Gulabkothari's Blog

मार्च 24, 2013

रे मनवा मेरे! 13

रे मनवा मेरे

 

छोड़ना तो पड़ेगा

मोह को, तृष्णा को

एक-एक भाव को

प्रत्येक इन्द्रिय के

खाली करना होगा

तेरा भण्डार

स्मृतियों का

कल्पनाओं का

विषयों का

इन्द्रिय भोगों का

राग-द्वेष का,

एक-एक व्यक्ति का

अच्छा या बुरा,

प्रिय अथवा अप्रिय,

ये सारे ही तो हैं

आवरण तुझ पर

देखने नहीं देते

स्पष्ट रूप में

किसी को, और

देख नहीं सकता

कोई स्पष्ट तुझको

दो रूप होते हैं

मूलत: जीवन के

एक क्रिया रूप

दूसरा प्रतिक्रिया।

बाहर जाती हंै

इन्द्रियां क्रिया में

पकड़ने को विष्ाय,

फेंकती हंै खंूटियां

पकड़ने विषय को

देखा कोई दृश्य

और ठहर गई

दृष्टि

टिक गई आंखें

और मन प्रसन्न,

नहीं चाहता हटना,

अर्थात गाड़ दी

एक नई खंूटी

वहां मन ने,

बसा लिया दृश्य

भीतर कर लिया

अंकित सदा के लिए,

ढोता रहेगा मन

इस बोझ को

उम्र भर स्मृति में,

पल्ले पड़ा कुछ

मेरे मनवा?

यही विघि है

इन्द्रिय क्रियाओं की

सुनने की-छूने की,

पुनरावृत्ति की इच्छा

प्रमाण है कि

मन जुड़ गया है

विषय से,

हार गया है

उसका संकल्प

विषय के आगे,

आवरित हो गया

मन नई कामना से

वासना से

भावना से

सदा के लिए।

जब भी गुजरेगा

तू कभी

उस मार्ग से

दिखाई देगा

वही दृश्य तुझे

मृग तृष्णा जैसे,

चिपका हुआ सा

तेरी स्मृति में।

हो सकता है

खो जाए तू

नई कल्पना में

प्रतिक्रिया में,

क्योंकि कितनी भी

छोटी हो क्रिया

बहुत लम्बी होती है

प्रतिक्रिया उसकी,

जैसे गूंजती है

छोटी सी ध्वनि

कानों में बरसो

प्रतिध्वनि बनकर।

बदला रहता है

इसका स्वरूप भी

जैसे बदलता है

प्रतिबिम्ब किसी का

सुबह से शाम तक

छाया बनकर।

हर क्रिया बनती

एक बिम्ब, और

छोड़ जाती अपना

प्रतिबिम्ब

लादकर खंूटी

तेरे ऊपर,

रे मन!

खोलकर तो देख

सन्दूक स्मृतियों का,

वहां अब होगी

प्रतिक्रियाएं सबकी

व्यक्ति, विषय और

घटनाओं की,

क्योंकि जुड़ चुका

उन सबसे, तू

अत: रूपान्तरित

हो गई हैं

सारी क्रियाएं

ध्वनि नहीं है

प्रतिध्वनि है,

बिम्ब का प्रतिबिम्ब

अंकित है

तुझ पर, मनवा

चर्चा के साथ

किसी घटना की

व्यक्ति की

निकलेगी तेरी

प्रतिक्रिया ही

उसके बारे में,

क्रिया की खंूटी

जाती विषय पर,

प्रतिक्रिया लाती

विषय की खंूटी

गाड़ने मन पर।

कितनी क्रियाएं

कितनी प्रतिक्रियाएं

प्रतिदिन तुझ पर,

और उनकी, जो

जीते हैं तेरे साथ

उम्र भर,

उनके साथ तो

लाखों प्रतिक्रियाएं

हर एक के साथ

बरसों की,

भूल जाते चेहरा

देखकर सामने उनको

शुरू हो जाती है

कोई प्रतिक्रिया हमारी,

आक्रमण है यह

प्रतिक्रिया,

आवेश है इसमें

आवेग भरा है

प्रहार करते हैं

अहंकार बोलता है

गाल फुलाकर।

छोटे के आगे

देख सकते हैं

गोलियां शब्दों की,

बड़ों के आगे

छूटती मर्यादा,

टूटते रिश्ते

बराबरी के।

हां, होती हैं

प्रतिक्रियाएं

श्रद्धा युक्त भी

ममता भरी

बहाती अश्रुधारा,

टपकती करूणा

हर शब्द में,

कभी-कभी रूंध जाता

गला, जैसे

फंस गई हो ध्वनि

संकरी गली मे,

हो उठता विह्वल

मन

बहने लगता

द्रवित होकर,

चाहता है हो जाना

विरल

लीन हो जाना

विषय के साथ।

यही भक्ति है

क्रिया के साथ

विद्या-अविद्या की

मेरे स्वरूप की।

खो जाती है

समय के साथ

क्रिया

बनी रहती है

प्रतिक्रिया ही

पूरी उम्र तेरे साथ

मेरे मनवा।

आ लौट चले,

छोड़कर गांव

स्मृतियों का

लेकर विदा

एक-एक से,

फेंककर खूंटियां

स्थूल जगत की

बाहर को

मांग ले क्षमा

उन सबसे जो

विषय बने हैं

हमारी प्रतिक्रियाओं के

कर ले खाली

गठरी बन्धनों की।

अभी बाकी है

खोलना दूसरी गठरी

क्रियाओं की

जो कह रही है

इतिहास तेरा

इस जीवन का,

क्या-क्या किया

अथवा करवाया

इस शरीर से

बुद्धि से

पूरी करने इच्छा

अपनी

सजाने को सपने,

करने को भोग

ज्ञानवश, अज्ञान से,

अहंकार से यहां

प्रारब्ध से बंधकर,

फेंकी थी खूंटियां

ये सारी तूने

विषयों पर

स्वयं जुड़कर उनसे,

कम है क्रियाएं

प्राकृत इनमें,

परिणाम है सारा

तेरी समझ का,

याद करना होगा

एक-एक करके

हर व्यक्ति को

हर घटना को

हर विषय को,

हटाकर आवरण

सत-रज-तम के,

करके संकल्प

छोड़ने का

इस श्मशान को

जो भरा है

यादों से,

इतिहास मेरी मूर्खता का,

अहंकार का,

ठेस पहुंचाने का

किसी के मन को,

मचाई हो लूट

किसी जीवन में

निर्बल समझकर,

करके भाव हत्या।

आ लौट चलें

मनवा रे

रीत कर जग से

बन अकेला जोगी

अलख जगाने

ईश्वर की

होकर प्रतिष्ठित

आनन्द भाव में।

 

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

 

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