Gulabkothari's Blog

मार्च 3, 2013

कन्या-3

आज तो सूचना तकनीक ने बच्चों के सामने जानकारियों का पहाड़ खड़ा कर दिया। बच्चा उनमें पूरी तरह खो जाता है। हाथ में हम जैसे ही कोई खिलौना देते हैं,वह तुरन्त हमें छोड़कर खिलौने में खो जाता है। उसका जिज्ञासु मन भीतर की शक्तियों से परिचय नहीं पा सकता। हम शुरू से ही उसे खुद से दूर ले जाते हैं। स्कूली शिक्षा उसे फिर कभी अपनी ओर लौटने ही नहीं देगी। जो कुछ सीखकर आया,वह भूलना पड़ा। मन के सपने,जीव के मानव देह के लक्ष्य,मानव धर्म सब कुछ जीवन से बाहर निकल जाते हैं। शेष शरीर के रूप में पशु रह जाता है।

बस,आहार,निद्रा भय,मैथुन रह जाता है। शिक्षा आदमी को पशु भाव की ओर ले जाती है और मां-बाप प्रसन्न होकर हर साल केक काटते रहते हैं। मानव जीवन तो भाव प्रधान होता है,जो कि मन का धरातल है। स्त्री चूंकि सौम्या है,मन प्रधान है,कन्या का विकास स्त्रैण में ही देखा जाता है। उसी में सृष्टि का विकास निहित है।

वही फूल बनती है। समाज को सुगंध और पराग देती है। शिक्षा इन फूलों को विकास के नाम पर गंधहीन बनाती जा रही है,मानो कागज के हों। जो कन्या स्कूल जाने लगी,उसके संवेदना के स्पन्दन अगली पीढ़ी तक कैसे पहुंचेंगे? घर पर भी मां होम-वर्क के नाम पर अत्याचार करती दिखाई पड़ती है। जीवन की बातें,कहानियां,बोध कथाएं,लोरियां आदि के अभ्यास जो जीवन में रस भरते हैं,खो गए। इसका एक ही परिणाम हुआ। कन्या का स्थान नारी ने ले लिया। स्त्री वहां भी नहीं रहती। शिक्षित समाज मूल्यों की दृष्टि से स्वच्छन्द हो गया। संस्कार शून्य समृद्धि ने पशुता को ही बढ़ावा दिया। अपने लिए जीना रह गया।

लड़का-लड़की दोनों का ध्यान जिन्दगी से हटकर कैरियर-पेट भरने पर ठहर गया। लेना जीवन में प्राथमिकता बन गया। देने का भाव बहुत पीछे छूट गया। अपनों को देना भी कठिन लगता है। सम्पन्न लोग भी स्वभाव से अभाव-ग्रस्त हो गए। संवेदना का स्थान अतिक्रमण और आक्रामकता ने ले लिया। देना स्त्रैण स्वभाव है। पुरूष्ा विस्तार चाहता है-येन-केन-प्रकारेण। स्त्रैण के अभाव में नारियों में भी पुरूष भाव प्रवाहमान होने लगा। प्रकृति ने जिनको एक-दूसरे का पूरक बनाया,वे प्रतिस्पर्घी हो गए। शरीर से पूरक,मन-बुद्धि से प्रतिस्पर्घी। एक होकर जीने का मार्ग शिक्षा ने पूरी तरह से बन्द कर दिया। समाज कन्या-भाव शून्य हो गया। संवेदना शून्य होकर व्यक्तिवाद बढ़ता जा रहा है। वसुधैवकुटुम्बकम् में विश्वास उठता जा रहा है। मानवता तब कहां टिकेगी!

इस परिस्थिति कोे टालने तथा कन्या भाव को बनाए रखने के लिए ही नवरात्रि में शक्ति पूजन एवं कन्या-पूजन का विधान है। बिना कन्या के स्वरूप के संस्कारवान,मूल्य प्रधान समाज बन ही नहीं सकता। समाज की शक्ति नारी में ही निहित है। वही समाज का भी निर्माण करती है। मूर्तिकार है। बुराइयों को मिटाने की क्षमता-पुरूष को नारायण बना देने की दृष्टि उसके पास है। स्वयं पुरूष को अपनी शक्ति का भान नहीं होता। वही कामना से विरक्ति बनती है। पुरूष को बाहर से समेटती है। उम्रभर जीवन में कन्या भाव की उपस्थिति से ही यह उपलब्घि संभव है। इसके बिना पुरूष-शिला से टकराकर स्वयं नारी चूर-चूर हो जाती है। क्या पता उसे फिर से मानव जीवन मिले या नहीं मिले।

पिछले और वर्तमान जन्म के मध्य का परिवर्तन काल ही कन्या काल है। माया ने एक चोला उतारकर दूसरा पहनाया है। कार्यभार बदला है। माया सदा इस बात से चिंतित ही रहती है,कि कहीं ब्रह्म उसके हाथ से छूट कर स्वतंत्र न हो जाए। जबकि ब्रह्म स्वयं भी इस परिस्थिति से डरता है। वह मुक्त होना ही नहीं चाहता। “एकोहं बहुस्याम” उसका ध्येय वाक्य है। वह डर के मारे किसी न किसी योनि को पकड़कर उसमें प्रवेश कर जाना चाहता है। मोक्ष की अवधारणा में भी राजनीति हावी है।

जब पुरूष में पौरूष बढ़ता है,अग्नि की आहुति होती है,तब रौद्र रूप बढ़ता है। यही आगे चलकर आसुरी भाव में बदल जाता है। जबकि कन्या भाव स्नेह एवं माधुर्य का प्रतीक है। इसमें यदि पौरूष अधिक हो गया,तब पुरूषों के प्रति आकर्षण घट जाएगा। पुरूष भी इस ओर आकर्षित कम ही होंगे । çस्त्रयों की ओर आकर्षण बढ़ता ही जाएगा। दो महिलाओं का आपस में विवाह कर लेना इसकी पराकाष्ठा है। मन से सृष्टि विस्तार का भाव ही तिरोहित हो जाता है।

