Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 24, 2013

रे मनवा मेरे! 13

श्रद्धा
मन का विषय है
मन तक पहुंचने में
सहायक होते हैं
अन्नमय कोश
एवं प्राणमय कोश,
इनके पार ही हैं
शब्दादि विषय,
मनोमय कोश में।
शास्त्र कहते हैं कि
तुम प्रतिबिम्ब हो
अपने विचारों के,
जैसा सोचोगे,
वैसे ही हो जाओगे।
विचार भी पदार्थ हैं
खुराक है मन की।
शब्द ब्रह्म है,
नाभि से उठकर
आते हैं कण्ठ तक
बनता है “अ”स्वर,
अकारो वासुदेव:,
टकराते हैं मुंह में
बनते व्यंजन,
तब मिलकर
स्वर और व्यंजन,
बनती है वर्णमाला।
सारे शब्द, विचार
निर्मित करते हैं
मनोमयकोश को,
और हम हैं कि
उठा लेते हैं
विचार दीवारों से भी
शब्द संसार है
मनोमय कोश,
सारे शब्द,भाषा
निर्मित करती इसे,
परा,पश्यन्ति
मध्यमा और वैखरी
शब्द रूप में, वाक्
बनकर करती है
प्रभावित शरीर को।
स्पन्दन शब्दों के
कर देते हैं पैदा
सुगंध जल में,
यदि भावपूर्ण हो,
सकारात्मक हो,
प्रार्थना हो, और
विपरीत शब्दावली
भर देती है
दुर्गध जल में,
सीधा प्रयोग है।
शरीर में है
जल 70 प्रतिशत,
इसी में होगी
पैदा गंध,
शब्दों के अनुरूप।
बुरे भाव/ शब्द
कर देते हैं
रोग ग्रस्त शरीर को,
सारी इन्द्रियां भी
पकड़तीं मन को
बांध लेती हैं
आकर्षित करके
तुझे, मेरे मन।
कौन बता पाया
कारण आज तक
कारण उन रोगों के,
जो बने रहते हैं
पूरी उम्र हमारे
इलाज होता नहीं
कभी जिनका,
उत्तर नहीं देते
डॉक्टर जड़ का,
करते रहते इलाज
बढ़ाते जाते मात्रा
दवाइयों की
उम्र के साथ,
उनको भी हो
यदि यही रोग,
जान न पाएंगे
कारण इसका,
फिर कैसा इलाज,
दबाकर लक्षणों को
तत्काल
कर देते निहाल
मरीज को।
कौन पढ़ता है
मन की भाषा,
कौन सुनता है
मन की आवाज,
जुड़कर आत्मा से
देता है उत्तर
हमारे प्रश्Aों के,
देता है समाधान
हमारी शंकाओं को।
बिना बोले भी
सुन सकते हैं
मन की भाषा
आंखों से,
स्पर्श से,
आभामण्डल से
इंगित से
मुद्राओं से।
आप पहंुचा सकते
अपना संदेश
पास बैठे को
पीछे बैठकर भी,
शर्त यही है कि
आपको बोलना होगा
शरीर-बुद्धि से नहीं,
मन से।
तू कर सकता है
संभव हो पाया
ऎसा कभी तुम से
बता रे मनवा,
रह सकता है
तू कभी
वर्तमान में
देने को संदेश,
करने को सम्प्रेषण?
तेरे जीवन का लक्ष्य
सुधारेगा वर्तमान,
भटकता रहेगा
सारी उम्र वरना,
जब लक्ष्य नहीं
तब मार्ग कहां,
यात्रा कैसी
बिना मार्ग के
चले बिना कर लेंगे
पूरे सौ साल
खड़े रहेंगे
जहां पैदा हुए,
पता कहां चलेगा
जीने का
कर्म का, लक्ष्य का
इनका उत्तर है
वर्तमान में
हर क्षण में,
यदि पढ़ सकें हम,
कर सकें उपयोग
सार्थक भाव में
भविष्य के लिए।
रोक लो
अपनी चपलता को,
चंचलता को,
देख-सुन ध्वनि
स्पन्दन हर विषय के
इन्द्रिय के साथ,
बहना नहीं है
प्रवाह में,
क्या जरूरी है
विषय,
लाया है जिसे
इन्द्रिय ने
विष्णु प्राण ने
तेरे पोषण को,
सहायक होगा
तेरा लक्ष्य तक,
नहीं तो मोड़ ले
मुंह उधर से,
याद रखना है
संकल्प लक्ष्य का,
तोलना है
हर विषय को
इसी तराजू में
संकल्प की,
वही करना
वही देना
वही सुनना
वही छूना
वही गंध
वही रस
हर स्वाद में,
जो प्रेरित करे
लक्ष्य की ओर
अन्य अनावश्यक
छीन नहीं लें
वर्तमान तेरा।
बचाकर रखना
वर्तमान अपना
शत्रुओं से,
प्रमाद से
आलस्य से,
मित्रों के आग्रह से
कल्पना-संसार से
अभिनिवेश से
अस्मिता से
और सबसे जरूरी है
बचाना इसे
राग-द्वेष से
ममत्व से
अहंकार से,
इनकी तृष्णा
इनका अभाव,
इनका होना
सभी करेंगे कपित
तेरा वर्तमान,
टिकने नहीं देंगे
एक विषय पर,
कर नहीं पाएगा
तू धारणा,
ध्यान के लिए,
ठहर जाएगा यहीं
भविष्य तेरा!
जब खाता है
तू खाना,
कितने विचार
चलते हैं मन में,
“ये काम करना है
उससे मिलना है
उसे फोन करना है
वहां जाना है आदि।”
और निगलता है
भोजन को
अजगर की तरह
आक्रामक होकर,
कहां पता चला
क्या खाया,
मेल या बेमेल
किसने बनाया,
क्या कुछ संदेश
सुनाई दिया
बनाने वाले का,
नही ना?
बता फिर कहां था
तू
खाने की टेबल पर,
वर्तमान में?
हर जगह ऎसे ही
नहीं होता तू
अपने कार्य के साथ
वर्तमान में,
तब बता रे मनवा,
किस तरह बनेगा
भविष्य तेरा,
कैसे बन पाएगा
तू अपना
भाग्य विधाता?
देख उस बालक को
लौटा है अभी-अभी
स्कूल से,
कूद रहे चूहे
पेट में उसके
बैठते ही थाली पर
कहता है-
“आज दही नहीं ”
क्योंकि सुनता है
भाषा शरीर की।
खाते ही कहता है-
“तूने नहीं बनाई
यह सब्जी, मां?”
जी रहा है वह
नन्हा बालक भी
वर्तमान में
मनोयोग से
श्रद्धा से,
तब क्यों न बने
भविष्य स्वर्णिम
उसका?
आ लौट चलें
रे मनवा,
वर्तमान में,
जुड़े, उससे
जो करना है
अभी,
मानकर पूजा
ईश्वर अंश की

गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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