Gulabkothari's Blog

मई 12, 2013

धरती मां

मैं पुत्र हूं सूर्य का,क्योंकि वह पिता है इस जगत का। चन्द्रमा पत्नी है सूर्य की। अत: प्रकाशित होती है उसके प्रकाश से ही। उसका अपना प्रकाश नहीं होता। हर मां प्रकाशित होती है प्रकाश पाकर पति का। गंगा,तुलसी,धरती सभी सूर्य पत्नियां हैं। माताएं हैं हमारी। पृथ्वी की हम संतानें हैं। उसके ही गर्भ में जीते हैं। जब उम्र पूरी करके पिता को प्राप्त होंगे,तब गर्भ से बाहर निकल पाएंगे। चन्द्रमा के श्रद्धा तžव के द्वारा सूर्य से जुड़े रहते हैं। सूर्य से हमको ज्योति,आयु,गौ (विद्युत) प्राप्त होते हैं। सूर्य ही किरणों के माध्यम से हमारी आयु का एक-एक दिन वापिस लेता रहता है। हमारी पहुंच भी सूर्य तक ही होती है।

 

 

सूर्य देवराज इन्द्र है। सूर्यलोक की ही देवलोक संज्ञा है। इसी में ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र की प्रतिष्ठा रहने के कारण सृष्टि का ह्वदय भी यही है। इसी के चारों ओर परमेष्ठी लोक का सोम फैला है। सूर्य की अग्नि ही इस सोम के साथ योग करके ‘अग्नि सोमात्मकं जगत्’ की सृष्टि करती है। हमारा ह्वदय भी ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र ही निर्मित करते हैं। इससे भी प्रमाणित होता है कि हम सूर्य की संतान हैं। ब्रह्माण्ड और हमारा शरीर एक ही सिद्धांत पर कार्य करते हैं-यथा पिण्डे-तथा ब्रह्माण्डे।

 

सृष्टि की तरह मेरा भी निर्माण परमेष्ठी लोक में अव्यय पुरूष से शुरू होता है। इसके ऊपर स्वयं भू (ब्रह्मा) का लोक है। सम्पूर्ण सृष्टि इसी पर टिकी है। ब्रह्मा के जरिए हमारा नित्य सम्पर्क रहता है। यही नहीं,यह ब्रह्मा ही हमारे ह्वदय की प्रतिष्ठा है। विष्णु ह्वदय के पोषण के लिए आहार लाता है। इन्द्र शेष्ा अवशिष्ट का विसर्जन करता है।

 

एक बच्चा मां की गोद में रहकर बड़ा और संस्कारवान बनता है। इसी मां की कोख में पिता के बीज से स्वरूप निर्मित होता है। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र बच्चे के ह्वदय में भी हैं,मां के ह्वदय में,पिता के ह्वदय में तथा सूर्य रूपी सृष्टि के ह्वदय में भी हैं। गर्भ में बालक के शरीर का,मन का,ज्ञान का विकास स्पन्दनों के द्वारा ही होता है। शरीर भूत सृष्टि का अंग है और स्पन्दन शब्द-ब्रह्म का।

 

स्पन्दन ब्रह्म की शक्ति है। माया भाव है। सृष्टि का विकास आकाश तžव से होता है। नाद आकाश की तन्मात्रा या उसका गुण है। स्पन्दन या नाद के बाहर कुछ भी नहीं है। गर्भ में बालक का सम्पूर्ण विकास मां के शब्दों से,वातावरण की ध्वनि तरंगों से ही होता है।

 

बालक का सम्पूर्ण विकास इन स्पन्दनों की लय,ताल,सुर,आत्मीयता,मन के भाव आदि पर भी निर्भर करता है। लय शरीर को प्रभावित करती है। सुर मन को तथा ध्वनि की समग्रता ही एकरूपता तथा इसकी परस्पर सम्बद्धता को प्रभावित करती है। इसी प्रकार धरती की कोख में स्पन्दनों का यह प्रभाव स्थूल तथा सूक्ष्म दृष्टि से भी हमारे विकास पर पड़ता रहता है। जीवन में शब्द-ब्रह्म की साधना का महžव यहीं समझ में आता है।

 

वाग्देवी की कृपा से ही हम इस भूत दृष्टि से मुक्त हो पाते हंै। भूत सृष्टि के धारणा,ध्यान,समाघि का मार्ग दूसरा विकल्प है मां की गोद में समा जाने का। माया जननी भी है और पुनर्जन्म के लिए मृत्यु का कारण भी है। काल और काली की अवधारणा का यही संकेत है। मेरा शरीर आनन्दमय कोश है। पृथ्वी से जुड़ा है। इसके भीतर प्राणमय कोश सूर्य से जुड़ा है। मनोमय कोश चन्द्रमा से,विज्ञानमय कोश परमेष्ठी से जुड़ा है। ये तीनों ही भौतिक सृष्टि के आधार हैं। अर्थ ब्रह्म में तो अव्यय-अक्षर-क्षर (पुरूष) तीन भाव बनते हैं। शब्द ब्रह्म में भी स्फोट-स्वर-वर्ण तीन भाव बनते हैं। इसी से 288 वर्णो की सृष्टि होती है-एक ‘अ’ स्वर से।

 

पृथ्वी पर जन्म के साथ ही मेरा एक स्थान बन जाता है। वहीं से मेरी पहचान शुरू होती है। वहां से मेरा विकास,मेरे सम्बन्ध,मेरे सपने आदि की यात्रा शुरू होती है। यात्रा स्थूल कर्म के रूप में चलती है। इसके कारण सूक्ष्म में होते हैं। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र ही ह्वदय में इच्छा पैदा करके कर्म करने को प्रेरित करते हैं। ये सारे तžव सूर्य अक्षर धरातल से जुड़े होते हैं। ऊपर से आकर मुझे चारों दिशाओं में फैल जाने को प्रेरित करते हैं। जबकि जीवन के अन्त में सूर्य मार्ग से जाना ही मेरा उद्देश्य है। चन्द्रमार्ग पुनर्जन्म का मार्ग है।

 

अक्षर पुरूष कारण रूप में मेरे कर्मो का निमित्त बनता है। माया अपने जाल में फंसाकर रखती है। प्रारब्ध पिछले कर्मो के भोग का जाल फैलाकर रखता है। मन इन्द्रियों द्वारा विषयों की चकाचौंध में फंसा रहता है। प्रकृति के त्रिगुण मेरे चिन्तन को घेरे रखते हैं। पुरूष और प्रकृति मेरे जीवन का संचालन करते हैं। तब मेरे मन की सुप्त अवस्था होती है। इसे जाग्रत किए बिना धर्म की ओर मेरा ध्यान जाए कैसे! धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष का अर्थ समझे कैसे! धर्म,ज्ञान,वैराग्य,ऎश्वर्य जीवन में प्रवेश करें कैसे! स्थूल जीवन का छोटा सा उदाहरण है केटर पिलर।

 

जिस पत्ते पर पैदा होता है,उसी को अपना विश्व मानता है। वहीं अपना जीवन पूरा करके मर जाता है। सुयोग से यदि उसे तितली बनने का अवसर मिल जाता है,तब उसे पराग का स्वाद मिल पाता है। उसके बाद उसे पत्तों से कोई मोह नहीं रह जाता। पूर्ण रूप से विरक्ति,आसक्ति मुक्त। मानो पहले कभी कोई सम्बन्ध रहा ही नहीं हो। तितली बनते ही विश्व के सभी फूल उसे एक से आकर्षित करते हैं। जब तक जीती है,बस अमृतपान के सहारे। जीवन की शेष यात्रा स्वत: ही ऊध्र्वगामी हो जाती है।

 

