Gulabkothari's Blog

अप्रैल 28, 2013

सम्वत्सर-2

अगिA और वेद को सत्य तथा अन्न और पशु को ऋत् कहा है। खेत में अन्न फैला हुआ होता है। इकट्ठा करना पड़ता है। आटा भी ऋत् है। पानी डालकर पिण्ड (सत्य) बनाया जाता है। अन्न ही पशु है। ऋत् से सत्य बना, सत्य निकल गया तो ऋत् ही बचा। आप, वायु, सोम तीन ऋत् हैं। प्राण-वाक्-अन्नाद तीन अगिA हैं। इनके यज्ञ को ही प्रजापति कहते हैं। ब्रह्मा का चौथा विवर्त है। इसके पहले भू:, भुव:, स्व: तीन हुए थे। परात्पर, पुरूष, प्रकृति और प्रजापति। पुरूष भाव आते ही अव्यय पुरूष पहले आ गया। फिर अक्षर और क्षर पुरूष। परात्पर अनात्यं (बिना आत्मा वाला) सारी आत्माओं को बनाने वाला है। पर (अव्यय) से भी जो पर है, वह परात्पर है। अव्यय परात्पर का अन्न है। माया ने इस अव्यय (आनन्द)भाव को मित् भाव में लिया। माया विज्ञान में इससे जुड़ी और मन-प्राण-वाक् को जोड़ा। जोड़ना ही माया का कार्य है। परात्पर की प्रतीक है। माया के भाव अनन्त हैं। परात्पर में नाना भाव भरे हैं। अव्यय इसी का आलम्बन लेकर सारा निर्माण कार्य परात्पर के भीतर कर रहा है। आगे अव्यय अक्षर का और अक्षर क्षर का आलम्बन बन रहा है। इसमें अमृत और मृत्यु भावों का समुच्चय रहता है। ज्योति रूप परात्पर अमृत रूप तथा तम रूप में मृत्यु कहलाता है। इसीलिए सूर्य से नित्य हम प्रार्थना करते हैं-

असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्माùमृतंगमय।।।

माया में क्रिया नहीं, संकल्प मात्र होता है। क्रिया सारी महामाया (बिन्दुमयी) की है। माया में प्राकृतिक भाव से योगमाया उदित होती है। उसमें फिर माया का उदय महामाया कहलाता है। माया सदा योगमाया के गर्भ में रहती है। पुरूष में माया के संकल्प कितने उदित होते हैं, गिन नहीं सकते। कहीं प्रकट होती है, कहीं भीतर ही गायब। इसी में से स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी, पांच पुण्डीर निकले। ये सब एक दूसरे की परिक्रमा करते हैं। स्वयंभू केन्द्रीभूत है। परिक्रमा का कारण (पृथ्वी की) अगिA ही है। अगिA-सोम का मिथुन भाव ही ऋत् है। दोनों ही ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र की तरह अक्षर प्राण हैं। क्षर सृष्टि पैदा करते हैं। स्वयंभू ज्ञान-प्रधान मौलिक वेद रूप माना गया है। गति/प्राण तत्व होने के कारण ही इसे ब्रह्म का नि:श्वास कहा है। वेद का अन्य दूसरा रूप गायत्री मात्रिक है। सूर्य सम्बन्ध के कारण आगति, गति, स्थिति इसमें ही, क्रिया रूप रहते हैं। इसी में यज्ञ मात्रिक वेद भी रहता है। इससे भौतिक पदार्थ पैदा होते हैं। शब्दात्मक वेद इन तीनों की वागात्मिका मूर्त अभिव्यक्ति है। ये तीनों वेद मन, प्राण, वाक् रूप से पदार्थो में रहते हैं। गति को ही रस कहते हैं। स्थिति रसातीत मानी गई है। गति का नाम ही यजु: है। सर्वागतिर्याजुषी हैव शश्वत्। तैत्ति.ब्रा.3/12/9/1/। किसी पदार्थ का द्रवित होना, किसी घन का द्रुतिभाव में आना ही गति है।

पंच पुण्डिरा विश्व विद्या
प्रत्येक प्राणी प्रजापति की एक-एक शाखा है। इसी शाखा पर जीव रूपी भोक्ता तथा साक्षी रूपी ईश्वर सुपर्ण बैठे हैं। वह देव सत्य इस भूत सत्य को कभी अकेला नहीं छोड़ता। इस शाखा के जीवन के लिए अन्न लेते हैं। उस अन्न (इष्) से वैश्वानर अगिA ऊर्जा या प्राण उत्पन्न करती है। इस शरीर रूपी शाखा का यही जीवन क्रम/ संवर्घन है।
इस शाखा के दो रूप हैं-पिंडगत और ब्रह्माण्डगत। दोनों में पांच पर्व हैं। पोरी को वैदिक भाषा में पुण्डीर कहा है। शरीर (इन्द्रिय संस्थान) सबसे स्थूल पोरी है। यही दृश्य है। इसके भीतर मन, मन के भीतर बुद्धि, बुद्धि के आगे महान और उससे भी आगे पहली पोरी अव्यक्त है। अव्यक्तआत्मा, महान-विज्ञान-प्रज्ञान तथा भूतआत्मा-पांच पोरी की शाखा प्राणी को प्राप्त है। इसका एक सिरा अव्यक्त प्रजापति से जुड़ा है, जहां से यह जन्म लेता है। अत: उस पोर को भी अव्यक्त कहते हैं। पृष्ठ 64-69 कठोपनिषद्।