कृष्ण का बालरूप,घुटने चलकर माखन के लिए यशोदा के पास पहुंच जाना,ऊखल से खींचकर पेड़ों को उखाड़ देना,छकड़ा उलट देना आदि उनके भविष्य के संकेत ही थे। इस काल की लीलाएं हमें सृष्टि तžव को समझने में सहायक होती हैं।

आज तो शिक्षा इन सब भावों को आवरित कर देती है। मां-बाप और टीचर मिलकर बच्चों को ऎसी पटरी पर चढ़ा देते हैं,कि पूरे जन्म व्यक्ति लौटकर नहीं आता। घर-परिवार भी छूट जाता है। मां-बाप तक के काम नहीं आता। देश के क्या काम आएगा। जो अध्यापक स्वयं मूल्यों से समझौता कर लेते हैं,जो मां-बाप स्वयं बच्चों को अच्छा इंसान बनाने पर जोर नहीं देते,उस समाज का भविष्य समझ में आ सकता है। कहां तो पेट में अभिमन्यु के पैदा होने की कथा और कहां आज के बच्चों की मन:स्थिति कि मां-बाप की बात सुनी-अनसुनी कर देते हैं।

इसका कारण कन्या काल का जीव का अध्ययन है। मां-बाप गोद के अथवा छोटे बालक की उपस्थिति को शून्य या नगण्य मानकर चलते हैं। उनके आचरण का अधिकांश भाग,घर-परिवार का वातावरण एवं आपसी सम्बंधों का प्रभाव उस नन्हे जीव पर पड़ता रहता है। जब बच्चा पेट में उल्टा लटककर अभिमन्यु बन सकता है,मां के प्रयास से मानव बन सकता है,तब सामने आंख-कान के अनुभवों को कैसे भूल सकता है! उसका शरीर देखने में छोटा लगता जरूर है,किन्तु उसके आत्मा की उम्र तो लाखों बरसों की है।

वह भी चौरासी लाख योनियों से गुजरकर आया हुआ अमरत्व प्राप्त जीव है। आपके सच और झूठ को,पापों और पुण्ययुक्त कृत्यों का अर्थ भी लगाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह आपके उस व्यवहार का भी आकलन करता है,जो आप उसके साथ करते हो। आपके भू्रण हत्या करने के भावों तक को समझ पाने की क्षमता है उसमें।

आप उसके होने को कोसते हो,किसी अन्य का क्रोध उस पर उतारते हो तो वह भी सदा-सदा के लिए उसके मानस पटल पर अंकित हो जाता है। क्योंकि शुरू में तो वह जरा भी अभिव्यक्त कर नहीं पाता / पाती। बोलना शुरू नहीं होता। अत: सब उसकी स्मृति में जुड़ता जाता है। साथ में कई जन्मों की स्मृतियां भी होती हंै- उसके अवचेतन मन में- जो हमारे साथ उसका व्यवहार तय करती रहती हैं। आप मान सकते हैं कि कन्या काल- एक पक्षीय अभिव्यक्ति का समय,अपने भावी जीवन की नींव तैयार करने का मुहूर्त काल कितना महत्वपूर्ण होता है।

इसके बाद मां- बाप जो कुछ भी सिखाते हैं,उसको पहले अपने अनुभवों से काम लेने या नाप-तोलने का आधार बना लेते हैं। जब तक एक पक्षीय जीवन दिशा रहती है,वही कन्या काल है। लड़कियां संवेदनाओं में अधिक गहरी होती हैं। अत: प्रकृति उनको जल्दी जीवन-संग्राम में उतार देती है। लड़कों को परिपक्व होने में अधिक समय लगता है। एक लड़की- एक लड़के की तुलना में अधिक संकल्पवान होती है,जब कि लड़का विकल्पों में अधिक भटकता है। कभी भी माया के झपट्टे में आ सकता है। जैसे-जैसे लड़कियों में पौरूष बढ़ रहा है,वे भी झपट्टों का शिकार होने लगी हैं।

घर के बदलते वातावरण,स्वतंत्रता की जगह स्वच्छन्दता की मां- बाप के मन की छटपटाहट,झूठ के अनेक मुखौटे भी अपना प्रभाव जमाते हंै। कन्या काल का मन अत्यन्त निर्मल होता है। जैसा देखा,सुना अंकित हो गया। ज्ञान के साथ ही इच्छा पैदा हो जाती है। मन उधर भागने लगता है या प्रतिक्रिया करने लगता है। कन्या काल स्वजनों-परिजनों के बीच व्यवहार की भूमिका तैयार करने का काल है।

इसे दरगुजर करने का बड़ा मूल्य चुकाना पड़ सकता है। आप जैसा व्यवहार करेंगे,बच्चे उसी को ब्याज के साथ लौटाएंगे। आप चाहें तो उन्हें नौकरों के भरोसे छोड़ दें और चाहें तो टीवी के भरोसे छोड़ दें। चाहें तो पास रखे अथवा धन के अभिमान में कहीं दूर महंगे छात्रावास वाले स्कूल-कॉलेज में। श्रेष्ठतम बात तो यह है कि दादा-दादी के पास छोड़ दें। उनको मालूम है कि बच्चे को क्या,कैसे पढ़ाया जाता है। आपका निर्णय आपका ही भविष्य बनेगा। बालक भगवान रूप,अत: न्यायवान होता है।

गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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