Gulabkothari's Blog

अप्रैल 21, 2013

रक्षक या भक्षक

आपने त्रेता-द्वापर में अनेक राजाओं के यहां की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में पढ़ा होगा। किस प्रकार स्वयं राजा अपनी प्रजा के हाल जानने को स्वयं रात में शहर मे भेष बदलकर निकलते थे। आज हम लोकतंत्र में जी रहे हैं और अनुभव कर रहे हैं कि जिन लोगों, पुलिस विभाग, गृह विभाग एवं अन्य सुरक्षा एजेंसियो के भरोसे रक्षा का दायित्व है, उनमें से अधिकांश तो भक्षक बन बैठे हैं। आसुरी भाव तो सत्ता के मद में लीन हो चुका। पुलिस सेवा का उद्देश्य ही भूल गई, अथवा याद रखना ही नहीं चाहती।

सबसे अधिक तो पुलिस की मूल भूमिका ही आज देश में कहीं दिखाई नहीं देती। अपराध रोकना आज की पुलिस का कार्य रह ही नहीं गया है। आज तो इसके विपरीत पुलिस अपराधियों का ही साथ दे रही है। इनका तो चोली-दामन का साथ है। पुलिस चोरियां भी करवाती है, वसूली भी करवाती है। कोई एफआईआर लिखवाता है, किसी के विरूद्ध, तो सामने वाले को बुलाकर उससे भी एफआईआर लिखवाती है।

अभी देखा, किस प्रकार दिल्ली पुलिस बच्ची के बाप को कह रही थी कि दो हजार रू. ले लो और चुप हो जाओ। किस प्रकार के बदतमीज आदमी ने लड़की के गाल पर तमाचा जड़ दिया। आदिवासी क्षेत्रों में तो पुलिस को यमदूत का पर्यायवाची कहा जा सकता है। मध्यप्रदेश में तो अब माफिया पुलिस अधिकारियों को यमलोक पहुंचाने लग गया। छत्तीसगढ़ में तो पुलिस ने गैरसंवैधानिक अभियान छेड़ रखा था आदिवासियों के खिलाफ-सलवा जुडुम। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही विराम लगा।

आज पुलिस की चर्चा भू-माफिया के साथ भी जुड़ी हुई है। एक व्यक्ति की जमीन पर पुलिस ने कब्जा कर लिया और तम्बू तान दिया। कितने स्थानों पर पुलिस ने कब्जे कर रखे हैं, कब्जे कराने में लोगों का सहयोग करती है, जगजाहिर है। देश में हथियार माफिया, शराब माफिया, मादक पदार्थो का जाल आदि कुछ भी बिना पुलिस के सहयोग के संभव नहीं। और यह सब बढ़ रहे हैं।

अर्थात पुलिस की भागीदारी देश को भ्रष्टाचार तथा व्यभिचार में धकेलने के काम आ रही है। रोकथाम के तो प्रयास ही बंद हो गए। हर प्रदेश के बड़े-बड़े पुलिस अधिकारी सैंकड़ों करोड़ की सम्पत्ति बनाए बैठे हैं। अजमेर पुलिस अधीक्षक राजेश मीणा का उदाहरण सबूत है कि किसकी ताकत से उसने हर थाने से “बंधी” बांध रखी थी। क्या यह अकेला मामला है? कुछ अन्य मामले भी होंगे, सरकार जानती है कि क्यों दबाया गया उनको।

सही अर्थो मेें तो सरकार ही पुलिस की नपुंसकता के लिए जिम्मेदार है। राजनेता अपराधियों पर कार्रवाई रोकने के लिए दबाव बनाते हैं। स्वयं थानों पर जाकर बैठ जाते हैं। उनका काम भी बिना इन अपराधियों के नहीं चलता। पुलिस को हर अपराधी की जानकारी होती है, किन्तु कर कुछ नहीं सकती। फरार विधायक सदन में बैठे रहते हैं, फरार अफसर खुले घूमते हैं, पुलिस मूकदर्शक बन जाती है। आंखें बंद कर लेती है। यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।

भारतीय पुलिस सेवा का अधिकारी कैसे एक विधायक के आगे घुटने टेक देता है। गैरत की बात है। उसके मां-बाप, बच्चे उसके बारे में क्या सोचते होंगे? और यह सब चांदी की छोटी-सी खनक के लिए। मनपसंद पोस्टिंग के लिए। तब एक अदने से सिपाही और अधिकारी की मानसिकता में अन्तर क्या रह गया? लानत है ऎसी सेवा के संकल्प को। आज पुलिस, सेवा छोड़कर नोंचने में लगी है। झूठे केसों में लोगों को फंसाकर या तो स्वयं के अहंकार की तुष्टि करने में लगी है या ऎसा सरकार के लिए कर रही है, ताकि वह “गुडबुक्स” में बनी रहे। जनता भले ही हाहाकार करे। पुलिस पत्थर दिल का अवतार हो गई है।

आरक्षण लागू होने के बाद पुलिस का एक नया रूप भी सामने आया। पुलिस भी जातिगत आधार पर अपराधी से बर्ताव करती है। उसकी सहायता या दुश्मनी का ताण्डव करती है। किन्तु जब सरकारें स्वयं नकारा हो जाएं, अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर, मुकदमे तक वापस ले लें, तब दोष किसको दिया जाए! अपनी समझ को, जिसने ऎसे जनप्रतिनिधि चुनकर भेजे।

गुलाब कोठारी

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