Gulabkothari's Blog

मार्च 21, 2013

करो या जाओ

भारत देश ज्ञान के क्षेत्र में जगत गुरू रहा है। हमारी विद्या की अवधारणा, वेद परम्परा, गीता आदि आज भी अपना महžव रखते हैं। यह भी सही है कि इनके स्थान पर अष्टांग योग अधिक लोकप्रिय हो रहा है। फिर यह देश सम्प्रदायोें का संग्रहालय जैसा बन गया है। हर धर्म के नाम पर अनेक सम्प्रदाय खड़े हो गए हैं। कुंभ का जो मेला अभी इलाहाबाद में लगा, वह सबसे बड़ा प्रमाण है।

देश में साधु-संतों की संख्या का अनुमान लगाया जा सकता है। कुंभ में जैन, बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम आदि मतावलम्बी तो थे ही नहीं। लाखों-लाख धर्म के रहनुमा इस देश में और सब जगह अपराधों में वृद्धि! क्या यह साधु-संतों की निष्ठा और दक्षता का सूचक है? तब इनकी सामाजिक भूमिका पर चिन्तन क्यों नहीं होना चाहिए? आखिर संन्यासियों का भार भी समाज ही उठाता है।

ये कौन से कमाने जाते हैं! इसके संरक्षण में एक ओर भ्रष्ट धनाढ्य पल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इनके पांव भी धीरे-धीरे राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं। राजनेता इनके समारोह की शोभा बनने लगे हैं। जमीनों, मन्दिरों, वक्फ बोर्ड सम्पत्ति जैसे हजारों मामले न्यायालय में धूल चाट रहे हैं, क्योंकि किसी को त्याग करना आता ही नहीं। संन्यासी किस लाचारी में बन बैठे, ये स्वयं जाने।

भोगों के प्रति विरक्ति आ ही नहीं पाई। आज तो हर सम्प्रदाय के बड़े गुरू राजा-महाराजा जैसे ही लवाजमे के साथ जीते हैं। संन्यास-त्याग-तप जैसे शब्द अपना अर्थ खो चुके। धर्म के नाम पर अनेक संतों ने, कथा-वाचकोे ने बड़े-बड़े ट्रस्ट बना लिए। इनके भोग की कहानियों को सुनकर सिर शर्म से झुकने लग जाता है। इनसे समाज के रूपान्तरण की क्या उम्मीद की जा सकती है!

धर्म का एक अन्य विकृत स्वरूप भी इतिहास से उभर कर आया है। सामन्ती युग में सीमाओं की सुरक्षा का भार स्थानीय अखाड़ों को दिया जाता था। इनको अस्त्र-शस्त्रों का प्रशिक्षण दिया जाता रहा था। युग तो समाप्त हो गया, किन्तु अखाड़े रह गए। कुंभ स्नान में लहराते हथियार उस परम्परा के ही अवशेष हैं।

वरना साधु के पास हथियार? इसमें अधिकांश अखाड़े गुरू गोरखनाथ के अनुयायियों -गिरी, पुरी, भारती आदि के थे और आज भी वैसे ही हंै। हां, इनकी अघोर पथ की, तंत्र की अपनी स्वतंत्र परम्परा भी रही है। आज दोनों परम्परा एक हो गई। ये साधु रूपान्तरण में भूमिका कैसे निभाएंगे?

सच्चाई यह है हर सम्प्रदाय चाहे कितना ही अच्छा दिखाई पड़ रहा है, पर्दे के पीछे मूल्यों को तिलांजलि देता जान पड़ता है। समाज के आध्यात्मिक विज्ञान की समझ एवं विकास की क्षमता खो बैठा। इसीलिए अपराधों का ग्राफ ही बढ़ रहा है। धर्म भी धन की झोली में है।

एक बार इतिहास करवट बदलना चाहता है। वेटिकन सिटी के नवनिर्वाचित/ नियुक्त धर्माचार्य (पोप) ने जिन परम्पराओं को तोड़ने का साहस कर दिखाया है, स्तुत्य है। इसमें वैभव को दरवाजे से बाहर धकेलने से शुरूआत की है। क्या यह हमारे संतों के चिन्तन एवं संकल्प करने या कि उनको पे्ररित करने के लिए काफी नहीं है? संतों, उठकर संकल्प करो! याद करो गंगा में लगाई डुबकियों को!! माटी आपकी भूमिका मांग रही है। साधु वाली भूमिका।

आपके सम्पूर्ण जीवन साधु जीवन को जिस समाज ने खड़ा रखा है, आज वह अपराधियों की चपेट में त्राहि-त्राहि कर रहा है। ऎसा न हो कि समय बीत जाए और देश आपको धिक्कारने पर विवश हो जाए। विशेषकर जबकि भोगवादी संस्कृति करवट बदलने को बेचैन हो और हम आत्मप्रशंसा में ही डूबकर रह जाएं!

जो व्यक्ति दशकोें से किसी सम्प्रदाय का अनुयायी है और अपराध भी कर रहा है, तब सम्प्रदाय की सम्प्रेषण शक्ति पर अंगुली उठेगी। बड़े-बड़े संत वर्षो से अपने-अपने समूह में लोकप्रिय तो हैं, किन्तु अपराध बोध आज भी समूह में है, क्योंकि सम्प्रेषण का धरातल भी व्यावसायिक होता जा रहा है। गुरू के चरण छूने हैं, तो लिफाफा नीचे सरकाना पड़ेगा। वह क्या रूपान्तरण करेगा अनुयायी का। तब नई पीढ़ी भी क्यों जाएगी उनके पास? तर्क की बात नहीं है। हर धर्म गुरू या संत को अपनी भूमिका का स्वयं आकलन करना चाहिए। कितनों को धार्मिक बनाया।

धर्म के लिए जीना नहीं सिखाना है। यदि नहीं बना सकते तो साहस करके चोगा बदल लेना चाहिए अथवा पहाड़ों पर जाकर तपें। गुरू का भी धर्म है कि यदि किसी शिष्य को प्रशिक्षित न कर पाएं तो उसे जनता पर बोझ बनाने के बजाय संन्यास से मुक्त कर दें। व्यसन करने वाले को साधु का दर्जा देना भी संन्यास आश्रम का अपमान है। वहां तो बस प्रेम हो, मिठास हो, साहस हो, बस!

गुलाब कोठारी

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