Gulabkothari's Blog

अप्रैल 11, 2013

बेशर्म शीर्ष

इस देश में शब्द को ब्रह्म माना जाता है। शब्द ज्ञान (ब्रह्म) के वाचक हैं। बोलने, लिखने से पहले मन में एक इच्छा उठती है अभिव्यक्ति की। इस इच्छा का आधार भी ज्ञान ही होता है।

आज जिस प्रकार के शब्दों का प्रयोग हमारे नेता सार्वजनिक रूप से कर रहे हैं, उसके लिए ज्ञान की अनुपस्थिति, गरिमा, सामने वाले का सम्मान आदि सब अनिवार्य धातुएं बन गई। अहंकार के मारे नेता कपड़ों के बाहर होने लग गए। आपा खोने लगे। बात-बात में इनको ठेस लगती है। इनको कौन समझाए कि इनकी बातों से न केवल इनका मतदाता बल्कि पूरा देश शर्मिदा होता है। बस, इनको शर्म नहीं आती।

महाराष्ट्र जैसा प्रदेश, जो अपने आप में साहित्य की खान है, के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार का जब लोगों ने बांध सूखने की ओर ध्यान आकर्षित किया तो उनका उत्तर था- “जब बांध में पानी है ही नहीं, तो क्या पेशाब करके दें पानी?” क्या खानदानी जवाब है- लाजवाब है।

इन्होंने यह भी रहस्योद्घाटन किया था कि रात को बिजली नहीं आती, इसीलिए जनसंख्या बढ़ रही है। ऎसी शर्मनाक टिप्पणी करने वाले अजीत अकेले राजनेता नहीं हैं। लम्बी लाइन है। कुछ बानगी देखिए।

केन्द्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा- अपराध और बेईमानी तो मुलायम सिंह का पेशा रहा है। मायावती तो लुटेरी थी, मुलायम तो लुटेरे के साथ गुण्डे भी हैं।

शिवपाल सिंह यादव- इन दिनों बेनी प्रसाद वर्मा अत्यधिक धूम्रपान कर रहे हैं। वो अपने तम्बाकू में कुछ मिलाते हैं। उन्हें इलाज की जरूरत है। वो अफीम की तस्करी में शामिल रहे हैं। अपनी सिगरेट में वो चरस मिलाते हैं।

मोहन भागवत- लोग जिसे विवाह कहते हैं, वो पति और पत्नी के बीच कांट्रैक्ट होता है। अगर किसी वजह से कांट्रैक्ट की पूर्ति नहीं हो पा रही है, तो पत्नी, पति को और पति, पत्नी को छोड़ दे।

राष्ट्रीय नेता तो हैं ही, स्तरहीन भाषा के इस खेल में देश के विभिन्न राज्यों के नेता भी पीछे नहीं हैं। फिर चाहे वे पक्ष के हों या विपक्ष के। राजस्थान हो या मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ हो या पश्चिम बंगाल। सब इसमें शामिल हैं। सबकी भाषा में गिरावट आ गई। ज्यादातर एक जैसे हो गए।

वे सड़क-छाप होते जा रहे हैं। प्रतिद्वंद्वी के व्यक्तिगत नाम ले लेकर आक्षेप लगाने लगे । निजी आचरण पर भाषण देने लगे। कोई शर्म नहीं। मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, विधायक किसी की भाषा में भेद नहीं रहा। अपनी पार्टी की, क्षमताओं की, विकास की, घोषणा पत्रों के क्रियान्वयन की कोई बात नहीं करता। कामकाज पर, स्वयं के भ्रष्ट कृत्यों के आरोपों पर कोई क्यों बोले! आज बड़े-बड़े पदों पर बैठे नेताओं के भाषण सुनकर लगता है लोकतंत्र की होली खेल रहे हैं।

कोई जवाबदारी नहीं। बस एक नारा “हमें सरकार बनाने का अवसर दें।” हम भ्रष्टाचार और व्यभिचार में शीर्ष पर होंगे। जनता को पंगु बना देंगे। देश को विदेशियों के हाथों बेच देंगे। कानून ऎसे बना देंगे कि मानव और पशु का भेद भी समाप्त हो जाएगा।

बचा-खुचा आरक्षण की आग में जल जाएगा। तब कौन से अजीत पवार पेशाब करके आग को बुझा पाएंगे। बची हुई राख में नई पीढ़ी अपना भविष्य ढूंढेगी। युवा वर्ग का धर्म है कि ऎसे नराधम नेताओं को समय रहते निपटा दें।

गुलाब कोठारी

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