Gulabkothari's Blog

मार्च 7, 2013

Women’s day special : Edit video of Patrika Group’s Chief Editor Gulab Kothari

The chief editor of Patrika Group Shree Gulab Kothari speaks about Women’s Day.

 

नारी नहीं, नारीत्व

आज सम्पूर्ण विश्व महिला दिवस मना रहा है। महिला को पुरूष से अलग करके देखे जाने का उत्सव है। महिलाएं सशक्तीकरण की मांग किससे कर रही हंै? पुरूष से ही तो? उसको अलग करके शक्तिकिसकी बनना है? पुरूष की तरह क्या महिला भी अर्द्धनारीश्वर नहीं है? क्या मानव की मादा का नाम महिला है? किस प्राणी के मादा नहीं होती? महिला की तो पहले ही शक्ति संज्ञा है। चूंकि वह नारीत्व के इस शक्ति स्वरूप को भूल बैठी, प्रकृति की इस मार को सहन नहीं कर पा रही है। वह अपने भीतर की स्त्री को भूल बैठी। शिक्षा ने उसे शरीर और बुद्धि तक ही ठहरा दिया है।

उच्च शिक्षा ने उसकी संवेदनशीलता, प्रेम और वात्सल्य, धैर्य एवं सहनशीलता जैसे गुण छीन लिए हैं। शिक्षित होने के बाद उसके पास एक ही विकल्प बचा है-लड़कों की तरह जीना, लड़कों की तरह सोचना, लड़कियों की प्राकृतिक जीवन शैली से दूर हो कर जीना। शादी-परिवार आदि क्षेत्रों में पश्चिम की जीवन शैली की नकल करना। जो वहां की महिलाएं आज भोग रही हैं, उन्हीं परिणामों को भोगने की तैयारी करते जाना।

प्रकृति ने नर-नारी में भेद नहीं किया। केवल शरीर भिन्न दिए, ताकि एक-दूसरे के पूरक बन सकें। अग्नि-सोमात्मक जगत की यज्ञ के द्वारा सृष्टि कर सकें। आत्मा के स्तर पर दोनों भिन्न नहीं हैं। कृष्ण का गीता में उद्घोष है-ममैवांशो जीव लोके, जीव भूत सनातन:।

सभी जीव उसी के अंश से उत्पन्न होते हैं। तब महिलाओं में शक्ति प्राप्ति का यह सारा चीत्कार क्यों है? क्या विश्व की सारी महिलाएं इस अभियान में साथ हैं? अस्सी के दशक के शुरू में मैंने अमरीका में “वुमन्स लिब” का अभियान भी देखा है। तब भी मुझे एक दैनिक पत्र की सम्पादक ने कहा था कि “न जाने कौन इस झण्डे को लेकर चल रहीं हैं। आगे जाकर इसका बड़ा नुकसान ही होगा।”

भारत शरीर का पुजारी नहीं है। आत्मा की पूजा करता है। कई जन्मों के सम्बन्ध निभाने एवं कर्मफल भोगने तथा ऋण चुकाने की शिक्षा देता है। स्वयं के लिए गृहस्थाश्रम तथा शेष जीवन मानवता के लिए त्यागने की उद्घोषणा करता है। बीज बनकर जमीन में गड़ जाने का मार्ग प्रशस्त करता है, ताकि बीज वृक्ष बन सके। समाज को फल और छाया मिल सके। बीज इनका स्वयं उपभोग नहीं करता। आज की शिक्षा स्वयं के लिए जीना सिखाती है। स्वयं के लिए केवल पशु जीता है।

उसके जीने का कोई लक्ष्य नहीं होता। मानव को धर्मयुक्त अर्थ-काम का जीवन मोक्ष प्राप्ति तक जीना होता है। शिक्षा शरीर (अर्थ) और बुद्धि के बल पर जीना सिखाती है। मन-आत्मा की बात नहीं होती। अत: जीवन की अपूर्णता का मार्ग खोलती है। शिक्षा का उद्देश्य अच्छे इंसान तैयार करना था। यह कार्य तो बन्द ही हो गया। अब यह बोझ हर बच्चे पर आ गया कि स्वयं अपने को अच्छा इंसान बनाए। आज शिक्षा केवल कॅरियर देती है।

