Gulabkothari's Blog

मार्च 10, 2013

रे मनवा मेरे! 14

समझ ले रे
मेरे मनवा
तेरे हाथ है
सम्मान मेरा
सुख-दु:ख तेरा,
पूरा कर पाना
सपने तेरे,
प्रश्न यही है
तू कहां है
जाग्रत-स्वप्न
या सुसुप्ति में।
कितने पाल रखे हैं
पूर्वाग्रह तूने
अपने भीतर
किसे मानता है
सुख-दु:ख तू
क्या है अवधारणा
जीवन की तेरे
और कैसे हैं
संस्कार तेरे।
हर बार होता है
पैदा नया तू
हर इच्छा के साथ,
नए प्राण और
नया कर्म, नई वाक्।
क्या मानता है
तू जीवन को
एक नौका
एक अवसर
बनने का ब्रह्म
अथवा पर्याय
भोग करने का।
कितनी रखते हैं
अपेक्षा
जीवन से, रिश्तों से
कितना चाहते हैं
देना प्रेम से
अथवा मानते हैं
व्यापार जीवन का
लेने-देने का,
अथवा संयोग मात्र?
किसको मानते हो
सुख और दु:ख,
अच्छा खाने को
भिन्न-भिन्न देशों का,
ज्यादा खाना
होटल में खाना,
अपने स्वास्थ्य(मन)
की पुष्टि के लिए
या खिलाना
इष्ट मित्रों को?
किसे देखकर
मिलता है
सुख-दु:ख?
जानते हो
बुद्धिजीवी मन,
दु:ख और सुख
अच्छा और बुरा
भाव हैं केवल
भेद-दृष्टि के,
जैसे कि हैं
दायां-बायां
ऊपर-नीचे।
ये होते हैं
बस, मेरे होने से,
मैं नहीं तो
ये भी नहीं।
ऎसा ही मान लो
अच्छा-बुरा भी,
प्रकृति में नहीं है
अच्छा-बुरा कुछ,
जो जैसा है,
वैसा है।
किसी के लिए
हो सकता है
अच्छा, वही
हो सकता है
बुरा किसी
अन्य के लिए।
जैसे कि शराब
अच्छी पीने वाले को
और नहीं तो बुरी
नहीं पीने वाले को।
शराब, बस शराब,
नीम, बस नीम
मिट्टी, बस मिट्टी
काला, बस काला।
एक और बात
समझ ले तू
इसी जगह पर,
यदि तूने कहा
अच्छा किसी को,
तब नजर में
नहीं आएंगे
दोष उसके।
और कहा बुरा
तो दिखेगी नहीं
अच्छाई उसमें
गलत होंगे, निर्णय
दोनों के बारे में।
इसका अर्थ है कि
तू तैयार नहीं
बदलने को
समय के साथ,
जो बुरा था
तेरे लिए
एक साल पहले,
आज भी मानता है
बुरा उसको,
भई कमाल है
तेरी मूर्खता का!
क्या-क्या नहीं बदला
इस धरती पर
एक साल में
तू भी वही है
साल भर पुराना,
जो बुरा था वह
अभी भी है बुरा?
बदलना पड़ेगा
पुराना अनुभव,
आज का व्यवहार
अनुभव साल पुराना,
कैसे निकलेगा
सही रे मनवा
आ लौट चलें
वर्तमान में,
तब देख फिर से
उस बुरे को
और देख खुद को
उसी संदर्भ में
सुबह से शाम में
बदल जाते हैं
विचार-भाव,
शरीर के रसायन,
साल भर में
क्या बचा होगा
उसमें, तुझ में?
बदल जाता है
सब कुछ प्रतिदिन
और हो जाता है
पूरा शरीर नया
सात साल में।
मिल उस बुरे से,
आज फिर,
देख लगता है
कैसा वह
मत करना निर्णय
पहले से कुछ
तू रहना अच्छा
वह अच्छा लगे
बात कर लेना,
नहीं लगे अच्छा,
पकड़ा देना खूंटी
उसी के हाथ में,
मांग लेना क्षमा,
किन्तु कहना मत
बुरा उसको
वरना गड़ जाएगी
वही खूंटी फिर
तेरे भीतर ही,
बन्ध गया एक
नया बंधन
मुक्त होने की जगह।
प्रतिष्ठित हो जाएगा।
फिर से पूर्वाग्रह
उसके बारे में।
होता है यह सारा
अहंकार से
माया भाव से,
अपेक्षा भाव से,
तुम्हारे अपने हैं
माप-दण्ड नापने के
अच्छा-बुरा,
उसको क्या पता
इनका,
क्या पता किया हो
श्रेष्ठ व्यवहार उसने
अपनी समझ से,
क्या बदले हैं
तुम्हारे माप-दण्ड,
या बताया है
इनके बारे में
सामने वाले को
निर्णय पूर्व?
फिर कैसे की
तूने अपेक्षा
उससे
खरा उतरने की?
इसी का नाम
अहंकार,
जहां समझता है
स्वयं को महत्वपूर्ण
और दूसरे को छोटा,
लाद देता है
अपना अपेक्षा भाव
और सुना देता है
निर्णय एक पक्षीय
उसके बारे में।
यही आक्रमण है,
यही अतिक्रमण
अत: इसी से
होती भी है
निराशा अन्त में।
कटु सत्य है
जीवन का
तीन चौथाई
नाराजगी, द्वेष,
मनमुटाव होते हैं
अपेक्षा भाव से,
यही है पकड़
माया की जीव पर।
पूरा जीवन ही
बना रहता है
कुरूक्षेत्र
जीव और माया का
जो जीत गया
माया से
बन गया वही
महावीर ।

गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: