Gulabkothari's Blog

मई 6, 2013

रूपए किलो कैंसर

सत्ता प्राप्ति का जो नया फण्डा चल रहा है, वह है एक रूपए किलो गेहूं/चावल। देश के अनेक राज्यों में ऎसी घोषणाओं का सिलसिला चल रहा है। हाल ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी एक रूपए किलो गेहूं देने की घोषणा कर दी है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी कौन से पीछे रहने वाले थे। गुजरात का उदाहरण उनके सामने था। उन्होंने भी दो की जगह एक रूपए किलो गेहूं की घोषणा कर दी।

उत्तरप्रदेश, हरियाणा, बिहार, महाराष्ट्र आदि कई राज्यों में ऎसी योजनाएं चल रही हैं। घोषणाएं सबने कर दीं, लेकिन किसी ने भी शायद इसके भावी प्रभावों पर चिन्तन ही नहीं किया। क्या अधिकारियों से भी घोषणा करने से पहले राय ली जाती है? यदि उन्होंने भी यही राय स्वीकृत कर दी, तब तो उन्हें भी भ्रष्ट मति ही कहना पड़ेगा।

एक रूपए किलो में खाद्यान्न देने की शुरूआती घोषणाएं आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से हुई थीं। ऎसी चुनावी घोषणाओं में यह भी देखा जाना चाहिए कि जो खाद्यान्न दिया जा रहा है, वह स्वास्थ्यवर्द्धक भी है या नहीं। कई खाद्यान्नों खासतौर पर जैविक खाद्य की उपज में नुकसान पहुंचाने वाले तत्व नहीं होते। इसके विपरीत गेहूं कीटनाशकों, रासायनिक खाद तथा उन्नत किन्तु कमजोर बीजों का संग्रहालय माना जाता है, यानी एक रूपए किलो कैंसर बेचेंगी सरकारें। उन गरीबों को, बी.पी.एल. परिवारों को, जिनके पास न अच्छा स्वास्थ्य है, न ही रोग निरोधक क्षमता है तथा न ही इलाज के लिए (यदि कैंसर हो गया तो) पैसे ही हैं। उनके लिए तो यह जहर इस भाव भी महंगा है।

राजस्थान में बी.पी.एल. परिवारों में आबादी डेढ़ करोड़ भी मानते हैं और 25 किलो प्रतिमाह प्रति परिवार गेहंू देते हैं तो गेहूं कितना चाहिए? सरकार ने प्रदेश की सम्पूर्ण आबादी को भी (ए.पी.एल.) दो रूपए किलो गेहूं प्रति परिवार देने की घोषणा करके एक बड़ा लालच पैदा कर दिया है। यानी की सभी जगह गेहंू खाने का आकर्षण।

हमारी जलवायु में गेहंू वैसे भी स्वास्थ्यप्रद नहीं कहा जाता। राजस्थान में पश्चिम के रेगिस्तानी क्षेत्र में एकमात्र बाजरा ही स्वस्थ भोजन है। क्यों नहीं सरकार इस क्षेत्र में रूपए किलो बाजरा देती? देशी बीज में कीड़ा भी नहीं लगता। इसी प्रकार मेवाड़ संभाग में मक्का और हाड़ौती में ज्वार को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

मध्यप्रदेश में यही बी.पी.एल. आबादी साढे तीन करोड़ और गुजरात में करीब सवा करोड़ है। मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी और मक्का बहुतायत से खाया जाता है। यही हाल दक्षिण गुजरात में मक्का और सौराष्ट में बाजरे का है, पर किसी भी राज्य में इनको जगह नहीं है। इन्हें जगह मिले तो राज्यों की बड़ी आबादी को काफी हद तक रोग मुक्त रखा जा सकता है।

आज बाजरा भी उन्नत तो आया, “इरगिट” रोग लेकर आया। देशी गेहूं (काठा, बाज्या) बाजार से उठ गए। तब उन्नत गेहूं के अलावा विकल्प कहां है? उन्नत गेहूं और मात्रा का लालच ही रासायनिक खाद तथा कीटनाशक के प्रयोग को बढ़ावा देता है। दूसरा कारण यह भी है कि जब बीकानेर, जैसलमेर के बाजरा क्षेत्र में पानी के दम पर गेहूं पैदा करेंगे तो उसे भी भौगोलिक परिस्थितियों की मार झेलनी पड़ेगी। पोषक तत्व भी घट जाएंगे।

