Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 10, 2013

रे मनवा मेरे! 12

तेरे साथ रहते हैं
ईश्वर सदा
और तू बेखबर,
कैसा पागल है
रे मनवा मेरे,
ढूंढ ओर –
चारों ओर
बाहर ही बाहर,
इतनी बड़ी हस्ती,
राष्ट्रपति से भी बड़ी,
देवताओं से बड़ी
चमत्कारियों से भी,
यहां से भी बड़ी,
बैठी हो पास
और न हो आभास?
ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र
सब उसके दास,
तू अभागा
डूब रहा चकाचौंध में
कांच के टुकड़ों की,
नहीं पहचान पाया,
नहीं कर पाया
भेद हीरे में,
फंसता गया
नकली में,मोह में
राग-द्वेष,ईष्र्या में,
भूलकर अपना धर्म
प्रेम का,संवेदना का
आ लौट चलें
पीछे मुड़कर
ईश्वर के पास।
चल कर संकल्प
“ढूंढूगा ईश्वर को
अपने ही भीतर
ईश्वर के सहारे से।”
जो मिलेगा
मानूंगा उसे ही
ईश्वर अंश
मेरे जैसा ही,
झुक जाऊंगा यदि
हुआ बड़ा मुझसे
श्रद्धा भाव से,
मुश्किल जरूर है
पानी का बहना
ऊपर की ओर।
इसीलिए मानव मन
बहना चाहता है
नीचे की ओर
सहज भाव से,
बिना प्रयास के
बस प्रवाह में,
तू भी तो
करता रहा है
सारे आक्रमण
छोटों पर
कमजोरों पर,
शिकार भी सदा
किया जाता है
निर्बल,असहाय का,
जबकि उनका तो
अधिकार है
वात्सल्य पर।
हम होते हैं क्रूर
सदा अबलाओं पर
डरते हंै सबल से,
घिग्गी बंध जाती
असुरों के आगे,
फिर भी डराते हैं
छोटों को,
वाह रे मन
कर संकल्प आज
लौट आएगा भीतर
जब भी आए क्रोध
इच्छा हो आक्रमण की
किसी कमजोर पर
तुष्ट करने को
अपना अहंकार।
इसके बिना तू
न झुक पाएगा
कभी श्रद्धा से
बड़ो के आगे,
न दे पाएगा
मित्रगणों को,
कौन करेगा विश्वास
तुम पर,बता मन,
कैसे निभेगा साथ
दु:ख-सुख में,
कैसे मिटेगा भेद
छोटे-बड़े का,
यहां छोटा-बड़ा नहीं
कौन पिता-पुत्र सा,
दोनों समान हैं
समान धरातल पर।
सभी प्रेम रूप हैं
श्रद्धा-वात्सल्य-स्नेह,
भावों की तरलता है
मन के पात्र में,
प्रेम का छलकता
रस है,इसीलिए
कठिन है इसका
बहना ऊपर की ओर।
पुत्री-पुत्र का
माता-पिता की ओर,
सहज है निम्न गति
पिता से पुत्र की ओर।
शिष्य से मिलती
है श्रद्धा
जब वह आता है
स्वयं गुरू भाव में।
जानता है न रे
तू-श्रद्धा का रूप
प्रभाव इसका
मनवा मेरे,
फिर क्यों आता नहीं
झुकना तुझको,
किस बात का
है अहंकार,
निवृत्त-काम से,
उम्र से सठिया गया
बाल हो गए
सफेद तेरे,
बल नहीं निकले
जल गई रस्सी
आ लौट चलें
श्रद्धा संग वन में
जानता है रे
मनवा
श्रद्धा के बारे में,
यही एकमात्र रस है
ब्रह्माण्ड में,जो
सूख जाए यदि,
अभिभूत हो जाए,
तब मुश्किल है
हरा हो जाना
जीवन में इसका।
संसार की लगभग
सभी विभूतियां
पुन: लौट आती हैं
विलुप्त हो कर,
सिवाय श्रद्धा के।
तब खो बैठता है
उसका मानव स्वरूप।
श्रद्धा जल तत्व है
सोममयी है,
पैदा करता है इसको
सूर्य किरणों का पुंज,
इकट्ठी होती हैं
चन्द्रमा में और
जुड़ जाती हंै
हमारी पृथिवी से,
“विश्वास” रूप में।
श्रद्धा अंश होता है
आत्मा का
और हो जाता है
स्थापित दूसरे में,
अन्य आत्मा में,
दूसरे का होकर
“श्रत” बनकर
सेतु रूप जोड़कर
दोनों आत्मा को।
पितर और संतान
जुड़े रहते हैं
इस श्रत सूत्र से,
और निमित्त बनते हैं
श्राद्ध कर्म के।
यह श्रद्धा ही है
स्नेह मित्रता का,
समानता का,
यदि दिखाई पड़े
स्नेह असमान में
तब मान लो
काला है दाल में।
छल कर रहा है
कोई स्वार्थवश,
सच्चा मित्र तो
काफी है एक ही।
प्रेम होता है
जड़ से भी,
मकान से,वस्त्रों से,
गहनों-कारों आदि से,
इनसे भी चिपकता
तू ही,जैसे हो
चेतन प्राणी कोई,
“काम” कहते हैं
जड़ से प्रेम को,
जाता है यह तो
वस्तु के ही साथ।
तेरा लक्ष्य हो
एक रे मनवा
करना सबको प्रेम,
निस्वार्थ
बिना अपेक्षा भाव,
अपने-पराए को,
बनना सहायक
उन सबका,
जीवन विकास में
ऊध्र्वगामी होने में।
बिना मांगे कुछ
बदले में,
मां की तरह,
नहीं होता लेना
प्रेम में,
देना ही देना,
कब याद किया
इतिहास ने
लेने वाले को,
आ लौट चलें
मनवा मेरे
वहां
जहां बहती हैं
नदियां श्रद्धा रस की,
लगाएं डुबकियां
कर सकें परिष्कृत
कुछ बन्धन
स्थूल जीवन के।

गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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