Gulabkothari's Blog

मई 5, 2013

रे मनवा मेरे!

अकेला व्यक्ति
हो जाता बेचैन
करता है खुराफात,
प्रयोग अटपटे,
बनाकर एक जाल
और फंस जाता है
उसी में।
तेरा स्वभाव
ढूंढ़ने का नित नया,
ऊब जाना
एक से जीवन से,
कर देता है
विरक्त तुझको
अनेक विषयों से,
देखती रहती माया
मूक दर्शक सी।
इसी बीच पाकर
सुनहरा अवसर
फेंकती है जाल,
किसी महफिल में
किसी उत्सव पर
और दबोच लेती है
सुरा-सुन्दरी होकर
लपेटती जाती है
माया
और मन,
तू रहता मस्त
स्वर्ग लोक में।
कुछ लोग तो
मानते हैं इनको
निकल पाने का मार्ग
नरक से,
अकेलेपन से
उबाऊ जीवन से
कैदी बन जाते हैं
शेष जीवन के लिए
वेष्टित1 होकर
व्यसनोें में।
तेरी कमजोरी है
“एकोहं बहुस्याम”2
और विशेषज्ञ है
माया ठगने में,
बांधकर रखने में,
इतिहास गवाह है
माया के योगदान का
पुरूष के उत्थान में,
उठाकर फिर
गिराने में।
माया भी झूठी
उत्थान भी झूठा
जीवन के अन्त में,
जीव की आंखों पर
परदा त्रिगुण का
ऊपर से नशा
सुप्त करता हुआ
सेतु को
आत्मा के बीच
चेतना ग्रंथियों को
करेला, नीम चढ़ा।
समृद्ध हो व्यक्ति
तो बढ़ जाती है
चकाचौंध माया की
ग्लैमर फैलता है
चारों ओर।
क्या गिलासें
क्या सुराहियां
साकी के कटाक्ष
महफिलें हर दिन
और अब तो
रेव पार्टियां
देश भर में
जकड़कर युवा को
करके कमजोर
संकल्प जीने का
बांध लेती माया
अपने पाश में
पशु रूप देकर।
खुराक नहीं रहती
पुरानी, अत:
परोसा जाता है
पोषाहार
मादक द्रव्यो का
तम्बाकू-चरस
गांजा-ब्राउन शुगर
न जाने और क्या-क्या,
कर देती परतंत्र
जीव को
सदा-सदा के लिए
बनाकर पाण्डु।
और फिर भी
सोचता है व्यक्ति
भोग करने की
माया को
सुप्त होकर भी
जिन्दा लाश की तरह।
व्यसन कहते हैं
उस भाव को
स्वभाव को
जो नहीं होता
प्राकृतिक,
स्वयं बनाता है
व्यक्ति उसको,
वही बना देता है
व्यक्तित्व उसका।
भाव की गहनता
पकड़ मन पर,
करा दे अपराध
जो अभाव में
कहते हैं व्यसन।
सबसे बड़ा व्यसन
होता है भोजन।
“भूखे भजन न
होय गोपाला”
अधिकांश अपराध
विश्व के जुडे हैं
भूख से, क्षुधा से
अच्छे-बुरे नहीं होते
व्यसन भी,
पर बंधन होेते हैं
चिन्तन के,
पढ़ना भी, खेलना,
धर्म और कमाई भी
इसी पर टिकता है
मनोविज्ञान
जीवन का,
कई बार तो
बना देते हैं
प्रयोगशाला ही
शरीर को,
कोई समझ कर देखे
उस संघर्ष को
करना पड़ता है जो
छूटने को माया से
व्यसन से,
कई बार तो
गुजर जाती है
पूरी उम्र ही
लड़ते-लड़ते
और हो जाते हैं
शहीद
मार खाकर
अपनी भूलों की।
जब घेरता है
रोग शरीर को
व्यसन के कारण,
हिल जाते हैं
सारे परिजन
चरमरा जाता है
आर्थिक ढांचा
परिवार का
देखी नहीं जाती
वेदना रोगी की।
आ लौट चलें
रे मनवा
मुक्ताकाश को
क्षमा मांगते हुए
व्यसनों से।
विश्वभर में