अत: एक रूपए किलो गेहूं परोसकर सरकारों ने सम्पूर्ण आबादी को कैंसर ही परोसा है। अधमरी जनता को पूरी तरह मारने का पुख्ता इन्तजाम राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात जैसे बडे-बडे राज्यों ने कर डाला। दस-पन्द्रह साल बाद चारों ओर कैंसर अस्पताल और कैंसर ट्रेनों का नया जाल बिछा होगा। सरकार चलाने वाले भी इससे बच सकेंगे, कहना थोड़ा मुश्किल ही है। इसी श्रेणी की सर्वाधिक महिलाएं पहले ही स्तन-कैंसर से पीडित हैं।

इधर, गुजरात, उधर मध्यप्रदेश पहले ही अपनी-अपनी घोषणाएं कर चुके हैं। तब गेहूं कहां से आएगा? पंजाब-हरियाणा से अथवा श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ से! अथवा राज्यों की मक्का-बाजरा-जौ-ज्वार आदि सभी किस्म के अनाजों को बन्द करके गेहूं बोया जाएगा? है क्या इतना पानी खेती के लिए राज्य के पास? क्या ये सारे अनाज गरीबों के परम्परागत भोजन से बाहर गेहूं खिलाने का कोई षड्यंत्र है? इन परम्परागत धानों में कभी किसी रोग की शिकायत नहीं आई।
गेहूं तो सिंचाई आधारित फसल रही है।

नहरी सिंचाई ने खेतों को पानी से भरने की छूट दे दी। इसने रासायनिक खाद को आमंत्रित किया। कुछ जमीनें खार से पथरा गई, कुछ सेम से बेकार हो गई। कमजोर ऊर्वरकता होते ही कीट बढ़ने लगे। कीटनाशक स्प्रे करने में ही सैकड़ों मौतें होने लगी। समय के साथ कीटनाशक बढ़ते गए। खेती, साग-सब्जियां, चारा सब कुछ कीटनाशक दवाओं से आक्रान्त हो गया। इन सारे माध्यमों का प्रभाव पशुओं के दूध पर तो सीधा-सीधा पड़ गया। महिला के दूध में भी कीटनाशक नवजात शिशु का प्रथम पान बन गए।

क्या इन सरकारों को मालूम है कि पंजाब और हरियाणा ने सन् 2001 में 7005 टन और 5025 टन कीटनाशक दवाओं का प्रयोग किया था। दोनों ही प्रदेश आज कैंसर की भयंकर चपेट में हैं। बठिण्डा से बीकानेर आने वाली एक दैनिक ट्रेन का नाम ही “”कैंसर ट्रेन”” है। प्रतिदिन 600 रोगी इलाज के लिए आते हैं। माटी के कण-कण में कैंसर है। पत्रिका श्रीगंगानगर का कीटनाशक सम्बन्धी एक सर्वे छाप चुका है, जो कैंसर के इस स्तर का प्रमाण है।

एक अन्य तथ्य यह भी है कि सरकार ने कुछ कीटनाशक दवाओं के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा रखा है, जो कैंसर पैदा करती हैं, किन्तु आज इनमें से कई का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है। चण्डीगढ़ के एक अस्पताल ने सन् 2005 में अध्ययन रिपोर्ट जारी की थी कि लोगों के खून में कीटनाशक दिख रहे थे। यह कैंसर की अग्रिम चेतावनी ही थी। उसके बाद एक अन्य रिपोर्ट में भी यही पुष्ट हुआ।

आज घर-घर में कैंसर हाजिर है। एक ओर गर्भनिरोधक गोलियों ने महिलाओं के स्तन एवं गर्भाशय के कैंसर की गारण्टी दे दी है। दूसरी ओर, एक रूपए प्रति किलो कैंसर बेचकर गरीब के जीने का अधिकार भी, सत्ता प्राप्ति के लिए, छीनने में कोई संकोच नहीं रह गया। तब गेहूं का दानव परम्परागत फसलों को भी लील जाएगा। और गेहूं खाने वालो को भी। इतनी हत्याओं के ढेर पर बैठे सत्ताधीश अपने अट्टहास से ईश्वर के कान भी फोड़ देंगे।

गुलाब कोठारी

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