Gulabkothari's Blog

अप्रैल 27, 2013

खो गई संवेदना

जयपुर में सीए की एक छात्रा से छेड़छाड़ की घटना जितनी शर्मनाक है, उससे भी कहीं ज्यादा शर्मनाक उसके साथ पुलिस का व्यवहार है। जवाहर सर्किल थाना पहुंची छात्रा और उसके पिता को बिना रिपोर्ट लिए दूसरे थाने दौड़ा देना और रिपोर्ट लिखने भर में दो घंटे लग जाना निंदनीय तो है ही, अपराधियों को बचने के पूरे अवसर देने वाला है।

ऎसी घटनाओं से यह सवाल उठता है कि आखिर पीडित कहां जाए? पुलिस की इस संवदेनहीनता के अनेक कारण गिनाए जा सकते हैं। कुछ नीतिगत कुछ ढांचागत। जहां तक ढांचे की बात है हमारे पुलिस विभाग का संगठनात्मक स्वरूप आज भी अंग्रेजो जैसा ही है। वैसे तो सम्पूर्ण कार्यपालिका का स्वरूप ऎसा ही है।

इसमें इतने धरातल हैं, एक-दूसरे से इतने स्वतंत्र हैं, या सेना की तरह अति अनुशासित हैं कि इसमें कुछ अच्छे परिणामों की संभावना ही नहीं है। पुलिस में राज्य सेवा और केन्द्र सेवा के अधिकारियों में बहुत बड़ा अन्तर है। अधिकांश मामलों में दोनों की दो अलग-अलग दुनिया है। राज्य पुलिस का अधिकारी कई बार हीनभावना से ग्रस्त होता दिखाई देगा।

आई.पी.एस. के साथ उठ-बैठ या पारिवारिक सम्बन्ध ही नहीं दिखाई देते, क्योंकि आई.पी.एस. अधिकारियों का स्वरूप ही आदेशात्मक है। कार्यभार सारा राज्य पुलिस सेवाओं के हाथ में है। अत: आई.पी.एस. का जनता से कोई सीधा सम्पर्क नहीं होता। शिक्षित होने से उनकी भाषा “अति शिष्ट” होती है। जनता के बीच उनकी पकड़ नहीं होती। विभाग में नीचे सबको द्वितीय श्रेणी का मानता है। वरिष्ठ अधिकारियों को प्रसन्न रखने तक डयूटी हो जाती है।

आई.पी.एस. के ऊपर आई.ए.एस. का बैठना इस श्ृंखला की सबसे कमजोर कड़ी है। आई.ए.एस. इनको तवज्जो देते ही नहीं। उनसे तो सेना के अधिकारी, न्यायिक अधिकारी आदि सभी त्रस्त हैं। वे स्वयं को ही श्रेष मानते हैं। आई.पी.एस. को आदेश देने तक जुड़े रहते हैं।

कागजों में न जाने किस-किस बात के लिए उत्तरदायी होते हैं। व्यवहार में इनकी पटरी आपस में नहीं बैठती। अनेक मामलों में आई.ए.एस. ही निर्णय करते हैं, बजट पास करते हैं, विभाग की गतिविधियों के लिए जवाबदेह माने जाते हैं। इनकी भी आंख नीचे के बजाय “ऊपर” वालों की ओर ही देखती हैं। आम आदमी के लिए तो आज भी ये अंगे्रज हैं। पहुंच के बाहर हैं।

आई.ए.एस. अधिकारियों का अपना क्लब होता है। अपनों के बाहर इनका कोई सरोकार नहीं होता। इसी व्यवस्था के कारण बजट का हिस्सा आम सिपाही तक नहीं पहुंच पाता। और राजनेता। इनका सम्पर्क या तो आई.ए.एस. अधिकारियों से या अपने चुनाव क्षेत्र के थानेदार और एस.पी. से। इनकी दुकान मूलत: ट्रान्सफर/पोस्टिंग से चलती है। क्षेत्र के अपराधियों से अधिकांश राजनेता एवं थानेदार मिले होते हैं। आज यदि मुख्यमंत्री आदेश कर दें कि अगले तीन दिन शहर में अपराध नहीं होने चाहिए, तब देखिए, मजाल क्या किसी की जेब भी कट जाए! जानते सब एक दूसरे को हैं।

कोई भी दुर्घटना हो तो नीचे वाले फंसते हैं। पुरस्कार पाना हो, तो ऊपर वाले धौंस मारकर भी ले लेते हैं। विदेश जाना हो तो अन्तिम सीढ़ी तक फाइल छोटे या मातहत की चलती है। अन्तिम चरण में नाम “शीर्ष पुरूषों” का प्रवेश कर जाता है। कुल मिलाकर सारी कार्यशैली, जीवन के प्रति दृष्टि स्वयं से आगे देख ही नहीं पाती। भला हो इस आरक्षण का जिसने आंखों में बदले के भाव भर दिए।

यही बदला आज सेवा कहलाता है। एक भ्रष्ट है, दूसरा देख रहा है। मौन है। आरक्षण की दीवार कब जानलेवा साबित हो जाए। दोनों ओर बस आग है। दोनों को नेताओं का संरक्षण प्राप्त है। आरक्षण का अमृत तो आज वे ही चख रहे हैं। भाड़ में जाएं अपराध-विश्वास-सुरक्षा का मुद्दा। वे तो अपने चहेतों के रक्षक हैं बस।

पुलिस से उनकी रक्षा कराते रहते हैं। जनता के मुद्दे आश्वासनों में सिमटकर रह जाते हैं। इनकी निष्क्रियता के कारण ही कम्युनिटी लाइजन ग्रुप (सीएलजी) भी अकर्मण्य हो चुकी। पुलिस के सहयोग के लिए क्षेत्र वार इन समितियों का गठन किया गया था। आज ये भी निजी स्वार्थो के जाल में फंस चुकी हैं। वरना किसी क्षेत्र में कोई अपराधी दिखाई ही नहीं देगा। सारी छेड़छाड़ की घटनाओं के लिए सीएलजी के सदस्य भी उतने ही दोषी हैं, जितना कि पुलिस गश्ती दल। कोई सदस्य छह माह काम नहीं करे तो बदल जाना चाहिए। साथ ही ऎसी समितियों में महिलाओं की संख्या भी उचित अनुपात में होनी चाहिए।

सारी परिस्थितियां बताती हैं कि पुलिस ऊपर से नीचे तक कई धड़ों में बंटी है। सामंजस्य एवं आपसी सम्मान का भी अभाव है। तब कैसे जन अपेक्षाएं पूरी हों और कौन जिम्मा ले? आज रोकथाम (अपराधों की) का सिलसिला लगभग बन्द हो चुका है। दुर्घटना/ बलात्कार के बाद पुलिस का जुड़ना एक व्यापारिक गतिविधि बन गई है। सबकी चेतना लक्ष्मी के पीछे, शराब पीकर दौड़ रही है। विष्णु से छीनकर अपने घर में बांधना चाहते हैं। देखना यह है कि, विष्णु इनके साथ क्या करते हैं।

गुलाब कोठारी

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