Gulabkothari's Blog

अप्रैल 15, 2013

मेरा अधिकार!

भारत की एकता और अखण्डता के अधिकांश रक्षक स्वयं की ही भारत संज्ञा मानने पर उतारू हो रहे हैं। गुड़ में लपेटकर ऎसी गोलियां खिलाते आ रहे हैं कि सम्पूर्ण देश के नागरिक शहरवासी होते हुए भी जीवनशैली से वनवासी बन जाएं। इनको तो देश एकात्म रूप में देखना फूटी आंखों नहीं सुहाता। इनकी आंखों में बस अहंकार दिखाई देता है। मानवता एवं देश के प्रति दर्द नहीं दिखाई देता। कानून के इन्हीं निर्माताओं ने देश के कई सम्प्रदायों को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया।

इसका कारण आज तक समझ में नहीं आया कि क्यों इनको राष्ट्र की मुख्य धारा से बाहर निकाल दिया गया। आज तक यह भी स्पष्ट नहीं कर पाए कि ये अल्पसंख्यक किसके आगे हैं। अर्थात बहुसंख्यक कौन हैं। क्या हम ऎसे व्यवहार से नागरिकों को अल्पसंख्यक कहकर अपमानित नहीं कर रहे?

क्या लाभ मिल पाया इनको, सिवाय इसके कि शेष भारत की आंखों में कांटों की तरह चुभने लगे। मानो ये दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण करने लगे हों। जब से आरक्षण लागू हुआ, ये सभी अल्पसंख्यक कोने में बिठा दिए गए। इनका कोई नाम लेवा तक दिखाई नहीं देता। आरक्षण भी इनके लिए नहीं।

आरक्षण का आधार भी जातिवाद ही रहा। इस आधार ने आरक्षित जातियों को शेष भारत से काटकर रख दिया। आरक्षण का लाभ भले ही चंद परिवारों को ही मिला, किन्तु सम्पूर्ण जाति ही विरोधी सम्प्रदाय मान ली जाती है। इस कारण देश के विभाजन की औपचारिक आवश्यकता ही नहीं रही। देश तो गांव-गांव, गली-गली में विभाजित ही नजर आ रहा है। हर गांव, मोहल्ले, कार्यालय ही विरोधी बनकर विष उगलने लग गए। सत्ता का अट्टहास इस देश के अंग-अंग में समा गया।

सत्ताधारी शायद इससे भी सन्तुष्ट नहीं हुए। आरक्षण ने एक और आसुरी रूप धारण कर लिया। लोकतंत्र के प्रहरियों, विधिवेत्ताओं और न्यायविदों के सामने खुलेआम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की होली खेली जाने लगी। होना तो यह चाहिए था कि लोकतंत्र में हर आदमी को, हर सीट से चुनाव लड़ने की आजादी होती लेकिन इसके विपरीत सीटें आरक्षित कर दी गई। ये एससी के लिए, ये एसटी के लिए।

कॉलेज आरक्षित नहीं हुए! सरकारी विभाग आरक्षित नहीं हुए! तब चुनाव क्षेत्रों का आरक्षण क्यों किया गया? क्या आदिवासी क्षेत्र में गैर आदिवासी नहीं रहते? क्या चुनाव लड़ने के उनके अधिकारों को निषिद्ध कर देना संवैधानिक है? गैर अजा-जजा का व्यक्ति इन आरक्षित क्षेत्रों में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भी स्वीकार्य नहीं है।

इससे बड़ा अन्याय संविधान के नाम पर जनता के साथ और क्या हो सकता है! ऎसा भी नहीं है कि इसका विकल्प ही नहीं हो। जनहित में लोकतंत्र के प्रहरियों को यह मुद्दा उठाना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश और मुख्य चुनाव आयुक्त को भी इसे गंभीरता से लेना चाहिए। आरक्षण का जो प्रतिशत संविधान के जरिए देश में लागू है, वही लागू रहे, इसमें आपत्ति जरा भी नहीं है। प्रश्न तो शेष नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा का है। इसके लिए प्रतिशत का यह कानून राजनीतिक दलों पर लागू कर देने से व्यक्तिगत अधिकार बने रहेंगे।

प्रत्येक दल अपनी उम्मीदवारों की सूची में आरक्षण का प्रतिशत निश्चित कर दे। कानून पूर्ण रूप से प्रभावी रहेगा। पार्टी जहां से भी चाहे, आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को चुनाव के लिए खड़ा कर दे। कानून की यह अनिवार्यता क्षेत्र या विशेष सम्प्रदायों से मुक्त रहे। ताकि न तो मतदाता को लाचारी महसूस हो, न ही अनपढ़-अनभिज्ञ जन प्रतिनिधि चुनना लोगों की कुंठा का कारण बन सके। पंचायत और पालिका चुनाव में तो यह दायरा एससी-एसटी के साथ ओबीसी और महिलाओं तक बढ़ गया है।

यहां भी प्रश्न वही है कि जिस एक श्रेणी के लिए सीट आरक्षित हो गई, शेष श्रेणियों के मतदाता वहां चुनाव लड़ने के अपने नागरिक अधिकार से वंचित हो गए। क्या यह उन मतदाताओं का अपमान नहीं है? उनको कैसे नागरिक अधिकारों से वंचित रख सकते हैं? यदि संसद या न्यायालय इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं, तो निश्चित है कि वे लोकतंत्र की भाषा में नहीं सोच रहे। “सत्ता” की एकमात्र भाषा में सोचते और कार्य करते हैं। आम चुनाव सिर पर हैं। समय रहते इस मुद्दे पर निर्णय हो जाना ही देशहित में होगा। किसी भी भूल को ठीक करने के लिए हर क्षण, हर काल उपयुक्त होता है। वरना यह देश सदियों तक इस चुभन को नहीं भूलेगा। “मेरा अधिकार बचेगा, तभी लोकतंत्र बचेगा”।

गुलाब कोठारी

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