शाखा के साथ वृक्ष, वृक्ष के साथ वन है। एक-एक विश्व भी महान अव्यय वृक्ष की एक-एक शाखा है। पुरूष की तरह पांच पोरो वाली। स्वयंभू-परमेष्ठी-सूर्य-चन्द्रमा-पृथ्वी उसके पांच पोर हैं। ये क्रमश: अव्यक्त-महान-विज्ञान-प्रज्ञान-भूतआत्मा हैं। पिण्ड सृष्टि के विकास की पांच अवस्था विशेष हैं, जो क्रमश: सूक्ष्म से स्थूल में आविर्भूत होती है। अत: पिण्ड केवल सूर्य-चन्द्रमा-पृथ्वी तीन ही नहीं हैं। यह विश्व एक वृक्ष या अव्यय अश्वत्थ है, जिसका मूल ऊध्र्व तथा शाखाएं नीचे की ओर फैली हैं। ऊपर नीचे का अर्थ केन्द्र और परिधि से है। जो हिरण्यगर्भ अव्यक्त प्रजापति है वही ऊध्र्व है। उसका व्यक्त रूप अध: है।

पंचपर्वा के साथ मनोता-विद्या भी जुड़ी है। प्रत्येक पर्व के तीन-तीन भेद हैं। सृष्टि मूलक अव्यय पुरूष मन, प्राण, वांग्मय है, अत: उससे विकसित होने वाले प्रत्येक पर्व भी तीन-तीन रूप में फूटते हैं-विकसित होते हैं। मन प्रधान होने से मनोता। इन्हीं से सृष्टि पर्वो का वितान होता है।

मानव का स्वरूप
वेद व्यास का वाक्य है कि मानव सबसे श्रेष्ठ है। पुरूष सम्वत्सर प्रजापति की प्रतिमा है। दोनों का स्वरूप समान है। अत: पुरूष को प्रजापति के निकटतम/ नेदिष्ट कहा गया है। शरीर-मन-बुद्धि-आत्मा विशिष्ट प्राणी पुरूष है। वह श्रद्धा और मेधा, ऋत् और सत्य, सूत्रात्मा और अन्तर्यामी, इन्द्र और इन्द्राणी, मनु तžव और श्रद्धा, अमृत और मत्र्य, अनिरूक्त और निरूक्त भावों की समष्टि और समन्वय की विलक्षण अभिव्यक्ति है। इसमें एक ओर अधिदैवत और अधिभूत सृष्टि हैं, वहीं दूसरी ओर पुरूष अध्यात्म सृष्टि है। अधिदैवत की शक्ति से, अधिभूत के उपादान से अध्यात्म यज्ञ की सिद्धि ही सच्चा वैदिक दृष्टिकोण है। पुरूष सृष्टि का केन्द्र या नभ्यबिन्दु है। पुरूष ही सब यज्ञों की महावेदि है। अव्यय-अक्षर-क्षर, ज्ञान-क्रिया-अर्थ, मन-प्राण-वाक् इनकी समष्टि ही पुरूष है।
अश्वत्थ विद्या

निर्विशेष-परात्पर-अव्यय-अक्षर-क्षर इन पांच पर्वो द्वारा विश्व का विकास हो रहा है। अव्यय (पर), अक्षर (परावर), क्षर (अवर) की समष्टि ही विश्व है। निर्विशेष परात्पर से भी अतीत है। परात्पर (तद्वन) रसमय है। उसी में महामाया के सीमा बल से अव्ययरूपी विश्व (अश्वत्थ) का जन्म होता है। अश्वत्थ ही प्रजापति है। विश्व (ऎसे) अनेक हैं। “अश्ववत् तिष्ठति इति अश्वत्थ:” अर्थात् जो तीन पैरों पर खड़ा रहता है। तीनों पैर स्थिर (अविचाली), एक पैर विचाली है। “त्रिपादूध्र्व उदैत्पुरूष: पादोस्येहाभवत्पुन:।” एक पैर (विश्व) परिवर्तनशील है। अश्वत्थ है। न श्व: इति अश्व:। जो आज है वो कल नहीं है। आत्मा आज भी है, कल भी है। इसका जो बिन्दु सामने है वह प्रतिक्षण हट रहा है-दूसरा सामने आ रहा है। बिन्दु-बिन्दु हट रहा है। नहीं बदलने वाला आभू है। बदलने वाला नाम-रूपात्मक अभ्व है। इसे यज्ञ कहते हैं। क्योंकि वह एक प्रतीति मात्र है।

अश्वत्थ विद्या का मूल रस-बल का तारतम्य है। रस से बल की ओर विकास सिसृक्षा है। बल से रस की ओर बढ़ना ही मुमुक्षा है। रस शान्त-स्थिर धरातल है। बल-क्षुब्ध-गतिशील है। सोलह प्रकार के होते हैं। पहला मायाबल है। रूपों का निर्माण माया के सीमाभाव से ही होता है। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र (अक्षर) अन्तर्यामी कहलाते हैं। अगिA-सोम सूत्रात्मा है। प्रत्येक पिण्ड में षोडशी आत्मा का निवास+ मूर्ति है। विश्वसृट्, पंचजन, पुर एवं महाभूत ही क्षर सृष्टि का क्रमिक विकास है। दर्शन शास्त्र में इनको गुण-अणु-रेणु-भूत-भौतिक कहते हैं। “उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिर:”। उषा मेध्य अश्व का मस्तक है। इसमें चक्रात्मक सम्वत्सर का संकेत है।
गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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