Gulabkothari's Blog

अप्रैल 7, 2013

रे मनवा मेरे! 16

बता रे मनवा,

 

तू बसा है

प्रत्येक ह्वदय में,

और तुझ में है

ईश्वर का वास,

तब भेद क्यों है

स्त्री-पुरूष में,

कर्म सूचक है

शरीर तो,

वाक्  है,

क्रियात्मक है।

तब भेद क्यों है

दृष्टि का

नर-नारी में,

कौन छोटा-बड़ा

दोनों में?

क्या नहीं जानता

तू पुरूष को,

तेरा ही नाम तो है

पुरूष

नारी देह में भी।

क्या अन्तर है

तेरी दृष्टि में

और क्यों मिले

सौ साल जीवन के

जब नारी होती

मुक्त सृजन से

पूर्व पचास के,

और पुरूष को

क्या जरूरत है

रेत की

पचास के पार?

सहज नहीं है

प्रसव-प्रजनन

अन्तिम पड़ाव पर

कृश काया से,

माया का अवतरण

नवोदय

वानप्रस्थ में,

क्षुधा मुक्त करने को,

स्वयं मुक्त होती है

नारी प्रकृति चक्र  से

चान्द्र सोम से,

जो नियन्ता था

अब तक

ऋतु काल था।

चान्द्र सोम रस का

प्रेम-माधुर्य

बरसाया माया ने

जीवन एक चौथाई,

भर कर रीते घट को

कराती स्नान प्रेम का,

करके रूपान्तरण

स्त्रैण भाव का

किया उदय

उस पुरूष भाव में।

जीवन का रंग मंच

बड़ा था,

थे लाखों आयाम,

करना था खाली

पिटारा ऋणानुबंध का

पिछली योनियों का

बहुत भारी,

कितने कर्म हैं

भोगने वाले,

कितने पाले नए-नए,

इनको भी निपटाना

इस शरीर को

बना सोपान मोक्ष का,

एक बार यह

बिखर गया तो

संभव नहीं है

नारायण हो जाना।

समय चाहिए

समझ सकें भेद

विद्या-अविद्या का,

आकलन करें

स्वयं की शक्ति का,

इसके विकास का,

जाग्रत हो सकें

सुप्त अवस्था से,

उठ सकें निद्रा से,

तब लगता है

कम पड़ता है

जीवन सौ साल का

शरीर शक्तियां

ढलने लगती

कर्म शक्ति भी

घटने लगती,

भीतर का करना

अभ्यास,

समझना वृत्तियों को

पकड़ना मार्ग

निवृत्तियों का

समझकर

एक-एक को,

मुक्त करूं खुद को

हर बंधन से

अभ्यास कर सकूं

निष्काम कर्म का

आगे तक,

निवृत्त होकर

कर्म योग से,

ज्ञान योग से,

प्रवृत्त होना है

भक्ति योग में,

बुद्धि योग से।

देखो, शरीर रचना,

शुक्र सौम्य है

अग्नि पुरूष का,

रज है उष्ण

सौम्य का,

जहां होता आहूत

सृष्टि यज्ञ में

शुक्र सोम।

निवृत्त होता चक्र

वानप्रस्थ में रज का,

रूपान्तरण करके

दाम्पत्य रति का

भक्ति रस में

मन उठता ऊपर को,

करूणा, दया,

वात्सल्य, श्रद्धा,

सारे भाव स्त्रैण

बहने लगते

पुरूष ओर

भीतर को।

नारी स्त्रैण

मन उसका पुरूष

आकर्षण अटूट,

मन तो पुरूष

नर का भी है

पर स्वभाव है

आक्रामक

दंभयुक्त,

माया में हो श्रद्धा,

सम्मान किया नारी का,

तब देखो बहती गंगा

पुरूष ह्वदय में भी

स्त्रैण भाव की।

एक अनूठा रूपान्तरण

और वह भी श्रद्धा से,

गुण ग्रहण का भाव

बना देता है

सौम्य पुरूष को

अब देखो दो सौम्य,

स्त्रैण हैं दोनों,

भक्ति भाव

भीतर जाकर

करते हंै जाग्रत

चेतना को

विज्ञानमय कोश में

सिमटता मन

भीतर की ओर,

सिमटता कोश

प्राणों का,

स्पन्दन विचारों के

धकेलते अन्दर

मन को।

जप, तप, यज्ञ

धारणा-ध्यान

समाघि, ये सब

बनते हैं नया मार्ग,

जीवन का,

जाग्रत करके चक्रों को

प्राणायाम के द्वारा,

करते ऊध्र्वारोहण

रेत का

बनता मनवा प्यारा,

लेकर तेज नया

चेहरे पर

आभा मण्डल में

नई छटाएं

बिखेरती नई

प्राण धारा।

आवश्यक है

ऊध्र्वगामी होना

शुक्र का,

पशुभाव है

अधोगति इसकी,

बिना शुक्र के

रूक जाएगा निर्माण

ओज का

मन का।

पत्नी जब हो जाए

निवृत्त और

पति रहे प्रवृत्त

कहीं अन्यत्र,

करे, दुरूपयोग

पतन मार्ग पर,

तब कहां ओज

कहां सात्विक मन?

वानप्रस्थ में

साथ रहकर पत्नी ही

संतुलित करती है

माया भाव को

जो करती रही

आवरित

गृहस्थाश्रम में,

आज बनकर

महामाया (सूक्ष्म)

हटाने को खड़ी है

मन के द्वार।

तभी बदल पाती है

दाम्पत्य रति को

देव रति में,

पुरूष देह में,

स्वयं करती विरक्त

अन्य स्त्रैण को,

ले जाती पुरूष को

पति भाव को

मोक्ष द्वार तक

बनाकर स्त्रैण

और हो जाती

लीन,

अपने पुरूष में

जीते जी।

आ लौट चलें

मनवा, स्त्रैण को

पाना है यदि तुझे

कृष्ण को,

जगत पुरूष को!

 

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के

प्रधान संपादक हैं

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