विश्व महिला दिवस पर यह चिन्तन तो होना ही चाहिए कि दिवस नारी का मनाया जाए अथवा नारीत्व का! नारीत्व ही तो नारी की शक्ति है। फिर सोचें कि अलग से महिला शिक्षा क्यों? क्या आवश्यकता है महिला विद्यालय और महाविद्यालयों की? क्या हम अच्छी नारियां प्रस्तुत कर पा रहे हैं? नारी शिक्षा का एक ही अर्थ है-देश में सुसंस्कृत नारी तैयार कर सके।

नारी शरीर में स्त्रैण भाव (वुमन हुड) तैयार कर सकें। तभी समाज सुदृढ़ होगा, समाज की सांस्कृतिक छवि बन पाएगी, समाज आर्थिक विकास कर सकेगा। शिक्षा का उद्घोष है कि लड़के-लड़की में कोई भेद नहीं। बराबरी की बात, सुविधाओं तथा अवसरों की होती है, प्रकृतिदत्त कर्मो की नहीं। लड़कों की तरह जीने को तैयार कर रहे हैं।

इस अन्धी दौड़ में न अच्छी नारी बन पाएगी, न ही पुरूष बन सकेगी। स्वयं की कमजोरियों में लड़कों की भी कमजोरियां जुड़ जाएंगी। आज शिक्षित और विकसित नारी इसलिए कष्ट पा रही है कि उसमें नारीत्व का विकास घट रहा है। क्या महिला शिक्षा अच्छी पत्नी या मां बननेे की दिशा तय करती है? आज भी महिला शादी करके पति के साथ ही रहती है। क्या सौम्या अग्नि में आहुत होने नहीं आती? क्या आहुत होने पर सोम शेष रहता है?

क्या एक चरम पर पहुंचकर सोम ही अग्नि तथा अग्नि ही सोम नहीं हो जाते? इन प्रश्नों के उत्तर ही जीवन के स्वरूप का निर्माण करते हैं। स्थूल शरीर के कर्मो के द्वारा ही मानव सूक्ष्म और कारण शरीर तक की यात्रा करता है। महिला दिवस पर मानव के इस स्वरूप पर भी चिन्तन होना चाहिए। इसके बिना शरीर आधारित महिला-पुरूष अन्य पशुओं से भिन्न नहीं हो सकते। उनका जीवन भी आहार-निद्रा-भय-मैथुन से ऊपर नहीं उठ पाएगा। हमारे भी पशुओं की तरह जैविक (असंस्कारित) संतानें होंगी। मानव शरीर का उपयोग पशु जैसा ही होगा। महिला चाहे तो स्त्रैण (वुमन हुड) बनकर विश्व की संस्कृति एक ही पीढ़ी में बदल सकती है।

आज महिला दिवस के अवसर पर चिन्तन इस बात पर भी होना चाहिए कि आखिर यह दिवस किसके लिए मनाया जा रहा है? महिला के आधे महिला शरीर के लिए या पुरूष के आधे महिला भाग के लिए! जिन परिस्थितियों के कारण महिला आज दबाव में है, उनको महिला ही बदल सकती है। तब फिर दबाव स्वत: ही दूर होते चले जाएंगे। प्रश्न यह है कि क्या मुझे कॅरियर पूरा करके ही मर जाना है या खुद के लिए भी कुछ लक्ष्य पूरे करने हैं। कॅरियर तो महिला निभा सकती है, किन्तु दूसरे लक्ष्यों के लिए नारीत्व को प्रतिष्ठित करना ही पड़ेगा।

गुलाब कोठारी

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