मुझे तितली बनने का अवसर सत्संग देता है। गुरू देता है। भक्ति देती है। श्रद्धा-समर्पण के भाव मुझे अमृतपान करने के योग्य बनाते हैं। पत्नी मुझे देवरति में प्रवेश करवाकर देती है। किसी भी देवता की पत्नी ने अभी तक स्वतंत्र जीने का कोई उदाहरण भी पेश नहीं किया। न विवाह-विच्छेद ही हुआ।

धरती मां की गोद में मेरा जीवन प्रकृति से घिरा रहता है। सूर्य-चन्द्रमा-नक्षत्रों से प्रभावित रहता है। आकाश-वायु-जल आदि पांचों महाभूतो से आदान-प्रदान बना रहता है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। सूर्य परमेष्ठी की परिक्रमा करता है। अत: पृथ्वी अग्नि और सोम के मध्य ही विचरण करती है। इसी से सम्वत्सर और ऋतुएं बनते हैं। अन्न और औष्ाध का निर्माण होता है।

 

सभी सूक्ष्म प्राण मेरे आभामण्डल अथवा औरा के सम्पर्क में रहते है। औरा मेरे प्रमुख शक्ति केन्द्रों या चक्रों से जुड़ा होता है। चक्र ही शक्ति के संग्रहण एवं वितरण केन्द्र होते हंै। ये ही उपयोग के बाद विसर्जन कार्य भी करते हैं। चक्र शरीर,मन,बुद्धि,आत्मा के धरातल से जुड़े होते हैं। आपस में भी इनका परस्पर सम्बन्ध होता है। इनका सारा आदान-प्रदान स्पन्दन रूप होता है।

 

स्पन्दन वाक्  रूप ध्वनि तथा शब्दों के होते हैं। ध्वनि के साथ नाद से लेकर संगीत तक सब जुड़ा है। शब्द में भी परा-पश्यन्ती-मध्यमा वैखरी के चार धरातल होते हैं। ध्वनि में स्थूल रूप से सुर-ताल-लय-संगीत का प्रभाव होता है। हम बातें करते हैं,पढ़ते हैं,टी.वी. या सिनेमा देखते हैं,आस-पास की ध्वनियां सुनते हैं वगैरह-वगैरह। इन सब के स्पन्दन हमारे औरा के जरिए चक्रों तक तथा शेष शरीर में फैल जाते हैं। ये स्पन्दन ही हमारी संरचना में खुराक का कार्य करते हैं। सकारात्मक ध्वनियों के स्पन्दन रक्त शोधन कर देते हैं।

 

शरीर को निर्मल करने का काम करते हैं। जैसे ही रक्त शुद्ध हुआ,आगे की सभी धातुएं-मांस-वसा-अस्थि-मज्जा-वीर्य शुद्ध होने लग जाते हैं। स्पन्दन मन को तरंगित करते हैं। भावों को परिवर्तित करते हैं। मन इन्द्रियों के साथ आत्मा की ओर,आत्मा ईश्वर की ओर मुड़ने लगते हैं। जप का स्वरूप वाचिक से उपांशु तथा मानस की ओर अग्रसर होने लगता है। वैखरी में ठहराव तथा मध्यमा से पश्यन्ती में प्रवेश होता जाता है। जैसे ही विज्ञानमय कोश में प्रवेश हुआ कि मन बाहर से सिमट जाता है। अक्षर सृष्टि में,ऋतंभरा में प्रवेश हो जाता है।

 

व्यक्ति सूक्ष्म को,सृष्टि के कारण को समझने लग जाता है। शरीर की क्रियाएं शिथिल पड़ने लगती हैं। जो आत्मा शरीर के सहारे सौ साल तक धरती मां की पकड़ के कारण (गुरूत्वाकर्षण से) हवा में खड़ा था,वह फिर से पिता की ओर प्रयाण करने को आतुर दिखाई पड़ने लगता है। मां की गोद से निकल कर वृहद् सृष्टि अथवा ब्रह्माण्ड में बसना चाहता है। फिर अचानक अक्षर के माध्यम से अव्यय में लीन हो जाता है। फिर मां के पास नहीं लौटता।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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