और क्रिया शक्ति है। शक्ति का षोडषी स्वरूप प्रत्येक जड़-चेतन में रहता है। सत-रज-तम के अनुपात भेद से सबका निजी स्वभाव भिन्न देखा जाता है। यही अभेद ब्रह्म का बहिर्मुखी विकास है। कन्या आत्म भाव में प्रतिष्ठित जीव है। नर-नारी दोनों में समान रहता है। माधुर्य और लालित्य की प्रधानता इस काल की प्रधानता है। विवाह में दोनों ही पक्षों की ‘कन्या’ प्रकृति का रूपान्तरण होकर पौरूष भाव का प्रवेश, अपेक्षा, आकांक्षा, संकुचन आदि बढ़ने लगते हैं।

 

आज चूंकि लड़की में भी संकोच का स्थान पौरूष लेने लगा है, अत: रजस्वला होने पर भी उसका प्राकृतिक स्पन्दन दबा रहता है। जीवन की शुरूआत दोनों में कन्याभाव-स्त्रैण-से होती है। प्रकृति के देश-काल के अनुरूप रूपान्तरण का काल है। ज्ञाता और दृष्टा भाव भी जिज्ञासा के रूप में दिखाई पड़ता है। दोनों ही कोरे कागज जीवन-यात्रा का मानचित्र बनाते रहते हैं। बालक का पौरूष भाव और बालिका का स्त्रैण मुखर होता जाता है। अविद्या के आवरण प्रकट होते जाते हैं।

कन्या आधार भूत स्वभाव है। दोनों ही जीव समान रूप से विकास पाते हैं। कन्या रूप की परिघि के बाहर बालक में बुद्धि का तथा बालिका में मन का विशेष विकास होने लगता है। एक उष्ण, दूसरा शीतल।

 

शास्त्रों में ‘पुरूष’ शब्द से नारी को बाहर कर दिया और ‘कन्या’ शब्द से नर को। तžव रूप गुणों को शरीर बना दिया। विवाह में कन्यादान वधु पर लागू हो गया। दर्शन शास्त्र के विद्वान कलानाथ शास्त्री का कहना है कि वेदों में कहीं भी ‘कन्यादान’ का उल्लेख नहीं है। तब समझ में आता है कि बुद्धि कहां तक अनर्थ कर सकती है। लगता तो यह भी है कि कन्या काल प्रारब्ध काल ही होता है। भोग काल ही होता है। इसके बाद ही स्व-प्रेरणा के कर्मो की शुरूआत होती है, जिनके फलों के लिए स्वयं वही जिम्मेदार होता है।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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