Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 17, 2013

कन्या-2

मेरे एक पोती है-आद्या। चार साल की हो गई। जब वह अवतरित होने को थी, तब अचानक मेरा तन-मन तरंगित होने लगा। होने के बाद तो मानो मन कुछ और ही गाने लगा। क्या यह कन्या होने का कमाल था? नहीं! मैं पूरे वर्ष भर उसको देखता रहा, थिरकता रहा। उसकी निर्मलता, स्वातं˜य, आह्लाद सब कुछ दिव्य था। कोई उसके किसी क्रम को बाधित नहीं कर सकता था। उसकी हाजरी में खड़े रहकर, उसके खिलौने बनकर, उसे प्रसन्न रखने को सदा तत्पर रहते थे। किसी मन्दिर में, नवरात्र या किसी धार्मिक अनुष्ठान में, हम यही सब तो करते हैं। किन्तु इतने स्पन्दित एवं रोमांचित नहीं होते।

मैंने पूरे वर्ष भर प्रकृति से जुड़े देखा। पेड़ को टकटकी बांधकर निहारते तो कई बार देखा है। क्या उसके किसी पिछले जन्मों का कोई साथी था। क्या उसकोे कोई संगीत अटकाए रखता था। जीव जन्तु, हवा-आग-पानी उसके श्रेष्ठतम खिलौने थे। शनै: शनै: मिट्टी भी जुड़ गई। भौतिक जगत से कोई सम्पर्क नहीं, उसके स्वरूप को लेकर धीरे-धीरे जिज्ञासा बढ़ती गई। जब तक शब्दों का उच्चारण शुरू नहीं हुआ उसकी दिव्यता ज्यों की त्यों बनी रही।

यह दिव्यता मूलत: स्त्रैण भाव ही है। यहां यह लिखना उचित ही होगा कि जीवन के उत्तर काल में वानप्रस्थ आश्रम से ही व्यक्ति स्त्रैण का भक्ति या सेवा रूप में अभ्यास करने लगता है। माया के द्वारा ही माया के आवरण हटाए जा सकते हैं। विद्या भी माया है और अविद्या भी माया है। अर्द्धनारीश्वर में स्त्रैण का घटना नए जन्मों का मार्ग प्रशस्त करता है और स्त्रैण का बढ़ना मोक्ष मार्ग या ऊध्र्व मार्ग की ओर बढ़ाता है। संन्यास आश्रम तो शुद्ध स्त्रैण काल ही होता है। माया से शुरू हुआ जीवन, माया से ही मोक्ष प्राप्त करता है।

पुरूष कत्ताü नहीं है। सम्पूर्ण जीवन माया का स्टेडियम है। इसी को समझकर जीना शिक्षा का उद्देश्य है। शिक्षा का पहला उद्देश्य है व्यक्ति को क्षमतावान् बनाना, ताकि वह पुरूषार्थ-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-को लक्ष्य बनाकर जी सके, उनसे जूझ सके। भले-बुरे अथवा हित-अहित में भेद कर सके। आस्थावान बन सके। अन्तिम काल में शान्ति में स्थापित हो सके। यह सारा स्त्रैण भाव का ही विस्तार है। सम्पूर्ण जीवन माया ग्रसित है। इसके अलावा कुछ अन्य है ही नहीं।

भारतीय दर्शन में कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि जो कुछ भी है, वह माया का ही क्षेत्र है। माया के समुद्र में सौ साल जीने वाला जीव कैसे सूखा रहकर बाहर निकले, यह जीवन की बड़ी चुनौती है। इसी में प्रारब्ध का प्रवाह मिलता है, इसी में भविष्य के कमल खिलते हैं। खारे समुद्र में कमल का खिलना और जीवन में कामना से बाहर निकल जाना एक जैसा असंभव दिखाई देने वाला कार्य है।

अत: शिक्षा का आधार भी शून्य से नहीं शुरू होता। पहले बच्चे को स्वतंत्र रहने का अवसर दिया जाता है। इसमें वह अपने चारों ओर के परिवेश को देखता है, उसका आकलन करता है। स्वयं का स्थान तय करता है। घर के सदस्य उसकी विभिन्न अभिव्यक्तियों से उसके स्वभाव का तथा पिछले जन्मों के संस्कारों का अध्ययन करते हैं। यही अध्ययन भावी शिक्षा का मार्ग दर्शक बनता है। ताकि मानवीय गुणों का समावेश सदा समाहित रहे। यही स्त्रैण है। संवेदनशीलता है, मन के धरातल का पोषण है।