कितने कानून हैं
व्यसन मुक्ति के,
क्या कम हुआ
किसी देश में,
बढ़ती जा रही
आय देशों की
नशे के फैलाव से,
चाहे हो
मादक पदार्थो का
खेलों का या
रमणियों का।
उड़ाती है मजाक
नशे की लत
कानूनों का
प्रशासन-पुलिस का।
ऊपर से टी.वी
इण्टरनेट बना रहे
भोगी दर्शक को,
देकर जीवन्त प्रदर्शन,
बेचकर मशीनें
भोग की
और पशु भाव में
आ जाता है
एकोहं बहुस्याम,
उससे भी नीचे
कहीं-कहीं तो,
व्यापार बन गया
और बन गया
माध्यम भी
सौदेबाजी का
कूटनीति का
नहीं लगता किसी को
व्यसन अब
संस्कार विहीन
शराब का
देह का,
जुड़ गया शोषण भी
दबे पांव,
एक नया माध्यम
रिश्वत खोरी का।
अर्थहीन है शरीर,
दोनों पुरूष हैं
भीतर,
एक ही कामना
दोनों ओर
एकोहं बहुस्याम्।
कुछ व्यसन
चलते हैं
मन के सहारे
अभावग्रस्त जीवन
अभाव माधुर्य का,
अनुभव धोखे का,
द्वेष या शत्रुता
निज व्यक्ति से
या संगत से।
हर हाल में
कमजोरी तेरी है
रे मन
संकल्प हीनता की
विकल्प ढूंढ़ने की
व्यसन में
लिपट जाने की।
व्यसन दु:ख है
जीवन का
रोग है
लड़ना है इससे
हराना है इसको,
नहीं
समझना है इसे
और,
बाहर जाना है।
लड़ने से तो
बढ़ जाता है
अहंकार
गुणात्मकता भी
व्यसन की,
देखो और जानो
व्यसन के भीतर,
शरीर के भीतर
विचारों के भीतर
वहीं कहीं मिलेगी
जडें व्यसन की,
स्थूल में तो
दिखता परिणाम है,
अन्नमयकोश
साधन है,
मनोमयकोश,
तेरा घर
ओ मेरे मन,
कारण है,
वहीं प्रवेश करती
माया क्षुधा रूप
आसुरी भाव में
अहंकार-अज्ञान से।
स्वभाव से तो
पशु ही है
मनुष्य भी
पंच क्लेश (पाश)3
के कारण,
व्यस्त रहता है
आहार-निद्रा,
भय-मैथुन में,
फिर भी इसको
नकारता रहता है
सभ्य समाज,
किन्तु हिंसा, क्रोध
प्राकृतिक वृत्तियां,
रूकती नहीं दबाने से,
साथ आ रही हैं
जनम-जनम से।
कैसे रूकें ये वृत्तियां,
दबाते रहते हैं,
इनको बार-बार
हिंसा है यह भी
स्वयं के प्रति
दूसरों के प्रति भी,
और निमित्त पाकर
हो जाती विस्फोटक
घातक भी, और
इसी प्रकार भरा है
हमारा अवचेतन
इन वृत्तियों से,
इनसे ही जन्मता है
जीवन में भय,
नकारात्मकता का भाव,
ऊर्जा है वृत्तियां,
नहीं होतीं कभी
नकारात्मक,
जरूरत है ऊर्जा को
समझने की
दिशा मोड़ने की,
समझ लेना ही
मुक्ति है ऊर्जा की
नकारात्मकता से,
स्वीकार कर लेना
नकारात्मक भाव को
मुक्त करता है
पशुता को।
पशुता जनक है
भय की,
व्यसन पशुता है
क्योंकि खण्डित है
मन इसके कारण,
समझ लेना ही है
पूर्णता इसकी,
यह है मुक्ति भी
भय से।
आ लौट चलें
मनवा,
पूर्णता की ओर,
भय से शुरू किया
व्यसन छोड़ें भी
बडे भय से,
मुक्त हो सके
अपराध बोध से
खोलकर वेष्टन4
व्यसन का!
गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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