मनुष्य अपने कर्म फलों के भोगने के आधार पर पुनर्जन्म लेता है। भिन्न-भिन्न योनियों से गुजरता है। हर कर्म के बन्धन को स्मृति में साथ लेकर चलता है। जो जीव मां के पेट में छ: माह उल्टा लटका रहता है, सौ साल तक भिन्न-भिन्न मुद्राओं में जीता है, फिर भी उसकी स्मृति का कोई अंश लुप्त नहीं होता। यही उसका प्रारब्ध कहलाता है। उसका अतीत है, जो जीवन को एक कलैण्डर का रूप देता है। संस्कार ही समय के साथ जीवन का धर्म रूप बन जाता है। कन्या काल ही दूसरा संस्कार शिक्षा का काल है। इसका विषय परिवार-समाज होता है।

चूंकि काल में सत्व गुण की प्रधानता रहती है, स्त्रैण भावों से काल ओत-प्रोत होता है, अत: आनन्द काल होता है। इसमें कुछ जीव की पिछले जन्मों की आक्रामकता भी दिखाई देती है। इस आसुरी भाव का भी देवी मर्दन करती है। भाव तो दोनों ही माया के ही हैं। कुछ भाव पिछले जन्मों के प्रतिनिधि होते हैं, कुछ वर्तमान के। जीवन तो दोनों का सम्मिश्रण है। शिक्षा का उद्देश्य कन्या भाव में पिछला जन्म देखना, उसके ज्ञान के स्तर का, तम के आवरणों का, आत्मा के वर्ण का तथा भविष्य की आवश्यकताओं का भली-भांति आकलन करना है।

ताकि उसके आगे की शिक्षा दी जा सके। आज के जीवन से लगता है कि भीतर का आकलन ही बन्द हो गया। कन्या काल के कच्चे घड़े की घड़ाई का काम ठहर गया है। इसका कारण है कि शायद मां ने भी कन्या काल का उपयोग नहीं किया। कन्या में स्त्रैण भावों को स्थाई कर देने का नाम ही “स्त्री शिक्षा” है। यह कार्य तोे महिला विद्यालयों में भी नहीं होता।

स्त्री-पुरूष कहां-कहां भिन्न हैं, कहां-कहां समान रहने चाहिए, यह दृष्टि न तो स्कूलों में दिखाई देती है, न ही घरों में। इसी उम्र में मां-बाप भी बच्चों को सूचनाओं और जानकारियों से लाद देने प्रयास करते हैं। नई तकनीक से जोड़कर उस बचपन की हत्या करते रहते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का वाहक है। उसे यांत्रिक बनाने के सारे उपक्रम किए जाते हैं। मां-बाप और स्कूल का वातावरण उसे इंसान नहीं रहने देना चाहते।

ईश्वर ने किन्हीं दो लोगों को एकसा नहीं पैदा किया। न शरीर एक जैसा, न ही विचार और भाग्य। मां-बाप और स्कूल वाले निर्ममता से सबको एक जैसा बनाने का कार्य करते हंै। पढ़ाई के बाद फैक्ट्री के माल जैसे डिब्बे बनकर निकलते हैं। मां-बाप कितने खुश होते हैं कि बच्चा कितना रटकर तैयार हो गया। खुद को भूलकर दूसरों से आगे निकलना सीख गया है। जो विरासत पिछले जन्मों की लेकर पैदा हुआ है, वह लुटा चुका है और अपनी चेतना को जड़ बनाने का मार्ग पकड़ चुका है। ईश्वर का धक्का भले ही इसकी चेतना को कभी जाग्रत कर दे, वरना हमने तो उधर के दरवाजे सदा-सदा के लिए बन्द कर दिए हैं। दो साल का बच्चा स्कूल केवल कन्या भाव छोड़ने जाता है।

कन्या भाव को नारी शरीर के साथ विशेष रूप से इसलिए जोड़ा गया है, क्योंकि भावी सन्तानों में कन्या भाव की प्रतिष्ठा तो केवल मां ही करती है। वही माया शक्ति के कार्य-कलापों की वाहक है। कामना रूप है। कन्या में कामना नहीं होती। उसे देखकर किसी के मन में वासना जाग्रत नहीं हो सकती। आज जो पशुता का भाव समाज में दिखाई पड़ता है, उसका कारण भी मां ही है। उसने मानव देह में पशु को जन्म दिया है। उसे पेट में संस्कारित नहीं किया। जो जीव जिस शरीर से आया, वैसा ही कार्य मानव देह में सौ साल आगे भी करता रहेगा। वह तो बचपन से ही आक्रामक दिखाई पड़ेगा। जबकि कन्या काल मूलत: साक्षी काल है। संस्कारों के अनुरूप उसका मन प्राण-वाक् से भी जुड़ सकता है अथवा आनन्द-विज्ञान से भी। किन्तु शिक्षा का दबाव इतना हो गया कि जीवन में भौतिकवाद के बाहर कुछ रह नहीं जाता। व्यक्ति अपने मूल स्वभाव को न जान पाता है, न ही उसको जी पाता है। पशु की तरह नकली जीवन जीकर सौ साल पूरे कर जाता है।

गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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